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पुष्य नक्षत्र के शुभ दिन से आरंभ।
हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी सीमित मात्रा में स्वर्ण रसायन च्यवनप्राश उपलब्ध है इसे शास्त्रोक्त विधि से नए आंवले जड़ीबूटियां और बिना चीनी के शहद के साथ बनाया है साथ ही इसमें स्वर्ण रजत आदि भस्म भी मिलाई गई है।
सीमित मात्रा में उपलब्ध है अतः शीघ्र ही बुक करे🙏
ग्रंथों के अनुसार यह वही रसायन है जो अश्विनीकुमारों ने ऋषि च्यवन के लिए बनाया था। हमारी रसशाला में यह वर्ष में केवल एक बार बनता है: नवीन आँवले से, धीमी आँच पर, ग्रंथोक्त विधि से।
भीतर: नवीन आँवला, गो-घृत, तिल तेल, स्वर्ण भस्म और अनेक वनौषधियाँ, बिना अतिरिक्त चीनी के।
हर प्री-बुकिंग के साथ 30 ग्राम मधु निःशुल्क।
500 ग्राम ₹850 | दो की जोड़ी ₹1500
प्रेषण धनतेरस से आरंभ।
प्री-बुकिंग का लिंक बायो में। इसे सहेजें और अपनों के साथ बाँटें।
Desi Alchemist | परंपरा से, प्रकृति से
इस वर्ष का स्वर्ण रसायन च्यवनप्राश अब प्री-बुकिंग के लिए खुला है। पुष्य नक्षत्र के शुभ दिन से आरंभ।
ग्रंथों के अनुसार यह वही रसायन है जो अश्विनीकुमारों ने ऋषि च्यवन के लिए बनाया था। हमारी रसशाला में यह वर्ष में केवल एक बार बनता है: नवीन आँवले से, धीमी आँच पर, ग्रंथोक्त विधि से।
भीतर: नवीन आँवला, गो-घृत, तिल तेल, स्वर्ण भस्म और अनेक वनौषधियाँ, बिना अतिरिक्त चीनी के।
हर प्री-बुकिंग के साथ 30 ग्राम मधु निःशुल्क।
500 ग्राम ₹850 | दो की जोड़ी ₹1500
प्रेषण धनतेरस से आरंभ।
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Desi Alchemist | परंपरा से, प्रकृति से
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शुभ दीपावली।
समुद्र मंथन से प्रकट होकर माँ लक्ष्मी ने श्री नारायण को अपना वर चुना। जहाँ नारायण हैं, वहीं श्री है।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा। (श्रीमद्भगवद्गीता १८.७८)
नमस्तेऽस्तु महामाये। (महालक्ष्मी अष्टकम्)
आपके घर श्री, समृद्धि और आरोग्य का वास हो।
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दोपहर की कड़ी धूप है, और आज एक छोटी सी बात पर तीनों पात्र उलझ गए।
वात: डर और चिंता, मुँह से कुछ भी निकल जाता है।
पित्त: सबसे अधिक क्रोध, आँखें लाल, सिर में जलन।
कफ: चुप बैठा है, पर बात मन में रख ली तो कई दिन भारी।
आयुर्वेद का नियम:
1. शीतल जल पीजिए
2. कुछ गहरी साँसें लीजिए
3. उत्तर देने से पहले थोड़ा रुकिए
आप में क्रोध आने पर कौन सा पात्र जागता है? नीचे लिखिए।
त्रिदोष के तीन पात्र | कड़ी 6
अगली कड़ी: लंबी यात्रा
सहेजें, और अपनों को भेजें।
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दीपावली से पहले, रूप चौदस की भोर। दादी की कटोरी में गुनगुना तिल का तेल, और अभ्यंग स्नान।
चरक संहिता (सूत्रस्थान 13) में सब तेलों में तिल का तेल विशिष्ट माना गया है। सूत्रस्थान 5 में चरक एक सुंदर दृष्टांत देते हैं: जैसे तेल लगाने से घड़ा और चमड़ा दृढ़ होते हैं, वैसे ही अभ्यंग से शरीर। अष्टांगहृदय कहता है, सिर, कान और पैरों में विशेष रूप से।
हेमंत ऋतु आने वाली है, और ऋतुचर्या में इस ऋतु में अभ्यंग हितकर बताया गया है।
आपके घर में रूप चौदस पर अभ्यंग स्नान होता है? किस तेल से? नीचे लिखिए।
Desi Alchemist | परंपरा से, प्रकृति से
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रूप चतुर्दशी की भोर, अभ्यंग का दिन।
परंपरा है कि इस दिन सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान किया जाए। घर की दादी नानी इसे ऐसे ही करवाती थीं:
१. देह प्रबोध तैलम को हल्का गुनगुना कर, पूरे शरीर पर धीरे धीरे अभ्यंग
२. केशों और सिर में केश प्रबोध तैलम
३. सर्वांग उबटन से देह का उबटन, और मुख पर दिव्य रसायन उबटन
४. अंत में गुनगुने जल से स्नान, फिर सूर्य को अर्घ्य
अभ्यङ्गमाचरेन्नित्यं स जराश्रमवातहा।
दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुःस्वप्नसुत्वक्त्वदार्ढ्यकृत्॥
(अष्टाङ्गहृदय, सूत्रस्थान २.८)
अर्थ: अभ्यंग प्रतिदिन करना चाहिए। शास्त्र के अनुसार यह जरा, श्रम और वात को दूर रखने में सहायक है, और दृष्टि, पुष्टि, आयु, अच्छी नींद, सुंदर त्वचा तथा शरीर की दृढ़ता देता है।
उत्पादों के लिंक:
देह प्रबोध तैलम: desialchemist.com/products/d…
केश प्रबोध तैलम: desialchemist.com/products/k…
सर्वांग उबटन: desialchemist.com/products/s…
दिव्य रसायन उबटन: desialchemist.com/products/d…
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मेरी पहली पुस्तक का प्रकाशन
आज आपसे एक बात साझा करना चाहता हूँ।
बरसों से कुछ कहानियाँ मेरे भीतर थीं, जो प्रकाशित होने की प्रतीक्षा कर रही थीं। किसी न किसी कारण से यह हो नहीं पा रहा था, पर अंततः आज वे Kindle पर प्रकाशित हो गई हैं।
पाँच घर, एक दीया में पाँच कहानियाँ हैं। मेरे स्वभाव के विपरीत, ये सभी गहरी, रहस्यमयी हैं और इनमें भय का हल्का स्पर्श भी है। आशा है, आपको पसंद आएँगी।
कल से दो दिन (8–9 नवंबर) यह किताब Kindle पर निःशुल्क रहेगी। यदि आपके पास Kindle Unlimited है, तो आप इसे आज भी बिना किसी शुल्क के पढ़ सकते हैं।
हिंदी: amazon.in/dp/B0HQQTTSS1
English: amazon.in/dp/B0HQPXW8JD
पढ़ने के बाद अपनी समीक्षा अवश्य दीजिए 🙏
– आशीष सोनी
पंचदीप का दूसरा दीप, रूप का।
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को श्रीकृष्ण और सत्यभामा ने नरकासुर का अंत कर बंदी कन्याओं को मुक्त किया। मान्यता है कि विजय के बाद श्रीकृष्ण ने तेल अभ्यंग कर स्नान किया, तभी से इस दिन सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान की परंपरा है।
अभ्यङ्गमाचरेन्नित्यं स जराश्रमवातहा।
दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुःस्वप्नसुत्वक्त्वदार्ढ्यकृत्॥
(अष्टाङ्गहृदय, सूत्रस्थान २.८)
शुभ रूप चतुर्दशी।#पंचदीप #रूपचतुर्दशी #नरकचतुर्दशी #अभ्यंग #आयुर्वेद #DesiAlchemist #RoopChaturdashi #NarakChaturdashi #Diwali2026
रूप चतुर्दशी की भोर, अभ्यंग का दिन।
अभ्यङ्गमाचरेन्नित्यं स जराश्रमवातहा।
दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुःस्वप्नसुत्वक्त्वदार्ढ्यकृत्॥
(अष्टाङ्गहृदय, सूत्रस्थान २.८)
अर्थ: अभ्यंग प्रतिदिन करना चाहिए। शास्त्र के अनुसार यह जरा, श्रम और वात को दूर रखने में सहायक है, और दृष्टि, पुष्टि, आयु, अच्छी नींद, सुंदर त्वचा तथा शरीर की दृढ़ता देता है।
मान्यता है कि नरकासुर पर विजय के बाद श्रीकृष्ण ने तेल अभ्यंग कर स्नान किया था। तभी से कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान की परंपरा है, और यह दिन रूप चतुर्दशी कहलाता है।
आज भोर में गुनगुने तिल तेल से अभ्यंग कीजिए, फिर उबटन लगाकर गुनगुने जल से स्नान।
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जिस मंथन से देवता अमृत खोज रहे थे, उसी से प्रकट हुए आयुर्वेद के आदि आचार्य।
ऋषि दुर्वासा के श्राप से देवता श्रीहीन हो गए। भगवान विष्णु के बताए उपाय से देवों और असुरों ने मंदराचल को मथानी और नागराज वासुकि को रस्सी बनाकर क्षीरसागर का मंथन किया। हलाहल को भगवान शिव ने कंठ में धारण किया, फिर एक-एक कर रत्न निकले, और सबसे अंत में अमृत कलश लिए प्रकट हुए धन्वंतरि।
सुश्रुत संहिता के अनुसार, काशिराज दिवोदास के रूप में उन्होंने ही सुश्रुत को शल्य विद्या सिखाई। इसीलिए धनतेरस पर धन्वंतरि का पूजन होता है।
"धन्वन्तरिरिति ख्यात आयुर्वेददृगिज्यभाक्।"
अर्थात, धन्वंतरि आयुर्वेद के द्रष्टा हैं। आयुर्वेद किसी एक मनुष्य की खोज नहीं, द्रष्टा का दर्शन है।
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नंगे पाँव घास पर चलने से क्या होता है?
आयुर्वेद के अनुसार पाँव के तलवों और नेत्रों का गहरा संबंध माना गया है। इसीलिए पादाभ्यंग और सवेरे ओस भरी घास पर चलना परंपरा में सराहा गया है।
वैद्य जी का सूत्र: सूर्योदय के समय, स्वच्छ घास पर, कुछ देर धीरे धीरे टहलो।
इसे सहेज लें और उस मित्र को भेजें जो सारा दिन स्क्रीन के सामने रहता है।
यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान पर आधारित है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या में अपने वैद्य से परामर्श करें।
Desi Alchemist | परंपरा से, प्रकृति से
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धनतेरस: स्वर्ण भी, आरोग्य भी
आज धनतेरस है, और यही दिन धन्वन्तरि जयन्ती भी है। पुराणों के अनुसार इसी दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। वे आयुर्वेद के देवता माने जाते हैं।
हमारे यहाँ कहा जाता है, पहला सुख निरोगी काया। धन तभी आनंद देता है, जब शरीर स्वस्थ हो। इसलिए इस धनतेरस स्वर्ण, रजत और नए पात्रों के साथ आरोग्य भी घर लाइए।
स्वर्ण और रजत से बने देसी अल्केमिस्ट के उत्पाद:
स्वर्ण रसायन च्यवनप्राश: इस ऋतु के आँवले और स्वर्ण भस्म से बना, शीत ऋतु का रसायन। आज धनतेरस से भेजना आरम्भ।
स्वर्ण रसायन क्रीम: स्वर्ण, केसर और कुमकुमादि तेल, रात्रि की देखभाल के लिए।
स्वर्ण चन्दन जेल: स्वर्ण, चन्दन, केसर और घृतकुमारी, त्वचा को शीतलता और नमी।
केश प्रबोध तैलम: स्वर्ण भस्म और रजत भस्म, चार दूध और भृंगराज।
स्वर्ण प्रभा कैप्सूल: स्वर्ण भस्म, मंजिष्ठा, हल्दी और चन्दन।
सभी उत्पाद वेबसाइट पर: desialchemist.com (लिंक प्रोफ़ाइल में)
आप सभी को धनतेरस और धन्वन्तरि जयन्ती की मंगलकामनाएँ।
इस पोस्ट को सहेज लीजिए और अपने परिवार के साथ साझा कीजिए।
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धनतेरस: स्वर्ण भी, आरोग्य भी
आज धनतेरस है, और यही दिन धन्वन्तरि जयन्ती भी है। पुराणों के अनुसार इसी दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। वे आयुर्वेद के देवता माने जाते हैं।
हमारे यहाँ कहा जाता है, पहला सुख निरोगी काया। धन तभी आनंद देता है, जब शरीर स्वस्थ हो। इसलिए इस धनतेरस स्वर्ण, रजत और नए पात्रों के साथ आरोग्य भी घर लाइए।
स्वर्ण और रजत से बने देसी अल्केमिस्ट के उत्पाद:
स्वर्ण रसायन च्यवनप्राश: इस ऋतु के आँवले और स्वर्ण भस्म से बना, शीत ऋतु का रसायन। आज धनतेरस से भेजना आरम्भ।
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पंचदीप का पहला दीप, आरोग्य का।
पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन से अमृत कलश लिए भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए, और उसी मंथन से कामधेनु भी निकलीं। इसीलिए धनतेरस धन्वंतरि का दिन है, और सबसे बड़ा धन आरोग्य।
इस धनतेरस एक दीप अपने स्वास्थ्य के नाम जलाइए।
शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यं धनसम्पदा।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
(दीप प्रज्वलन मंत्र, परंपरा)
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धनतेरस पर भगवान धन्वन्तरि को प्रणाम, जिनके हाथ में अमृत कलश है और जिनसे आयुर्वेद की परम्परा चली।
ॐ अच्युताय नमः । ॐ अनन्ताय नमः । ॐ गोविन्दाय नमः ॥
शास्त्रों में इन तीन नामों की महिमा इस श्लोक में कही गई है:
अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् ।
नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥
(नारद पुराण, पूर्वभाग १.३४.६१)
अर्थ: अच्युत, अनन्त और गोविन्द, इन नामों का उच्चारण स्वयं एक औषधि है। परम्परा इसे भगवान धन्वन्तरि का प्रिय मंत्र मानती है।
अच्युत: जो कभी अपने स्थान से च्युत नहीं होते।
अनन्त: जिनका कोई अन्त नहीं।
गोविन्द: जो सबका पालन करते हैं।
आज की छोटी विधि: प्रातः स्नान के बाद दीपक जलाइए, आचमन करते हुए ये तीन नाम लीजिए, फिर शान्त मन से ११ बार इस मंत्र का जप कीजिए। मन का स्वास्थ्य भी आयुर्वेद का ही अंग है।
आप सभी को धनतेरस और धन्वन्तरि जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपके घर में आरोग्य ही सबसे बड़ा धन बने।।
मंजिष्ठा उबटन, कच्चे दूध के साथ
दो जड़ें और एक फूल।
मुलेठी, गुलाब की पंखुड़ियाँ, और आधा चम्मच मंजिष्ठा।
कच्चे दूध में मिलाकर लेप बनाएँ, दस मिनट लगाएँ, फिर धो लें।
चरक संहिता के वर्ण्य महाकषाय में मंजिष्ठा और मुलेठी का नाम आता है।
पहली बार लगाने से पहले कलाई पर थोड़ा लगाकर देख लें।
तैयार उबटन चाहिए तो हमारा दिव्य रसायन उबटन देखें।
मंजिष्ठा उबटन, कच्चे दूध के साथ
दो जड़ें और एक फूल।
मुलेठी, गुलाब की पंखुड़ियाँ, और आधा चम्मच मंजिष्ठा।
कच्चे दूध में मिलाकर लेप बनाएँ, दस मिनट लगाएँ, फिर धो लें।
चरक संहिता के वर्ण्य महाकषाय में मंजिष्ठा और मुलेठी का नाम आता है।
पहली बार लगाने से पहले कलाई पर थोड़ा लगाकर देख लें।
तैयार उबटन चाहिए तो हमारा दिव्य रसायन उबटन देखें।
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सुप्रभात।
सफलता में विनम्रता और असफलता में धैर्य बनाए रखना ही सच्चा योग है।
हर परिस्थिति में मन संतुलित रहे, यही जीवन की साधना है।
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सवेरे के पाँच बजे हैं, ब्राह्म मुहूर्त। देखिए, तीनों पात्रों में कौन उठता है।
वात: कब से जाग रहा हूँ, पर ठंडी वायु में हाथ-पैर काँपते हैं।
पित्त: उठते ही काम की सूची, पर खाली पेट चिड़चिड़ाहट।
कफ: थोड़ी देर और सोने दो... पर देर से उठूँ तो दिन भर आलस।
आयुर्वेद का प्रातः नियम:
1. उठते ही गुनगुना जल पीजिए
2. जीभ स्वच्छ कीजिए
3. कुछ देर खुली वायु में टहलिए
आप सवेरे कितने बजे उठते हैं? नीचे लिखिए।
त्रिदोष के तीन पात्र | कड़ी 5
अगली कड़ी: क्रोध वाला दिन
सहेजें, और अपनों को भेजें।
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च्यवनप्राश प्री ऑर्डर के लिए उपलब्ध है और सभी प्री ऑर्डर पर ३० ग्राम शहद उपहार स्वरूप आयेगा धन्यवाद 🙏🏼
ऋषि च्यवन की कथा | आयुर्वेद के पुरोधा
महाभारत और पुराणों के अनुसार, वृद्ध ऋषि च्यवन वर्षों की तपस्या में इतने लीन रहे कि उनके शरीर पर दीमक की बाँबी जम गई। राजकुमारी सुकन्या से हुई एक भूल ने उनका जीवन बदल दिया, और फिर देववैद्य अश्विनीकुमारों ने उन्हें पुनः यौवन दिया।
यही कथा आज भी "च्यवनप्राश" नाम में जीवित है।
अगली कथा के लिए जुड़े रहिए।
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