शादी के 8 साल बाद जब मेरे पति ऑफिस से लौटे, तो मैंने उनका हाथ पकड़कर दरवाज़े पर ही रोक दिया और कहा—
आज आप इस घर के अंदर कदम नहीं रखेंगे।
वे एकदम सन्न रह गए।
निशा, यह क्या मज़ाक है? दिन भर की थकान के बाद मैं अपने ही घर नहीं आ सकता?
यह कोई मज़ाक नहीं है। आज रात आपको यहाँ से जाना होगा।
उनका पारा चढ़ गया। उन्होंने अपना बैग फर्श पर पटका।
तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या? आखिर वजह क्या है, साफ़ बताओ!
मेरी आँखों में आँसू छलकने को बेताब थे, पर मैंने खुद को बिखरने नहीं दिया।
बस आज मुझ पर भरोसा रखिए और बिना एक भी सवाल पूछे यहाँ से चले जाइए।
वे गुस्से से तमतमाते हुए गाड़ी में बैठे और दरवाज़ा इतनी ज़ोर से बंद किया कि उसकी गूँज देर तक सन्नाटे में तैरती रही।
रात के ठीक 11 बजे, जब हवा में कंपकंपी बढ़ गई थी, मैंने उनके फोन पर एक लोकेशन भेजी और मैसेज लिखा—
अगर हमारी 8 साल की शादी और मुझ पर रत्ती भर भी ऐतबार है, तो ज़िला महिला अस्पताल के पीछे वाले पार्क में आ जाइए।
वे पंद्रह मिनट में हाँफते हुए वहाँ पहुँच गए।
पार्क की उस सुनसान, धुंधली रोशनी वाली बेंच पर मैं शॉल लपेटे बैठी थी। मेरी गोद में महज़ दो महीने की एक नन्हीं बच्ची गहरी नींद में सो रही थी।
वे मुझे और उस बच्ची को देखकर भड़क उठे।
यह सब क्या तमाशा है निशा? यह बच्ची किसकी है?
आज से यह हमारे साथ रहेगी।
वे गुस्से और अविश्वास में चिल्लाए—
तुम होश में तो हो? शादी के आठ साल से हम खुद एक औलाद के लिए तरस रहे हैं, हर डॉक्टर, हर चौखट पर माथा टेक चुके हैं... और तुम आधी रात को किसी अनजान बच्ची को उठाकर ले आईं?”
मेरी उंगलियाँ कांप रही थीं। मैंने धीरे से कहा—
यह कोई अनजान बच्ची नहीं है। आज शाम जब मैं अस्पताल से अपनी जांच रिपोर्ट लेकर निकल रही थी, तो यह मुझे लावारिस वार्ड के बाहर एक गत्ते के डिब्बे में मिली।
वे बोले—
तो पुलिस को क्यों नहीं सौंपा? किसी झंझट में फँसना चाहती हो?
मैंने शॉल का कोना थोड़ा हटाया और बच्ची की कलाई पर बंधा नवजात टैग उनकी तरफ कर दिया।
पुलिस को बुलाने से पहले ज़रा इस पर लिखी माँ का नाम पढ़ लीजिए।
उन्होंने जेब से फोन निकाला और टॉर्च की रोशनी उस टैग पर डाली।
उस पर लिखा नाम पढ़ते ही उनका हाथ कांप गया, फोन ज़मीन पर गिरते-गिरते बचा।
उस पर लिखा था—‘रचना... यानी उनकी अपनी छोटी बहन, मेरी ननद।
उनकी आवाज़ गले में ही घुट गई—
रचना? लेकिन वो तो छह महीने पहले ससुराल से झगड़कर बिना बताए कहीं चली गई थी... उसका तो कोई सुराग ही नहीं था!
मैंने अपनी जेब से अस्पताल की पर्ची और पुलिस पंचनामे की अधूरी कॉपी उनके हाथ में थमा दी।
मेरे गले में जैसे शब्द अटक गए....1/2
तीन साल तक मैं अपने बॉयफ्रेंड की हर जरूरत पूरी करती रही, लेकिन जिस दिन उसकी सरकारी नौकरी लगी, उसी दिन मुझे पता चला कि वह मुझसे नहीं, मेरी कमाई से प्यार करता था!
मैं पिछले तीन साल से राहुल नाम के लड़के के साथ रिलेशनशिप में थी।
मैं एक साधारण किसान परिवार से थी। मेरे पिता के पास थोड़ी-सी जमीन थी और मैं पटवारी भर्ती की तैयारी कर रही थी।
राहुल हमेशा मुझसे कहता था—
Boyfriend: "आरती, जब तुम्हारी सरकारी नौकरी लग जाएगी न, तब मैं अपने घरवालों को मना लूँगा। मुझे बस तुम्हारे साथ जिंदगी बितानी है।"
Girlfriend: "तुम चिंता मत करो। नौकरी लगते ही हम दोनों अपने परिवार को शादी के लिए मना लेंगे।"
वह अक्सर मुझसे महंगे गिफ्ट, नए कपड़े और ऑनलाइन शॉपिंग के लिए पैसे मांगता था।
मैं अपनी जरूरतें छोड़कर भी उसकी हर ख्वाहिश पूरी करती थी।
कई बार मेरी सहेलियों ने समझाया—
Friend: "आरती, थोड़ा संभलकर। हर बार पैसे मांगना और फिर प्यार जताना अच्छी बात नहीं है।"
Girlfriend: "तुम लोग नहीं समझोगी। राहुल ऐसा लड़का नहीं है। वह मुझसे सच्चा प्यार करता है।"
एक दिन उसने मुझसे कहा—
Boyfriend: "तुम्हारे पास जो जमीन के कागजात हैं, उनकी फोटो मुझे भेज दो। मेरे एक दोस्त का बैंक में संपर्क है। तुम्हारे लिए लोन की जानकारी निकलवा दूँगा।"
Girlfriend: "लेकिन तुम्हें जमीन के कागजात क्यों चाहिए?"
Boyfriend: "अरे पागल! कल को हमारी शादी होगी तो तुम्हारे ही काम आएगा। क्या अपने होने वाले पति पर भरोसा नहीं है?"
मैं उसकी बातों में आ गई।
फिर एक दिन उसने मेरा आधार कार्ड, पैन कार्ड और बैंक की जानकारी भी मांगी।
मैंने बिना कुछ सोचे सारे दस्तावेज भेज दिए।
कुछ दिनों बाद मेरी सरकारी नौकरी का रिजल्ट आया। मेरा चयन हो गया था।
मैं खुशी से पागल हो गई। सबसे पहले राहुल को फोन लगाया।
Girlfriend: "राहुल! मेरी नौकरी लग गई। अब हमारा सपना पूरा होने वाला है।"
Boyfriend: "सच में? बहुत-बहुत बधाई जानू! अब तो हमारी शादी पक्की समझो।"
उसने उसी शाम मिलने बुलाया।
मैं मिठाई लेकर उसके जन सेवा केंद्र पहुँची, लेकिन वह फोन पर किसी से बात कर रहा था।
मैंने उसे आवाज नहीं दी। तभी उसकी बात मेरे कानों में पड़ी—
Boyfriend: "हाँ भाई, अब इसका काम पूरा हो गया। तीन साल तक इसकी नौकरी का इंतजार किया। अब सरकारी नौकरी लग गई है तो शादी करके इसकी आधी सैलरी अपने नाम करवाऊँगा।"
दूसरी तरफ से आवाज आई—
Friend: "लेकिन अगर उसे तुम्हारे पुराने लोन के बारे में पता चल गया तो?"
राहुल हँसकर बोला—
Boyfriend: "उसके नाम पर मैंने दो लाख का पर्सनल लोन ले रखा है। इसकी ईएमआई भी अब यही भरेगी। इसके सारे डॉक्यूमेंट मेरे पास हैं। इसे तो आज तक पता भी नहीं चला कि इसके नाम पर क्या-क्या चल रहा है!"
मेरे हाथ से मिठाई का डिब्बा लगभग गिर ही गया।
लेकिन असली झटका अभी बाकी था....1/2
शादी के एक साल तक जब मेरे पति और ससुराल वालों ने मुझे कभी मायके नहीं जाने दिया, तो मुझे लगा कि वे मुझसे इतना प्यार करते हैं कि एक दिन भी मुझे अपनी आँखों से दूर नहीं देखना चाहते।
खासकर मेरी सास, जिनका कहना था—"बहू हमारी घर की लक्ष्मी है, इसे किसी की नज़र न लग जाए।"
हर शाम 7 बजे, जब गाँव के मंदिर में आरती का घंटा बजता, सास अपने हाथों से तुलसी के काढ़े में एक खास लाल बूटी घिसकर मुझे पीने को देती थीं।
वे बड़े प्यार से सिर पर हाथ फेरकर कहतीं—"यह हमारे खानदानी वैद्य जी की दवा है री, इसे पिएगी तो तेरे बाँझपन का कलंक मिटेगा और कुल को वारिस मिलेगा।"
काढ़ा पीने के ठीक आधे घंटे बाद मेरा पूरा बदन सुन्न पड़ने लगता, जी मिचलाता और मैं बेसुध होकर बिस्तर पर ढह जाती।
सुबह जब 10 बजे मेरी आँख खुलती, तो पूरा शरीर ऐसे दुखता जैसे रात भर किसी ने भारी पत्थर रख दिए हों।
ससुराल वाले गाँव में ढिंढोरा पीटते कि बहू बीमार रहती है, दिन भर सोती है और शायद कभी माँ नहीं बन पाएगी।
गाँव की औरतें मुझ पर तरस खातीं और मैं खुद को कोसती कि मेरे शरीर में ही कोई खोट है।
लेकिन पिछले हफ़्ते, जिस दिन पूरे गाँव में बिजली गुल थी, मेरी किस्मत ने करवट ली।
उस रात काढ़े का स्वाद कुछ ज़्यादा ही कड़वा था, तो सास के कमरे से बाहर जाते ही मैंने वह काढ़ा चुपके से खिड़की के बाहर लगे गमले में उलट दिया और खाली कुल्हड़ मेज पर रख दिया।
रात के करीब एक बजे, जब सब गहरी नींद में होने चाहिए थे, मेरे कमरे के ठीक पीछे बने भूसे वाले कोठरे से धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी।
मैं दबे पाँव अंधेरे में दीवार के सहारे कोठरे की खिड़की तक पहुँची।
अंदर एक लालटेन जल रही थी। मेरे पति, सास और गाँव का एक शातिर झोलाछाप डॉक्टर गोल घेरा बनाकर बैठे थे।
मेरे पति कह रहे थे— "माँ, कब तक चलेगा यह नाटक? रोज़-रोज़ काढ़ा पिलाने से कोई पक्का नतीजा तो निकल नहीं रहा। उसके पिता ने जो 10 बीघा नहरी ज़मीन और ट्रैक्टर दहेज में देने का वादा किया था, वह अपने नाम कब होगा?"
तभी उस झोलाछाप ने हँसते हुए कहा— "अरे धीरज रखो लल्ला! जो बूटी मैं दे रहा हूँ, वह धीरे-धीरे खून को पानी बना देती है। तीन महीने और... फिर रिपोर्ट ऐसी बनेगी कि लड़की को असाध्य बीमारी थी। न कोई पुलिस केस बनेगा, न पंचायत कुछ बोलेगी। मायके वाले बदनामी के डर से ज़मीन भी तुम्हारे नाम लिख देंगे और तुम दूसरी शादी करके नया दहेज भी ले आना।"
सास ने ठहाका लगाते हुए कहा— "सही कह रहे हो डॉक्टर। गाँव वालों की नज़र में तो हम देवी हैं जो बीमार बहू की इतनी सेवा कर रहे हैं। ज़मीन मिलते ही इसका किस्सा खत्म।"
यह सुनते ही मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई, सीने में आग धधक उठी।
वह काढ़ा दवा नहीं, मुझे तिल-तिल कर खत्म करने का धीमा ज़हर था।
अगले दिन सुबह मैं किसी से कुछ नहीं बोली। दोपहर में जब पति खेत पर गए और सास पड़ोस में बैठी थीं, मैं बहाने से गाँव के सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) पहुँची।
वहाँ की लेडी डॉक्टर मेरी पुरानी परिचित थीं। मैंने बिना किसी को बताए अपना ब्लड टेस्ट करवाया और साथ ही उस गमले की मिट्टी और बची हुई दवा की एक पुड़िया भी जांच के लिए दे दी।
तीन दिन बाद जब डॉक्टर ने मुझे बंद कमरे में बुलाया, तो उनके हाथ में टेस्ट रिपोर्ट काँप रही थी।
डॉक्टर ने गंभीर होकर कहा— "सुमन, तुम्हारी रिपोर्ट देखकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। तुम्हें पिछले छह महीने से एक ऐसा टॉक्सिन (विषैला रसायन) दिया जा रहा था जो शरीर के अंगों को धीरे-धीरे काम करने से रोकता है। अगर तुम एक हफ़्ता और यह पीतीं, तो कोई तुम्हें बचा नहीं पाता। यह इलाज नहीं, सीधे-सीधे कत्ल की साज़िश है।"
मेरे अंदर की लाचार बहू उसी पल मर गई, और एक ज़िद्दी औरत ने जन्म ले लिया।
मैंने रोने-धोने में एक पल भी नहीं गंवाया। मैंने चुपचाप अपने पिता और गाँव के सरपंच को सारी बात बताई और सबूत उनके सामने रख दिए....1/2
शादी के छह महीने बाद भी जब मेरे पति ने मुझसे कोई शारीरिक दूरी नहीं घटाई, तो मुझे लगा कि वे शर्मीले स्वभाव के हैं या मुझे वक्त देना चाहते हैं।
लेकिन हर रात सोने से पहले वे खुद अपने हाथों से मुझे एक गिलास केसर वाला दूध पीने को देते थे।
मैं उनकी इस "केयरिंग" आदत पर फिदा थी।
दूध पीने के 15-20 मिनट बाद ही मुझे इतनी गहरी नींद आती थी कि सुबह 9 बजे से पहले मेरी आँख नहीं खुलती थी।
लेकिन पिछले महीने अचानक रात के 2 बजे मेरे पेट में भयानक ऐंठन और मरोड़ उठी।
दर्द की वजह से जब मेरी नींद खुली, तो कमरा खाली था और बाथरूम से फुसफुसाने की आवाज़ें आ रही थीं।
मैं कांपते कदमों से दरवाज़े तक पहुँची।
अंदर मेरे पति फोन पर किसी से कह रहे थे—
"चिंता मत करो, मैं उसे रोज़ स्लीपिंग पिल्स की हैवी डोज़ दे रहा हूँ। जब तक उसके मायके वाले वो 50 लाख की ज़मीन मेरे नाम नहीं करते, मैं इस शादी को कभी कंज्यूमेट (Consummate) नहीं होने दूंगा... ताकि बाद में 'नापुंसकता' या 'लड़की की बीमारी' का झूठा आरोप लगाकर आसानी से एनलमेंट (शादी रद्द) का केस जीत सकूं।"
यह सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वह केसर वाला दूध कोई प्यार नहीं, बल्कि मुझे रोज़ बेहोश करने की साज़िश थी।
अगले दिन मैं चुपचाप शहर के बड़े टॉक्सिकोलॉजी लैब पहुँची और अपने ब्लड सैंपल्स दिए।
लेकिन दो दिन बाद जब रिपोर्ट आई, तो डॉक्टर ने मुझे अपने केबिन में बैठाकर जो बात कही, उसने मेरी रूह कंपा दी....1/2
शादी के दूसरे ही महीने जब मेरे पीरियड्स मिस हुए, तो सासू माँ ने पूरे खानदान में मिठाइयां बंटवा दीं कि "घर में कुलदीपक आने वाला है।"
लेकिन दो हफ़्ते बाद मुझे अचानक असहनीय दर्द हुआ और ब्लीडिंग शुरू हो गई।
जैसे ही सास को पता चला कि यह कोई गर्भ नहीं बल्कि सामान्य पीरियड्स थे, उनका चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
उन्होंने मुझे तुरंत "अपवित्र" घोषित कर दिया।
सास का फरमान था—
"पीरियड्स के पाँच दिन बहू किसी को हाथ नहीं लगाएगी, रसोई में कदम नहीं रखेगी और न ही बिस्तर पर सोएगी। उसे ज़मीन पर फटे कंबल में ही रात गुजारनी होगी!"
मेरे पति ने भी अपनी माँ के अंधविश्वास के आगे आँखें मूंद लीं। उनका कहना था—
"यह हमारे कुल की पुरानी परंपरा है, तुम्हें निभानी पड़ेगी।"
दर्द इतना था कि मुझसे उठा नहीं जा रहा था। जब मैंने गर्म पानी और दवाई मांगी, तो सास ने चिल्लाकर कहा—
"दर्द सहना ही औरत का धरम है, दवाई खाकर अपनी कोख खराब मत करो!"
चौथे दिन तेज़ बुखार और हेवी ब्लीडिंग के कारण मैं उसी गंदे कमरे के फर्श पर बेहोश हो गई।
जब होश आया, तो मैं आईसीयू में थी।
डॉक्टर ने मेरे पति और सास को बाहर बुलाकर जिस अंदाज़ में फटकार लगाई, उसने पूरे अस्पताल का ध्यान खींच लिया।
डॉक्टर ने कहा—
"अगर इस लड़की को लाने में एक घंटा और देर होती, तो सेप्सिस (इन्फेक्शन) की वजह से इसकी जान चली जाती। आप लोग 21वीं सदी में बैठकर इसे परंपरा कहते हैं?"
लेकिन असली भूचाल तब आया, जब डॉक्टर ने उस इन्फेक्शन की असली वजह बताई....1/2
ससुराल वालों ने मुझे कभी अपनी बहू माना ही नहीं था। उनके लिए मैं बस उनके इकलौते बेटे की दौलत हड़पने वाली एक "बाहरी लड़की" थी।
शादी के तीन साल बाद एक रहस्यमयी बीमारी में मेरे पति की जान चली गई।
अंतिम संस्कार की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि मेरी सास और देवर ने वसीयत का बक्सा खोल लिया।
वसीयत पढ़ते ही वकील ने जो कहा, उसने पूरे खानदान के पैरों तले ज़मीन खिसका दी—
"करोड़ों की पुश्तैनी जायदाद, फैक्ट्री और यह पुश्तैनी हवेली... सब कुछ बहू के नाम पर है।"
उस दिन के बाद से घर का माहौल नरक बन गया। सास ने खाना-पानी बंद कर दिया और देवर ने मुझ पर सीधा आरोप लगाया कि मैंने वसीयत बदलवाने के लिए उनके भाई को ज़हर देकर मारा है।
पुलिस जांच बैठी, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामान्य आई। फिर भी समाज की नज़रों में मैं अपने ही पति की कातिल बना दी गई।
दबाव इतना बढ़ा कि मैंने कह दिया—
"मुझे एक रुपया नहीं चाहिए। मैं सारे कागज़ात पर साइन करने को तैयार हूँ, बस मुझे इस घर से जाने दो।"
साइन करने के लिए जब वकील ने मुझे पति की वह निजी तिजोरी खोलने को कहा जिसकी चाबी सिर्फ मेरे पास थी, तो अंदर कुछ ऐसा निकला जिसने मेरे होश उड़ा दिए।
तिजोरी में जायदाद के असली कागज़ात नहीं थे।
उसमें मेरे पति की एक डायरी, कुछ मेडिकल पर्चे और एक पेनड्राइव रखी थी...
जब मैंने वह पेनड्राइव लैपटॉप में लगाई, तो स्क्रीन पर मेरे पति का आखिरी वीडियो संदेश शुरू हुआ...1/2
कॉलेज के पहले दिन से लेकर आज तक, वह सिर्फ़ मेरी सहेली नहीं बल्कि मेरी परछाईं थी।
हम दोनों एक ही थाली में खाना खाते थे और एक-दूसरे से कोई बात नहीं छिपाते थे।
जब मेरी सगाई शहर के एक बड़े व्यापारी के बेटे से तय हुई, तो सबसे ज्यादा खुशी उसी को हुई।
मेरी शादी की हर तैयारी में उसने दिन-रात एक कर दिया।
लेकिन शादी से ठीक दो महीने पहले अचानक मेरी तबीयत बिगड़ने लगी। उल्टियाँ होने लगीं और कमजोरी की वजह से चक्कर आने लगे।
मेरी सहेली ही मुझे चुपचाप एक प्राइवेट क्लिनिक लेकर गई।
डॉक्टर ने जांच के बाद मुझे केबिन में बुलाया और बताया—
"आप ढाई महीने की गर्भवती हैं।"
यह सुनते ही मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।
मैं रोते हुए बोली—
"यह नामुमकिन है! मेरी शादी तक नहीं हुई और मेरा किसी के साथ ऐसा कोई रिश्ता भी नहीं रहा।"
लेकिन डॉक्टर के बाहर आते ही मेरी सहेली ने सबके सामने मुझे थप्पड़ मार दिया।
वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी—
"मुझे नहीं पता था कि तू इतनी गिरी हुई निकलेगी! तूने अपने मंगेतर और माँ-बाप की इज्जत की जरा भी परवाह नहीं की!"
उसने तुरंत मेरे घर फोन कर दिया और मेरे मंगेतर को भी अस्पताल बुला लिया।
मंगेतर ने भरी भीड़ में मेरी सगाई की अंगूठी मेरे सामने फेंक दी और शादी तोड़ दी।
माँ-बाप ने भी शर्म के मारे सिर झुका लिया।
लेकिन अगले दिन जब पिता मुझे गर्भपात के लिए बड़े सरकारी अस्पताल लेकर पहुँचे, तो वरिष्ठ डॉक्टरों ने दोबारा जांच करने का फैसला किया।
कुछ देर बाद डॉक्टर ने सीलबंद रिपोर्ट खोली और तुरंत पुलिस बुलाने का आदेश दे दिया....1/2
मेरी सबसे पक्की सहेली और उसके गाँव के एक लड़के के बीच पिछले तीन साल से गहरा प्रेम संबंध था।
दोनों एक-दूसरे से बेइंतहा प्यार करते थे, लेकिन उनकी जातियाँ अलग-अलग थीं। उन्हें पता था कि परिवार इतनी आसानी से इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करेगा।
इसलिए दोनों ने फैसला किया था कि पहले लड़का शहर में नौकरी पक्की करेगा, फिर घरवालों से शादी की बात करेंगे।
लेकिन किस्मत ने अचानक ऐसा मोड़ लिया जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।
शादी से पहले ही मेरी सहेली को चक्कर और उल्टियाँ आने लगीं।
वह मुझे साथ लेकर चुपके से शहर के एक क्लिनिक पहुँची। जाँच हुई तो पता चला कि वह ढाई महीने की गर्भवती है।
यह सुनकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उसने रोते हुए अपने प्रेमी को फोन किया।
लड़के ने हिम्मत देते हुए कहा—
"घबराओ मत, मैं कल ही तुम्हारे घर आकर तुम्हारे पिता से तुम्हारा हाथ माँगूँगा।"
लेकिन अगले ही दिन क्लिनिक की एक नर्स ने, जो उसी गाँव की रहने वाली थी, यह बात पूरे गाँव में फैला दी।
कुछ ही घंटों में सहेली के घर के बाहर सैकड़ों ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई।
उसके पिता और भाइयों ने बदनामी के डर से उसे कमरे में बंद कर दिया और लड़के के घर पर हमला बोल दिया।
गाँव के चौराहे पर पंचायत बैठी और फरमान सुना दिया गया—
"लड़के का मुँह काला करके गाँव से निकालो और लड़की का गर्भ गिरवा दो!"
लड़के को घसीटकर पंचायत के बीच लाया गया। उसके कपड़े फटे हुए थे और चेहरे पर चोट के निशान थे।
तभी पंचायत के सामने एक ऐसी घटना हुई, जिसे देखकर पूरा गाँव सन्न रह गया....1/2
मेरे बड़े भाई के घर छोड़कर चले जाने के दस साल बाद भी, पिताजी हर शाम मुख्य दरवाज़े का ताला खुला रखते थे।
घर के बाकी लोग मान चुके थे कि भैया अब कभी वापस नहीं आएँगे, लेकिन पिताजी रात के दो बजे भी उठकर बरामदे की बत्ती जला देते थे।
जिस दिन पिताजी का देहांत हुआ, उनकी पुरानी मेज़ की दराज साफ करते समय मुझे एक भारी-भरकम डायरी मिली।
डायरी के पन्नों के बीच एक पीला पड़ चुका लिफाफा दबा हुआ था। उस पर भैया का नाम लिखा था।
मुझे लगा, शायद यह पिताजी का आखिरी ख़त होगा, जिसमें उन्होंने भैया से लौट आने की मिन्नतें की होंगी।
अगले दिन भैया दस साल बाद पिताजी के अंतिम संस्कार में शामिल होने घर लौटे।
मैंने चुपचाप वह लिफाफा उनके हाथ में थमा दिया।
लेकिन लिफाफा देखते ही उनके चेहरे का रंग उड़ गया। उन्होंने उसे खोला तक नहीं।
बस कांपती आवाज़ में कहा—
"जरा इसे पलटकर देखो... इसके पीछे किस बैंक की मुहर लगी है।"
मैंने जैसे ही लिफाफा पलटा, उस पर शहर के सबसे पुराने सहकारी बैंक की सील और एक तारीख दिखाई दी।
वह तारीख वही थी, जिस रात भैया घर छोड़कर गए थे।
मैंने हैरानी से पूछा, "आखिर इस बैंक की मुहर का तुम्हारे घर छोड़ने से क्या रिश्ता है?"
भैया ने दीवार का सहारा लिया और जो सच बताया, उसे सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई....1/2
मेरी बड़ी बहन की कैंसर से मौत के बाद उसका छह महीने का मासूम बेटा बिल्कुल बेसहारा हो गया था।
दोनों परिवारों ने बच्चे की परवरिश के लिए मेरी शादी मेरे जीजाजी से करवा दी।
जीजाजी अपनी दिवंगत पत्नी यानी मेरी दीदी से बेइंतहा मोहब्बत करते थे।
शादी की पहली रात उन्होंने मुझसे साफ कह दिया—
"इस रिश्ते में तुम सिर्फ़ बच्चे की माँ बनकर रहना। पत्नी बनने की उम्मीद कभी मत रखना। मेरे दिल में तुम्हारी दीदी के अलावा किसी और की जगह नहीं हो सकती।"
मैंने भी उस मासूम बच्चे की खातिर इस बेनाम रिश्ते को स्वीकार कर लिया।
लेकिन शादी के पाँच महीने बाद अचानक मेरी तबीयत बिगड़ी। अस्पताल में डॉक्टर ने बताया कि मैं गर्भवती हूँ।
यह सुनते ही घर में सन्नाटा छा गया।
जीजाजी ने मुझे बंद कमरे में ले जाकर गुस्से से पूछा—
"जब हमारे बीच कभी कोई शारीरिक संबंध बना ही नहीं, तो यह बच्चा किसका है?"
अगले दिन सोनोग्राफी की रिपोर्ट आई।
उसमें गर्भ की उम्र साढ़े छह महीने लिखी थी, जबकि हमारी शादी को सिर्फ़ पाँच महीने हुए थे।
जीजाजी ने पूरे परिवार के सामने मुझे चरित्रहीन कह दिया।
माँ-बाप भी समाज के डर से खामोश रहे।
भरी पंचायत में बेइज्जत होने के बाद मैं उसी रात घर छोड़कर चली गई।
लेकिन अगले हफ्ते जब महिला आयोग और वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ की देखरेख में मेरी पुरानी मेडिकल रिपोर्ट्स की दोबारा जांच हुई, तो एक ऐसा सच सामने आया जिसने सबको हिलाकर रख दिया....1/3
बॉस ने कहा—“मेरी पत्नी को तलाक दिलवा दो, तुम्हें कंपनी का पार्टनर बना दूँगा!”
मैं एक बड़ी प्राइवेट कंपनी में पिछले 4 साल से पर्सनल असिस्टेंट के पद पर काम कर रही थी।
बॉस मुझ पर काफी भरोसा करते थे। उनकी पत्नी भी कभी-कभी ऑफिस आया करती थीं।
एक दिन बॉस ने मुझे अपने केबिन में बुलाया और कहा
“तुम्हें एक बहुत जरूरी काम देना है।”
मैंने पूछा, “जी सर, बताइए।”
वह बोले—
“मुझे अपनी पत्नी से तलाक चाहिए, लेकिन मैं सीधे तलाक नहीं लेना चाहता।”
मैं हैरान रह गई।
मैंने पूछा, “तो इसमें मेरी क्या भूमिका है?”
बॉस मुस्कुराकर बोले—
“तुम मेरी पत्नी के करीब जाओ, उसका भरोसा जीतो और उसे ऐसा महसूस करवाओ कि मैं उसे धोखा दे रहा हूँ। वह खुद तलाक मांग लेगी।”
मैंने कहा, “सर, यह तो गलत है। मैं किसी का घर क्यों बर्बाद करूँ?”
बॉस ने जवाब दिया—
“तुम्हें कंपनी का पार्टनर बना दूँगा। जिंदगीभर नौकरी नहीं करनी पड़ेगी।”
मैंने उस समय कोई जवाब नहीं दिया।
लेकिन अगले दिन जब बॉस की पत्नी ऑफिस आईं, तो उन्होंने मुझे एक ऐसा राज बताया जिसे सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई…1/2....
मैं अपने बॉयफ्रेंड को 6 महीने से डेट कर रही थी।
वह मुझे बहुत सीधी-सादी और समझदार लड़की समझता था।
लेकिन मेरी एक आदत थी। मैं हर छोटी-बड़ी बात याद रखती थी।
किसने कब झूठ बोला, किसने वादा तोड़ा और किसने कब बहाना बनाया।
मेरे फोन में बाकायदा एक डायरी थी।
एक दिन वह मेरे घर आया हुआ था। मैं बाथरूम में थी और तभी मेरे फोन पर एक मैसेज आया।
उसने मैसेज खोला तो उसमें लिखा था—
"आज इसे बिना बताए टेस्ट करना है। देखते हैं, पिछली बार की तरह फिर झूठ बोलता है या नहीं।"
मैं बाहर आई तो उसने मेरा फोन दिखाकर पूछा—
"तुम मेरा टेस्ट कब से ले रही हो?"
मैंने मुस्कुराकर कहा—
"जानू, मेरी डायरी मिल गई क्या?"
वह बोला—
"डायरी? इसमें तो मेरी पूरी चार्जशीट बनी हुई है!"
लेकिन जब उसने डायरी का अगला पन्ना खोला, तो उसमें लिखी बात पढ़कर उसके.....1/2
हिंदू: तुम्हारे यहां अल्लाह की इबादत की जाती है और हमारे यहां भगवान की पूजा। फिर भी कुछ लोग एक-दूसरे के धर्म को गलत क्यों बताते हैं?
मुस्लिम: क्योंकि हर इंसान अपने धर्म को सही मानता है।
हिंदू: अपने धर्म को सही मानना गलत नहीं है, लेकिन दूसरे के धर्म का अपमान करना कहां तक सही है?
मुस्लिम: तुम्हारे यहां भी तो कई लोग हमारे धर्म के खिलाफ बोलते हैं।
हिंदू: मैं उन लोगों की भी आलोचना करता हूं जो बिना समझे किसी के धर्म का अपमान करते हैं।
मुस्लिम: लेकिन तुम्हारे यहां जात-पात की समस्या है।
हिंदू: हां, यह एक सामाजिक समस्या है। लेकिन क्या किसी सामाजिक बुराई के आधार पर पूरे धर्म के लोगों को गलत ठहराना उचित है?
मुस्लिम: तुम्हारी बात में कुछ दम है, लेकिन हमारे धर्म को भी लोग गलत समझते हैं।
हिंदू: तो फिर एक सवाल है, अगर कोई व्यक्ति तुम्हारे धर्म के नाम पर गलत काम करे, तो क्या उसके लिए सभी मुसलमान जिम्मेदार होंगे?
मुस्लिम: नहीं, किसी एक के अपराध की सजा पूरे समाज को नहीं दी जा सकती।
हिंदू: बस, मैं भी यही समझाना चाहता हूं ....1/2








