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Official A/C of Indo-Islamic Heritage Center 🇮🇳

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यह मज़ार अलीगढ़ रेलवे स्टेशन और 'काठपुल' (लकड़ी के पुल) के पास वाक़ई है। बाबा बरछी बहादुर की असली तारीख़ या इतिहास से ज़्यादा लोगों में सुनी-सुनाई बातें और रिवायतें मशहूर हैं। शुरुआती 1960 के दशक में बनी इस दरगाह पर इब्तिदा (शुरुआत) में सिर्फ़ एक छोटा सा मज़ार और रेलवे लाइन के किनारे नीम का एक दरख़्त हुआ करता था, जहाँ स्थानीय लोग आकर फूल चढ़ाते और दुआ मांगते थे, और वहाँ से गुजरने वाली ट्रेनें भी अक्सर इस मक़ाम पर कुछ देर के लिए रुकती थीं। सबसे आम रिवायत यह है कि बाबा बरछी बहादुर, सय्यद तहब्बुल हुसैन थे—जो दिल्ली के सूफी बुजुर्ग ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के मुरीद (शिष्य) और ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी के सिलसिले से ताल्लुक रखते थे। 1940 के दशक में जोरार हुसैन नाम के एक नेक और परहेजगार इंसान इस मक़ाम की तरफ़ माइल हुए। उनकी मौजूदगी से शाह जमाल की दरगाह से जुड़े कई हिंदू और मुस्लिम अकीदतमंद (श्रद्धालु), खिदमतगार (सेवक) के रूप में यहाँ खींचे चले आए। उनकी देखरेख में इस मज़ार का कायाकल्प हुआ और यहाँ एक मस्जिद, संगमरमर की दीवारें, एक शानदार दरवाज़ा और दूसरी सहूलियतें तामीर की गईं। 1961 तक इसे सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड से मान्यता मिल चुकी थी, जिसके बाद एक इंतेज़ामिया (प्रबंध) कमेटी बनाई गई और हर साल अक्टूबर के महीने में उर्स का आयोजन शुरू हुआ। 1973 में जोरार हुसैन के इंतकाल के बाद उन्हें भी बाबा बरछी बहादुर के पहलू में ही दफ़्न किया गया। जोरार हुसैन न सिर्फ़ अपनी नेकी और ईमानदारी के लिए जाने गए, बल्कि उनकी वफात के बाद अकीदतमंदों का मानना था कि वह रूहानी तौर पर या ख्वाबों में आकर लोगों को मशविरा और रहनुमाई देते थे। हालाँकि आज भी इस दरगाह का नाम बाबा बरछी बहादुर के नाम पर ही है और यहाँ उर्स भी बड़े पैमाने पर मनाया जाता है, लेकिन असल में आज भी यहाँ ज़्यादातर लोग जोरार हुसैन की ही मकबूलियत और शोहरत की वजह से खींचे चले आते हैं।
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आज के दिन ही, 3 नवंबर 1618 ई. में, गुजरात के दाहोद में शाहजहां और मुमताज महल के तीसरे बेटे और छठे बच्चे के रूप में औरंगजेब की पैदाईश हुयी थी। उस वक्त हिन्दुस्तान पर उन के दादा जहांगीर की हुकूमत कायम थी। कुछ ही हफ्तों बाद उनके वालिद शाहबुद्दीन मुहम्मद खुर्रम ने उनकी पैदाइश का जश्न मनाया। जिसमें उन्होंने अवाम को अपने नवजात बेटे का दीदार कराया, खैरात में जवाहरात से भरी तश्तरियां बांटी, दर्जनों हाथी बांटे। औरंगज़ेब शाहजहां के तीसरे बेटे थे, दारा शिकोह और शाह शुजा से छोटे, लेकिन उनकी पैदाइश के एक बरस बाद उन का छोटा भाई मुराद भी आ गया। ये चारों सगे भाई थे। इन सभी की पैदाइश शाहजहां की सबसे पसंदीदा बीवी मुमताज महल से हुयी थी। शाहजहां के चारों बेटे बड़ी कमसिन उमर से ही मुग़लिया तख्त के मुक़ाबले में जकड़ गए थे। मुग़ल सेंट्रल एशिया के इस रिवाज को मानते के थे कि सियासी ताक़त हासिल करने के लिए खानदान का हर शख्स बराबर का हक़दार होगा। लेकिन अकबर ने हुकूमत पर क़ानूनन दावेदारी के इस बड़े-से घेरे को काटकर बेटों तक ही सिकोड़ दिया था माने भतीजों और चचेरे भाइयों का पत्ता साफ़ कर दिया था। महज सोलह साल की कमसिन उम्र से ही शहजादे औरंगज़ेब को शाहजहां ने हुकूमत संभालने में मदद करने के लिए दरबार से दूर भेज दिया था। 22 बरस का लंबा फ़ासला यानी 1635 से 1657 तक का वक़्त उन्होंने मुग़ल-सल्तनत की सरहदें नापते हुए बिताया, बल्ख, बुंदेलखंड और कांधार में जंग के मैदानों में जूझते हुए और गुजरात, मुल्तान और दक्कन की हुकूमत संभालते हुए। इस दौरान उन्होंने अपने आप को अपने सभी भाइयों से बेहतर साबित कर के दिखाया। और जब सितंबर 1657 में शाहजहां की बीमारी के बाद तख़्त के लिए जंग छिड़ी तब वह हिंदुस्तान का तख़्त हासिल करने में कामयाब रहे। उन्होंने ने पूरे उनचास बरस पंद्रह करोड़ लोगों पर हुकूमत की। मुग़ल-सल्तनत की सरहदों को ख़ूब फैलाया। इंसानी तवारीख़ में पहली बार ऐसा हुआ था कि किसी ने हिंदुस्तानी उपमहाद्वीप के ज्यादातर हिस्से को एक हुकूमत के साये तले समेट कर रख दिया था। क़ानूनी संहिताओं (ज़ाब्ता) की तशरीह (व्याख्या) और उन्हें अमल में लाने के लिए औरंगजेब ने यादगार काम किए। इंसाफ़परस्ती के लिए हर तबके और हर मज़हब के लोगों ने औरंगज़ेब आलमगीर की दाद दी। उनके दौरे हुकूमत में मुग़ल सल्तनत अपने उरूज पर थी। औरंगज़ेब अपने समय के सबसे दौलतमंद और ताक़तवर शख़्स थे। उनके समय में मुग़ल सल्तनत की सीमा काबुल से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैली हुयी थी, जबकि दक्षिण में दक्कन के अंतिम छोर तक फैली हुयी थी। उन्होंने अपनी सल्तनत में शरीयत को लागू किया था। इनके ही दौर में उलेमा-ए-कराम ने पूरे आठ सालों की मेहनत लगा कर 'फतवा-ए-आलमगीरी' को तैयार किया था। उन्होंने दक्षिण में 4 मिलियन वर्ग किलोमीटर तक सल्तनत को फैलाया और 1690 में 450 मिलियन डॉलर के वार्षिक राजस्व के साथ 15 करोड़ से अधिक की आबादी पर हुकूमत की। उनके दौर में हिंदुस्तान चीन के किंग राजवंश को पीछे छोड़ दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया था। जिसकी कीमत 90 बिलियन डॉलर से अधिक थी, जो सन 1700 में दुनिया की जीडीपी का लगभग एक चौथाई (25%) था। लेकिन फिर भी वो अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कुरान की किताबत करते थे (माने नकल तैयार करते थे) और टोपियाँ बुनते थे। ये दोनों ही उनके ख़ासे पाक क़िस्म के शौक थे। इसके अलावा उन्होंने 1660 तक मुकम्मल क़ुरान को हिफ्ज कर लिया था। (माने वो 1660 तक हाफिजे कुरान हो चुके थे) औरंगजेब ने अपने दौर-ए-हुकूमत में 30 से ज़्यदा जंगे लड़ीं, जिनमें से 11 जंग की कमान उन्होंने खुद ही संभाली। #Aurangzeb #MughalEmpire
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शेख़ बुरहानुद्दीन को सुल्तान ग़ियासुद्दीन बलबन के शासनकाल में एक बड़े विद्वान के रूप में बहुत शोहरत मिली थी। वे ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी के प्रमुख ख़लीफ़ाओं में से एक थे और अफ़ग़ानिस्तान के बल्ख़ शहर से आए थे यह सूफ़ी संत सितार से बहुत मोहब्बत करते थे। वे अक्सर कहा करते थे कि उनका सबसे बड़ा “गुनाह” यही है कि उन्हें सितार सुनने में बहुत आनंद आता है शेख़ बुरहानुद्दीन की क़ब्र की जगह को पहले “तख़्त-ए-नूर” यानी रोशनी का तख़्त कहा जाता था। लोग अपने बच्चों को यहाँ लाते थे और ऊँचे मिट्टी के चबूतरे से थोड़ी-सी मिट्टी खिलाते थे उनका विश्वास था कि शेख़ बुरहानुद्दीन की बरकत से बच्चे दुनियावी और रूहानी दोनों तरह की इल्म में आगे बढ़ेंगे। अफ़सोस की बात है कि आज इस जगह की पवित्रता पूरी तरह खत्म हो चुकी है
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उत्तर प्रदेश के एक कायस्थ परिवार में पैदा हुए भीम सेन सक्सेना मुगल सम्राट औरंगज़ेब आलमगीर के सबसे ख़ास लोगों में थे। जिन्होंने औरंगज़ेब के दकन जीतने के महत्वाकांक्षी सपने को मिर्ज़ा राजा जय सिंह के साथ मिलकर पूरा किया। उन्होंने न सिर्फ़ बीजापुर की सल्तनत को ख़त्म किया, बल्कि मराठों को सर करने में सबसे आगे आगे रहे, यहाँ तक कि मराठे इनके नाम से घबराने लगे थे। वैसे भीम सेन सक्सेना औरंगज़ेब की उस फ़ौज के अहम हिस्सा थे, जिन्होंने दारा शिकोह को हराया। भीम सेन सक्सेना एक योद्धा के साथ एक बड़े विद्वान भी थे। उनकी लिखी किताब “तारीख़ ए दिलकुशा” सभी लोगों को पढ़नी चाहिए।
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ख़्वाजा शम्सुद्दीन तुर्क पानीपति (रह.) तुर्किस्तान के रहने वाले थे और दिल से हज़रत फ़रीदुद्दीन गंज-ए-शकर (रह.) के मुरीद बनना चाहते थे। मगर बाबा फ़रीद (रह.) ने उन्हें हज़रत शेख़ अलाउद्दीन अली अहमद साबिर-ए-पाक (रह.) की ख़िदमत में भेज दिया। इसके बाद ख़्वाजा शम्सुद्दीन तुर्क कलियर शरीफ़ पहुँचे और साबिर-ए-पाक के मुरीद बने। उनकी सच्ची ख़िदमत और इबादत से ख़ुश होकर हज़रत साबिर-ए-पाक (रह.) ने उन्हें अपना एकमात्र ख़लीफ़ा बनाया। रूहानी तरबियत के लिए हज़रत साबिर-ए-पाक (रह.) ने ख़्वाजा शम्सुद्दीन तुर्क को छह साल तक पहाड़ की एक गुफ़ा में हब्स-ए-दम का वज़ीफ़ा करने का हुक्म दिया। वर्षों बाद जब उन्हें वापस बुलाया गया, तो उन्हें फिर से अपनी निगरानी में लिया और ऊँचे रूहानी मक़ाम से नवाज़ा। एक मौक़े पर हज़रत साबिर-ए-पाक (रह.) ने फ़रमाया कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रह.) के 14,000 ख़लीफ़ा तारे हैं, लेकिन मेरे शम्स—ख़्वाजा शम्सुद्दीन तुर्क—वही एक सूरज हैं
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सुल्तान बाहू ने क़ादरिया सिलसिले की एक शाख़ 'सरवरी क़ादरी' की बुनियाद रखी। उनका असल नाम सुल्तान मुहम्मद था, मगर मुसलसल 'हू' (सिर्फ़ वही ख़ुदा) के ज़िक्र में मश्ग़ूल रहने की वजह से उन्हें 'बाहू' (यानी जो ख़ुदा के साथ हो) कहा जाने लगा; उन्होंने ख़ुद लिखा कि 'एक नुक्ते के फ़र्क़ से बाहू 'या हू' बन जाता है और बाहू हमेशा 'या हू' की याद में डूबा रहता है'। उनकी शाइरी की तश्बीहात गाँव के रोज़मर्रा के कामों जैसे बाग़बानी और पौधारोपण से ली गई हैं, जिनके ज़रिये उन्होंने पिछले सूफ़ियों के अफ़कार (विचारों) को आसान नज़्मों में देहाती लोगों तक पहुँचाया, जहाँ उनके हर मिसरे का इख़्तिताम 'हू' लफ़्ज़ पर होता है जैसे उनकी मशहूर कफ़ीयत: "अलिफ़—अल्लाह चंबे दी बूटी, मुरशिद मन विच लाई हू..."। तसव्वुफ़ पर उनकी 40 से ज़्यादा किताबें मंसूब हैं, जिनमें 'नूर-उल-हुदा' और 'रिसाला-ए-रूह' शामिल हैं, मगर उनकी पंजाबी नज़्मों का मजमूआ 'अबीयात-ए-बाहू', जो वहदानियत (ख़ुदा की यकताई) पर मबनी है, अवाम में सबसे ज़्यादा मक़बूल हुआ, जिसे आज भी क़व्वालियों और काफ़ियों में ख़ास धुनों पर गाया जाता है। सुल्तान बाहू का ख़ानदान हज़रत अली की औलाद (हाशमी क़बीले) से था। उनके वालिद सुल्तान बायाज़ीद शाहजहाँ के दरबार में आला ओहदेदार थे, जिन्हें हुकूमती ख़िदमात के एवज़ में जिला झंग का शेरकोट गाँव जागीर में मिला जहाँ उनका ख़ानदान आबाद हुआ। सुल्तान बाहू की दीनी तालीम उनकी नेक वालिदा 'रास्ती' के साए में शुरू हुई, जिनकी हिदायत पर वे पहले शैख़ हबीबुल्लाह क़ादरी और फिर मज़ीद इल्म हासिल करने दिल्ली में शैख़ अब्दुल रहीम क़ादरी की ख़िदमत में रहे, जिसके बाद वे वापस पंजाब लौट आए। 1 जुमादा अल-आख़िरा 1102 हिजरी (1691 ईस्वी) को उनका इंतिक़ाल हुआ, और पाकिस्तानी पंजाब के 'गढ़ महाराजा' में वाक़े उनकी दरगाह पर आज भी सालाना उर्स के मौक़े पर अक़ीदतमंदों की मौजूदगी में उनकी सूफ़ियाना शाइरी और कलाम बड़े ज़ौक़-ओ-शौक़ से पढ़े और गाए जाते हैं।
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हज़रत नसीरुद्दीन महमूद चिराग़-ए-देहलवी की बारगाह में मौजूद 'तख़्त-ए-मुबारक' महज़ एक लकड़ी का ढांचा नहीं, बल्कि सात सदियों की उस रूहानी दास्तान का गवाह है, जहाँ हज़रत ने ज़िक्र-ए-इलाही की मशालें रौशन की थीं। यह वो मुक़द्दस ज़मीन और तख़्त है, जिसने न जाने कितनी बार वजूद की हदों को मिटकर इबादत की गहराइयों में गोते लगाते हज़रत को देखा है इस तख़्त की अजमत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि क़ुतुब-ए-आलम हज़रत ख़्वाजा बंदा नवाज़ गेसू दराज़ ने भी अपनी रूहानी तक़मील के लिए इसी बरकत वाले मुक़ाम पर अपना 40 रोज़ा कठिन 'चिल्ला' मुकम्मल किया था चिल्ला-नशीनी, जो नफ़्स की इस्लाह और रब्बे-करीम की बारगाह तक पहुँचने का एक निहायत ही पुर-असर और ज़ाती सफ़र है, आज भी इस तख़्त-ए-पाक के ज़रिए हमें हज़रत चिराग़-ए-देहलवी के फ़ैज़-ए-नज़र की याद दिलाती है। यह तख़्त आज भी एक ऐसे रूहानी चराग़ की मानिंद है, जो मुद्दतों बाद भी अपनी विलायत की ज़िया से दिल-ओ-दिमाग़ को मुनव्वर कर रहा है
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यह ईदगाह, जो आज भी इस्तेमाल में है, शहंशाह औरंगज़ेब ने एक छोटी पहाड़ी पर तामीर करवाई थी। इसका सेहन 550 मुरब्बा फ़ीट का था। क़िबले की जानिब रुख़ के लिए दीवार में एक मेहराब मौजूद है और उसके पहलू में एक मिंबर बना हुआ है। यह इमारत एक ऊंचे चबूतरे पर क़ायम है, जहां से सीढ़ियां एक अज़ीमो-शान दरवाज़े की तरफ़ ले जाती हैं। ​1857 के ग़दर के बाद, अंग्रेज़ों ने इस ईदगाह को ज़ब्त कर लिया था, जिसे बाद में हाजी क़ुतुबुद्दीन पंजाबी की जद्दोजहद की बदौलत रिहा करवाया गया।
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यह ईदगाह, जो आज भी इस्तेमाल में है, शहंशाह औरंगज़ेब ने एक छोटी पहाड़ी पर तामीर करवाई थी। इसका सेहन 550 मुरब्बा फ़ीट का था। क़िबले की जानिब रुख़ के लिए दीवार में एक मेहराब मौजूद है और उसके पहलू में एक मिंबर बना हुआ है। यह इमारत एक ऊंचे चबूतरे पर क़ायम है, जहां से सीढ़ियां एक अज़ीमो-शान दरवाज़े की तरफ़ ले जाती हैं। ​1857 के ग़दर के बाद, अंग्रेज़ों ने इस ईदगाह को ज़ब्त कर लिया था, जिसे बाद में हाजी क़ुतुबुद्दीन पंजाबी की जद्दोजहद की बदौलत रिहा करवाया गया।
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पुरानी दिल्ली में चितली कबर से तुर्कमान गेट के रास्ते पर एक बेहद पाक और ऐतिहासिक मकाम है, जिसे हम 'खानकाह शाह गुलाम अली' के नाम से जानते हैं। यह जगह नक्शबंदी सिलसिले के चार महान सूफी बुजुर्गों की अंतिम आरामगाह है, जो दिल्ली की रूहानियत का मरकज़ रही है यहाँ के सबसे पहले बुजुर्ग हजरत मिर्जा मजहर जाने-जानां (1700–1781) थे, जो एक अज़ीम इस्लामी आलिम और फारसी के मशहूर शायर थे। उनके बाद उनके सबसे काबिल खलीफा हजरत शाह गुलाम अली देहलवी (1743–1824) ने इस खानकाह की बागडोर संभाली उन्होंने ही इस जगह का विस्तार किया और यहाँ एक खूबसूरत मस्जिद बनवाई। आपकी रूहानी शोहरत इतनी फैली कि दुनिया भर से लोग आपसे फैज पाने के लिए यहाँ आने लगे, और इसी वजह से यह जगह आपके नाम से मशहूर हो गई तीसरे बुजुर्ग हजरत शाह अबू सईद फारूकी (1782–1835) थे, जिन्हें शाह गुलाम अली ने अपना उत्तराधिकारी बनाया। आपने लगभग दस साल यहाँ खिदमत की और फिर हज पर जाने से पहले जिम्मेदारी अपने बेटे हजरत शाह अहमद सईद फारूकी (1802–1860) को सौंप दी शाह अहमद सईद ने 24 साल तक इस खानकाह की देखरेख की, लेकिन 1857 की क्रांति के बाद के हालातों में आपको मजबूरन भारत छोड़कर मदीना मुनव्वरा जाना पड़ा। हिजरत से पहले आपने इस खानकाह का काम अपने खलीफा हाजी दोस्त मोहम्मद कंधारी के हवाले कर दिया था यह खानकाह आज भी दिल्ली की उन ऐतिहासिक निशानियों में से एक है जो हमें हमारे बुजुर्गों के इल्म और रूहानियत की याद दिलाती है
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भोपाल की महिला शासक नवाब सुल्तान जहां बेगम, विश्व इतिहास की पहली महिला हैं जो किसी यूनिवर्सिटी की इलेक्टेड चांसलर बनी। साल उन्नीस सौ बीस में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना के बाद उन्हें उसका पहला चांसलर बनाया गया।
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Double-decker tram in Bombay, circa 1950s. A familiar sight on the streets of Bombay (now Mumbai), these trams carried passengers across the city during the post-war years.
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आज के दिन ही, 31 अगस्त 1569 ई. को, फतेहपुर सीकरी में नूरुद्दीन मोहम्मद सलीम जहांगीर की पैदाइश हुई थी। सलीम की पैदाइश शहंशाह अकबर की लंबी-चौड़ी मिन्नतों का नतीजा थी। 27 अक्टूबर 1605 को अकबर की मौत के बाद सलीम चौथे मुगल बादशाह बने थे। 27 साल की उम्र तक अकबर के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी थी कि उनके कोई बेटा नहीं था। 1564 में ज़रूर उनके दो जुड़वा बेटे पैदा हुए थे हसन और हुसैन, लेकिन वो सिर्फ़ एक माह तक ही जिंदा रह सके। अकबर ने अपने पसंदीदा सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर मन्नत मांगी कि अगर आप मुझे एक बेटा दे दें तो मैं आगरा से अजमेर पैदल चल कर आपकी दरगाह पर सिर झुकाउंगा। आख़िर खुदा ने शहंशाह की मुराद सुन ली। उनके दरबारियों ने उन्हें ख़बर दी कि आगरा के पास ही एक पहाड़ी पर मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्द और पीर सलीम चिश्ती रहते हैं, जो आपकी मुराद पूरी कर सकते हैं। "दुनिया में कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जो अकबर के पास नहीं थी। उनके पास अगर किसी चीज की कमी थी तो वो औलाद की थी। वो इस आस में सलीम चिश्ती के पास जाने लगे। एक दिन अकबर ने सीधे उनसे पूछ ही लिया, मेरे कितने बेटे पैदा होंगे? उन्होंने जवाब दिया, ख़ुदा तुमको तीन बेटे देगा। और ऐसा ही हुआ। पहले सलीम की पैदाइश हुई फिर उसके बाद अकबर के दो और बेटे हुए। बाबर के बाद अपनी आत्मकथा लिखने वाले जहांगीर पहले मुग़ल बादशाह थे। तुजुक-ए-जहांगीरी में उन्होंने अपनी ज़िन्दगी से मुताल्लिक कई खुलासे किये हैं। जहांगीर एक रंगीन मिजाज शख्सियत के मालिक थे तुजुक-ए-जहांगीरी में उन्होंने इस बात का जिक्र किया है की वो दिन में शराब के 20 प्याले पीते थे, 14 दिन में और 6 रात में। बाद में उसे घटा कर वो एक दिन में 6 प्याले पर ले आए थे। जब वो 18 साल के थे तो एक बार वो शिकार पर गये हुए थे। उनको थकान महसूस हुई थी. किसी ने कहा कि आप थोड़ी शराब पीजिए, आपकी थकान चली जाएगी। उन्होंने पी और उन्हें वो बहुत पसंद आई। फिर तो वो रोज़ शराब पीने लगे. जहाँगीर के दोनों भाइयों को भी शराब की लत लग गई और उनकी मौत शराब की वजह से ही हुई।" "शराब तो बादशाह बाबर भी पीते थे। अकबर भी कभी कभी शराब चख लिया करते थे। लेकिन शाहजहाँ ने कभी शराब को हाथ नहीं लगाया। बल्कि जहाँगीर को इस बात का अफ़सोस रहता था कि उनका बेटा 24 साल का हो गया है और उसने आज तक शराब का एक घूंट तक नहीं लिया है। ये कैसे हो सकता है?" जवाहरलाल नेहरू की किताब ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ के मुताबिक़ जहांगीर और शाहजहां अकबर के दर्जे के हुक्मरान नहीं थे। पर वे दोनों इसलिए हुकूमत कर पाए क्योंकि उन्होंने अकबर के कायमकर्दा शाही और सामाजिक ढांचे को बरकरार रखा था। नेहरू के मुताबिक़ अकबर ने इस ढांचे को इतनी खूबसूरती से खड़ा किया था कि उनके जाने के 100 साल बाद तक हिंदुस्तान को कोई खास परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा।
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जश्ने ईद मिलाद उन नबी ﷺ की तमाम लोगो को बहुत मुबारकबाद
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आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र और बेगम ज़ीनत महल का निकाहनामा, 18 नवंबर 1840.
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भारत को आज़ादी मिल चुकी थी. पलायन का दौर जारी था. भारत के मुसलमान पलायन करके पाकिस्तान जा रहे थे और पाकिस्तान के सिक्ख और हिन्दू पलायन करके भारत आ रहे थे. इसी बीच भारत में भयंकर साम्प्रदायिक दंगा हुआ. गाँधी जी नावाखोली में उपवास पर थे. जब स्थिति सामान्य हुई तो गाँधी जी दिल्ली वापस लौटे. दिल्ली की स्थिति ऐसी भयावह थी की सरदार पटेल से गाँधी जी बोले "मैं तो इस दिल्ली में आसानी से घूम सकता हूँ मग़र ज़ाकिर हुसैन इस दिल्ली में नहीं घूम सकते. जबकि दिल्ली जितनी हिंदुओं की है उतनी ही मुसलमानों की है". पाकिस्तान से आये हुए सिक्ख और हिंदु शरणार्थियों ने दिल्ली के मस्जिदों और मज़ारों पर क़ब्ज़ा कर लिया. उनको ऐसा लगा की मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बन गया है भारत के सभी स्थलों पर उनका क़ब्ज़ा है. कनॉट प्लेस की मस्ज़िद, महरौली के दरगाह और पुराना किला इत्यादि के भीतर शरणार्थियों ने रहना शुरू कर दिया. गाँधी जी जब नावाखोली से वापस लौटे तब वह कनॉट प्लेस के मस्ज़िद, महरौली के दरगाह और पुराना किला का दौरा किये. अपने दौरे में उन्होंने शरणार्थियों से मस्ज़िद, दरगाह और किला ख़ाली करने का आग्रह किया. गाँधी ऐसे लोगों से आग्रह कर रहे थे जिनके भीतर पाकिस्तान से अपना सबकुछ लुटा और खो देने के बाद गुस्सा और नफ़रत भरा हुआ था. इसके बावजूद भी गाँधी जी ख़ाली कराने में सफ़ल हुए. उस परिस्थिति में जब शरणार्थियों के पास कुछ भी नहीं था तब दिल्ली की दर्जनों मस्ज़िद, दरगाह और किला पर से क़ब्ज़ा हटा लिया गया. जब उसी भारत में 6 दिसम्बर 1992 को एक मस्ज़िद को शहीद किया जा रहा था तब उसी गाँधी के काँग्रेस ने मौन सहमति दे दिया. दरअसल देश की जनता साम्प्रदायिक नहीं है यदि साम्प्रदायिक होती तो गाँधी जी दिल्ली में सफल न होते. साम्प्रदायिक तो यह राजनितिक व्यवस्था है. Trique
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पटौदी के नवाब इफ़्तिख़ार अली ख़ान और भोपाल नवाब बेगम साजिदा सुल्तान की शादी की यह तस्वीर 1939 में भोपाल की एक प्रोफ़ेशनल महिला फ़ोटोग्राफ़र ने क्लिक की थी। जिसमें नवाब पटौदी और साजिदा सुल्तान की "सलामी" रस्म के दौरान अन्य महिलाओं के साथ दिख रही हैं। सलामी मुस्लिम शादियों में एक रस्म होती हैं जहां महिलाएं दूल्हा दुल्हन को तोहफ़े देती हैं। उस समय भोपाल में पर्देदारी की वजह से दूल्हा के साथ उसके दोस्तो या दूसरे मर्दो को औरतों में जाने की इजाज़त नहीं होती थी, इसलिए किसी पुरुष फ़ोटोग्राफ़र को भी औरतों में जाने की इजाज़त नहीं दी गई। ऐसा माना जाता है कि यह पहली बार था कि किसी मुस्लिम शादी में सलामी रस्म की तस्वीरें खींची गईं, ये 1939 का दौर था।
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अफगानिस्तान के काबुल शहर में मौजूद ये जगह बाग ए बाबर के नाम से जानी जाती है। और इस बाग में मुगलिया खानदान के कई अफ़राद आराम फरमा रहे हैं। उन्हीं में से एक हैं मिर्ज़ा मुहम्मद हकीम, आज मिर्ज़ा मुहम्मद हकीम का जिक्र करने का मकसद बहुत खास है। आज के दिन ही 10 अगस्त 1581 ई. के रोज़ मुग़ल बादशाह अक़बर ने अपने भाई मिर्ज़ा मुहम्मद हकीम को हराकर क़ाबुल फ़तह कर लिया था। बादशाह हुमायूं की वफ़ात के बाद क़ाबुल मिर्ज़ा मुहम्मद हकीम को मिला था लेकिन वो अपने बड़े भाई बादशाह अक़बर की रियासत पंजाब को अपनी रियासत में मिलना चाहते जिसके लिए कई बार वो पंजाब पर हमला भी कर चुके थे। बार बार हमले से तंग आकर अक़बर ने 10 अगस्त 1581 को क़ाबुल पर हमला कर के काबुल फ़तह कर लिया। अक़बर ने मिर्ज़ा मुहम्मद हकीम को तख़्त से हटाकर अपनी बहन बख्त-उन-निस्सा बेगम को क़ाबुल का गवर्नर बना दिया।
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हैदराबाद के निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान जब मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब आलमगीर की क़ब्र पर फ़ातिहा पढ़ने गए, तो उन्होंने पहले कब्र के बाहर इंतज़ार किया और अंदर जाने की इजाज़त मांगी। और अंदर जाने से पहले उन्होंने अपने चोबदारों को अपनी शाही लक़ब को पुकारने से मना किया, और ख़ुद को दक्कन का मुग़ल सूबेदार घोषित किया। भले ही मुग़लों का ज़वाल ज़माने पहले हो चुका था, लेकिन मीर उस्मान अली ख़ान ने अपने पूर्वज हैदराबाद के पहले निज़ाम निज़ाम उल मुल्क की वसीयत के सम्मान में ऐसा किया था, क्यूंकि निज़ाम उल मुल्क ने वसीयत में तय किया गया था, की निज़ाम मुगलों को अपने अधिपतियों के रूप में सम्मान और सेवा देना जारी रखेंगे। ठीक यही हाल बिहार में जागीर पाए दरभंगा महाराज और बेतिया महाराज का था, इन्होंने 1857 के बाद भी मुग़लों को सम्मान देना बंद नहीं किया, जबकि दरभंगा वाले ब्राह्मण थे और बेतिया वाले भूमिहार।
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