एक स्कॉर्पियो या थार लो, आगे किसी राजनीतिक दल
का छोटा सा झंडा लगाओ या फिर पीछे एक जातिसूचक शब्द लिखवाओ, उसके बाद सड़क आपकी और आपके बाप की ।
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सच ही कहा है किसी ने....
हवन करने में भी हाथ जलता है....
दो साल पहले Zomato के CEO दीपिंदर गोयल ने एक बड़ा ही नेक काम शुरू किया था। उन्होंने देशवासियों के लिए 'Blinkit Ambulance' (इटरनल फाउंडेशन) नाम से एक सेवा शुरू की।
मकसद बहुत साफ और पवित्र था— बिना एक भी रुपया लिए। सब कुछ एकदम शानदार और सुकून देने वाला लग रहा था, है ना?
लेकिन... पिक्चर अभी बाकी थी! गोयल साहब शायद भूल गए थे कि उन्होंने यह सेवा किस देश में लॉन्च की है...
शायद अमेरिका या जापान में करते तो पूरा विश्व तारीफ करता.... लेकिन हमारे यहाँ 'मुफ्त' शब्द सुनते ही लोगों के अंदर का सोया हुआ 'जुगाड़ी आइंस्टीन' जाग जाता है।
हुआ ये कि हमारी महान जनता ने लाइफ-सेविंग एंबुलेंस को 'फ्री की ओला-उबर' समझ लिया!
दादी को रूटीन चेकअप के लिए अस्पताल ले जाना है? करो फ्री एंबुलेंस बुक....
अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर जाना है और कैब के 400-500 रुपये बचाने हैं.....?
लगाओ फ्री एंबुलेंस को फोन.....
मतलब जो गाड़ी किसी मरते हुए इंसान की जान बचाने के लिए चौबीसों घंटे तैयार खड़ी थी, उसे हमारे समझदार नागरिकों ने अपनी पर्सनल टैक्सी बना डाला!
जब डेटा सामने आया तो पता चला कि आधे से ज्यादा कॉल्स तो इमरजेंसी थे ही नहीं...
अब जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो मजबूर होकर आज दीपिंदर गोयल को घोषणा करनी पड़ी कि— भइया, अब से अगर आपने 'नॉर्मल चेकअप' या 'घर जाने' के लिए एंबुलेंस बुलाई, तो सीधे 2,500 रुपये का तगड़ा चार्ज देना पड़ेगा....!
(हालांकि, राहत की बात यह है कि असली मेडिकल इमरजेंसी के लिए यह सेवा आज भी फ्री रहेगी, लेकिन अब छानबीन के बाद।)
अक्सर हम दिन-रात 'सिस्टम' को गालियां देते हैं।
लेकिन सोचिए, हम खुद कैसे नागरिक हैं?
जो चीज हमें मुफ्त में भलाई के लिए दी गई, हमने चंद रुपये बचाने के लालच में उसकी ऐसी-तैसी कर दी।
कल को अगर कोई उद्योगपति या संस्था अपना पैसा लगाकर देश का भला करना भी चाहेगी, तो वो दस बार सोचेगी कि इन mdcd लोगों पर भरोसा कैसे किया जाए.....
अगर किसी की झूठी बुकिंग (कि मुझे घर छोड़ दो) के चक्कर में एंबुलेंस फंसी रहती और उसी वक्त किसी असली मरीज की तड़पकर जान चली जाती, तो उसका जिम्मेदार कौन होता....?
सरकार? एंबुलेंस वाला? जी नहीं...
हम और हमारी घटिया सोच! जब तक हम अपनी नागरिक जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, हमारे लिए कुछ भी अच्छा करना भैंस के आगे बीन बजाने जैसा ही है।
क्या दीपिंदर गोयल ने 2500 रुपये का फाइन लगाकर बिल्कुल सही किया?
या हमारी 'फ्री वाली मानसिकता' का कोई और इलाज भी है? कमेंट्स में अपनी बात जरूर रखें!!!
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पता चला कि उसने वर्षों तक अतिरिक्त शिफ्ट की थी। कई बार छुट्टियाँ बची रह गई थीं और कई बार त्योहारों पर भी काम किया था।
राजेश ने कहा, “हरिराम, तुम्हें आज से काम करने की जरूरत नहीं है। तुम्हारी सेवा का पूरा हिसाब निकालकर दिया जाएगा। तुम्हें जो भी नियमों के अनुसार बकाया लाभ मिलते हैं, वे पूरे दिए जाएँगे।”
हरिराम घबरा गया।
“साहब, मुझसे कोई गलती हो गई क्या?”
राजेश ने कहा, “नहीं। गलती हमारी थी। हम तुम्हारे काम का हिसाब रखते रहे, लेकिन यह भूल गए कि तुम्हारी भी एक जिंदगी है।”
उस दिन राजेश ने एक और फैसला लिया।
फैक्ट्री के सभी पुराने कर्मचारियों का सेवा रिकॉर्ड जाँचा गया। जिन कर्मचारियों की छुट्टियाँ, भविष्य निधि, ग्रेच्युटी या अन्य वैधानिक लाभ बकाया थे, उनका हिसाब ठीक करवाया गया।
साथ ही पुराने कर्मचारियों के लिए समय पर स्वास्थ्य जाँच और सेवानिवृत्ति से पहले परामर्श की व्यवस्था शुरू की गई।
अमित को भी नौकरी मिल गई।
लेकिन उसने एक बात साफ कर दी।
“सर, मुझे मेरे पिता की जगह नहीं चाहिए। मुझे मेरी योग्यता के अनुसार काम दीजिए। मैं नहीं चाहता कि लोग कहें कि मुझे पिता की पहचान से नौकरी मिली है।”
राजेश मुस्कराया।
“तुम्हारी यह बात तुम्हारे पिता की सबसे बड़ी कमाई है।”
वह आखिरी दिन
तीन महीने बाद हरिराम का फैक्ट्री में आखिरी कार्यदिवस था।
उस दिन उसने पहली बार अपनी पुरानी मशीन को छूकर देखा।
उसकी आँखों में आँसू थे।
साथ काम करने वाले मजदूरों ने उसे माला पहनाई। किसी ने मिठाई दी तो किसी ने पुराने दिनों की बातें छेड़ दीं।
अमित भी वहाँ मौजूद था।
राजेश ने उसे एक लिफाफा दिया, जिसमें उसकी सेवा से संबंधित भुगतान और दस्तावेज थे।
हरिराम ने लिफाफा बेटे को पकड़ाया और बोला—
“इसे संभालकर रखना। इसमें सिर्फ पैसे नहीं हैं, तेरी पढ़ाई के कई साल पड़े हैं।”
फिर वह धीरे-धीरे गेट की तरफ बढ़ने लगा।
अचानक उसने पीछे मुड़कर कहा—
“साहब, एक बात कहूँ?”
राजेश ने कहा, “बोलो हरिराम।”
“जब कोई नया मजदूर आपके यहाँ नौकरी करने आए, तो उससे सिर्फ यह मत पूछिएगा कि वह कितना काम कर सकता है। कभी यह भी पूछ लीजिएगा कि उसके घर में कौन-कौन उसका इंतजार करता है।”
राजेश की आँखें झुक गईं।
हरिराम अपने बेटे के साथ फैक्ट्री से बाहर निकल गया।
उस दिन पहली बार वह घर लौटते समय जल्दी में नहीं था।
रास्ते में अमित ने पूछा, “पापा, घर चलें?”
हरिराम ने कहा, “नहीं बेटा, पहले उस मेले में चलेंगे।”
अमित मुस्करा दिया।
“कौन-सा मेला?”
हरिराम की आँखें भर आईं।
“वही, जहाँ तुझे बचपन में ले जाने का वादा किया था।”
बत्तीस साल पुराना वादा उस दिन पूरा होने जा रहा था।
जिस पिता ने पूरी जिंदगी अपने बच्चों को बड़ा करने में लगा दी, वह पहली बार अपने बेटे के साथ बच्चा बनकर मेला देखने जा रहा था।
कभी-कभी माता-पिता को पैसों की नहीं, अपने बच्चों के साथ बिताए हुए उन पलों की जरूरत होती है, जिन्हें वे जिम्मेदारियों के कारण पूरी जिंदगी टालते रहे।
✍️ लेखिका: वंदना त्रिपाठी
Vandna Tripathi ✍️
Let’s stay away from stupid @bigbasket_com They canceled the order by themselves and mentioned that it is cancelled on my request. Pathetic and shameful.
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Hey @Flipkart you seriously have the WORST customer service ever! Your shitty AI bot keeps sending the same useless replies every single time. No real solutions, no human support, just endless frustration. Is this what you call customer care? Absolutely pathetic and unacceptable
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Replying to @shivlalpatel18
Andhbhakti ki bhi seema kanha tak hai iss ko dekh kar pata chalta hai
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जब आदमी अंधा हो जाए तो किसी सबूत की ज़रूरत नहीं होती है
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टूल किट सक्रिय हो गए
सरकार को डिफेंड करने के लिए अमेरिका से LPG हम खरीद रहे हैं यह किस खुशी में
सस्ता तेल ईरान से ले रहे थे की दबाव में हमने डाल दिया चाबहार पोर्ट जिसे हम डेवलप कर रहे थे हजारों करोड़ हमने वाहन फूंक दी परंतु मंदबुद्धि इस पर बात नहीं करेंगे
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Replying to @shivlalpatel18
वाट्सअप बिष विद्यालय की जय हो...
अरे महामुर्ख अंधभक्त 2008 से पहले से ही वेनजुएला का तेल भारत के रिफाइनरी में रिफाइंड हो रहे हैं, यह दुनिया को पता है।
2008 से पहले से ही भारत वेनजुएला से कच्चा तेल खरीद रहा है।
ये मुर्ख अंधभकत सबको मुर्ख समझा है क्या?
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सरकारी सिस्टम किस तरह आम इंसान को परेशान करता है, समझ लीजिये
पटवारी की मासिक सैलरी - 40000
तहसीलदार की मासिक सैलरी - 90000
रजिस्ट्रार की मासिक सैलरी - 1 लाख लगभग
कोर्ट क्लर्क की मासिक सैलरी - 21000
इनका काम है पब्लिक के कोर्ट कचहरी के कामों को आसान बनाना. लेकिन ये करते क्या हैँ??
पटवारी - ड्यूटी पर मिलता नहीं है
तहसीलदार - मर्ज़ी से आकर ड्यूटी करता है
रजिस्ट्रार - 8 घंटे की ड्यूटी में 4 घंटे मिलेगा
क्लर्क - ये कागज लाओ, ये ठीक नहीं है बोलेगा
आम इंसान कोर्ट का कोई भी काम कराये, उसको चक्कर जरूर कटवाए जाते हैँ.
इसका अनुभव मैंने 5 दिन में किया है.
और नेताओं के काम घर बैठे होते हैँ.
कुछ गलत कहा तो बताओ
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आम व्यक्ति किसी देश की एम्बेसी से वीजा लेता है, तो उसके पासपोर्ट नंबर की एंट्री हो जाती है।
फिर एयरपोर्ट पर,जैसे ही वह इमिग्रेशन पर खड़ा होता है, वहाँ -पासपोर्ट औऱ वीजा दोनों स्केन होते है। उसका डेस्टिनेशन, फ्लाइट डिटेल्स, सब कुछ विदेश मंत्रालय की निगाह मे होता है।
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पर अगर वह व्यक्ति सांसद - MP है -
तो उसके पास टाइप D डिप्लोमेटिक पासपोर्ट है।
अब उसे किसी भी यात्रा के लिए सरकार से प्रायर "पॉलिटिकल क्लियरेंस" की जरूरत है।
आवेदन कम से कम यात्रा के 3 हफ्ते पहले दिया जाता है। जिसे पूरी ऐटेनरी पढ़, समझ, जानकर ही - सरकार अनुमति देती हैं।
फिर संबंधित एम्बेसी को "पॉलिटिकल क्लियरेंस" की सूचना दी जाती है, ताकि उस देश मे हमारी एम्बेसी, पॉलिटिकल क्लियरेंस की शर्तो नियमों का कम्प्लायंस पक्का करवा सके।
इसके बाद ही, किसी MP की विदेश यात्रा संभव हो पाती है।
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अब अगर वह LOP हैं
तो आपने सुरक्षा कर्मी भी दिए है। जो साथ घूम रहा है। वह सरकारी कर्मचारी है, पर असल मे सरकारी खबरी है। यह बात तो ऑफिशियल हैं, सबको पता है।
अनऑफिशियल, उसके स्टाफ मे आपने तमाम आदमी घुसा रखें है। फोन मे पैगासस डाल रखा है। यात्रा की इटेनरी आपके पास है, तो उसके होटल, कमरे मे बग डाले होंगे।
कई दर्जन जासूस सादे कपड़ो मे होंगे।।
फोटो बाजी हो रही होगी।
दूरबीने लगी होंगी।
(न लगी, तो आप गधे हो)
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अब त्रिवेदी जी की मानी जाये, तो राहुल गाँधी, बिना पासपोर्ट, बिना वीजा, बिना मोदी गवर्मेँट की पॉलिटिकल क्लियरेंस के - शायद किसी स्मगलर की डोंगी मे बैठकर, कोस्ट गार्ड से बच बचा के किसी "अज्ञात" देश गए है???
औऱ "संदिग्ध "लोगो से मिल रहे है??
जिनकी पहचान, फोटो, खबर कुछ भी नहीं।
तो वो नहीं , आपका पूरा गैंग पप्पू है।
यह तो त्रिवेदी जी के विदेश मंत्रालय, इंटेलीजेंस सर्विसेज, तमाम खुफिया तंत्र, औऱ उस देहाती जेम्स बॉन्ड के गाल पर धूमधाम से मारा गया तमाचा है।
यदि त्रिवेदी जी की बात सत्य है, तो उन्हें ऐसी भोंदू सरकार से तुरंत इस्तीफा मांगना चाहिए।
🙏😊
Now it’s no more Aastha, Now it’s time to play with Emotions and make the money. dnaindia.com/hindi/entertain…
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Agar samay rehte nijikaran ho gya hota to ye din na dekhne pdte. Angrezi mei ise Vendor Lockin kehte hai. Monopoly hurts consumer.
Anil Sachdeva retweeted
Replying to @Highonchoorma
Dhbvn is doing great job😂😂😂
They are one of the most hated department in Haryana
Anil Sachdeva retweeted
Replying to @Highonchoorma
Lost me at "Coming to DHBVN and UHBVN, both are doing a good job. There are no major issues with the existing system."
Anil Sachdeva retweeted
Replying to @Highonchoorma
Delhi has privatisation in electricity from past 18 years. Due to which very low power cuts in Delhi. These employees don't want to loose their comfort
Anil Sachdeva retweeted
Replying to @Highonchoorma
They are the worst, I called a complaint for bad write which was shorted from the pope and whole locality didn't have power for 2 days, and when they came they didn't changed the wire they reused the old wire which shorted 2 days later again,we protested then the wire was changed


















