जिस जगदलपुर की पहचान कभी बंदूकों की गूँज से होती थी, आज उसी बस्तर में ढोल, मांदर और लोकगीतों की मधुर धुन गूँज रही है।
आज ‘बस्तर के संग’ लोक सांस्कृतिक कार्यक्रम में यह देखकर मन हर्ष से भर गया कि अब यह क्षेत्र अपनी संस्कृति, कलाओं और धरोहरों को सहेज रहा है, और इन्हें विश्व पटल पर भारत का गौरव बढ़ाने से कोई नहीं रोक सकता।