Journalist, Columnist, 22 yr Exp, EX CFJ Fellow, Ex state head Swaraj Express, Rajasthan patrika, Dainik jagran, Nai Dunia, Hindustan, DNA

India
Joined November 2009
व्हाट्सएप अंकलों की पहचान बहुत मुश्किल नहीं होती वो आपके आस पास ही होते हैं बस नजर होनी चाहिए।
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फाड़रलैंड के दानव का जाना तय है। साझा विपक्ष से 10 सीट कम हासिल करके इसने जेल जाने और दुनिया भर में अपने छिछालेदर की तैयारी कर ली है। नेतन को फिलहाल 55 और उनके मुख्य प्रतिद्वंदी एजनकोट को 49 सीटें मिली हैं। फिलिस्तीन समर्थक अरब पार्टियों को 16 सीटें हासिल हुई हैं यह निर्णायक साबित होंगीं।तानाशाह ऐसे ही जाते हैं। नेतन अब कह रहा है कि दक्षिण पार्टियों को एक साथ आना चाहिए। दरअसल वो अपने लिए इम्युनिटी मांग रहा है जो मिलेगी नहीं। इजरायल की जनता को दानव मुक्ति से बधाई। नेतन्याहू को श्रद्धांजलि।
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काशी, मथुरा और प्रयागराज में हार के बाद यह जरूरी है कि मोहन भागवत, मोदी और शाह की तिगड़ी अपना राजपाट छोड़कर वानप्रस्थ ले ले। अयोध्या के बाद अब काशी, मथुरा, प्रयागराज हारने का मतलब है कि वोट चोरी, चंदा चोरी का मुद्दा जनता के दिमाग में घर कर गया है और पढ़े लिखे लोग इन्हें बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं हैं। मुमकिन हो तो बचे हुए समय के लिए नितिन नबीन को देश का पीएम बना दें। गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी अमृता फडणवीस को दे दें। कुछ नहीं तो रिटायर होने के बाद नबीन कॉलर उठाकर चलेगा। अमृता जी बहुत काबिल हैं। संघ प्रमुख का पद प्रदीप भंडारी के लायक है।
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बनारस के विधान परिषद चुनाव में सपा के लाल बिहारी यादव जी ने जीत हासिल की है। यह हार दरअसल पीएम मोदी की हार है। इस हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। सोच कर देखिए जो भाजपा दो दिन पहले मोदी की मौजूदगी में हुए एयर शो कार्यक्रम में 10 लाख की भीड़ बता रही थी। पार्टी की इंटरनल रिपोर्ट को धत्ता बताते हुए मोदी ने वहां रोड शो करके वहां मतदान से पहले रोड शो भी किया लेकिन करारी हार मिली। मोदी और भाजपा अब अतीत हैं।
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उत्तर प्रदेश की जंग को सपा ने विपक्ष वर्सेज बीजेपी की जगह सपा वर्सेज ओवैसी कर दिया है। गजब है। बीजेपी यही चाहती थी।अखिलेश घोषित करें इकरा सीएम बनेगी ओवैसी की सारी राजनीति खत्म।
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यह गाद आईजनकोट है। नेतन्याहू हारेगा तो यह प्रधानमंत्री बनेगा। मगर मत भूलिए यह इजरायल का मधु किश्वर है। यह भी स्वतंत्र फिलिस्तीन के सख्त खिलाफ है। अपना बेटा भी हाल में ही गाजा में खो चुका है।
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देश के चुनाव आयोग के दिमाग़ में फ़ितूर समा गया है। बीजेपी के इशारे पर वो चुनावी करप्शन का खुला खेल खेल रहा है। सुप्रीम कोर्ट में फर्जी हलफनामा दिया गया कि फॉ 6र्ममें कोई तब्दीली नहीं की गई । अगर फॉर्म 6 सच में नहीं बदला तो पोर्टल पर एक साथ क्यों दिख रहा था इसका जवाब कमीशन के पास नहीं है। अगर चुनाव आयोग कहता है कि हम सर्वसम्मति से फैसला लिए तो इससे फैसले की अवैधता खत्म नहीं होती बल्कि गुनाह बढ़ जाते हैं। वोट चोरी के गुनाह में यह सच स्थापित हो जाता है कि तीनों चुनाव आयुक्त मतों के इस गोरखधंधे में बराबरी से शामिल थे। सीधे कहें तो इन्होंने मिलकर लोकतंत्र का गला घोटा है।
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"बहुत तमाशा हुआ, बहुत अफवाह फैलाई गई, अब मेरी बारी है।" सोनिया गांधी जी की यह दमदारी देश की छाती पर बैठे नफरती बिग्रेड के लिए खतरे की घंटी है। लोगों के लिए सोनिया गांधी @SoniaGandhi क्या हैं? मुझे नहीं पता। मेरे लिए आजाद भारत के इतिहास में वो इकलौती स्त्री हैं जिन्होंने तीन तीन बार पीएम के पद को ठोकर मारी। मुझे बार बार प्रख्यात पत्रकार और संपादक स्वर्गीय प्रभाष जोशी की कही वो बात याद आती है। जिसमें उन्होंने महात्मा गांधी की तुलना सोनिया गांधी से की थी। "सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री पद नामंजूर करने और मनमोहन सिंह को देश का सर्वोच्च कार्यकारी पद दिलवाने की अगर कोई मिसाल आपको ढूंढनी हो तो सिर्फ दो उदाहरण मिलेंगे । ऐसा अपने यहां पहले सिर्फ दो व्यक्तियों ने किया है। मोहनदास करमचंद गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ कोई बत्तीस साल आजादी की लड़ाई की अगुवाई की और आजाद भारत की सत्ता जवाहर लाल नेहरू को सौंप दी । दूसरे जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी की तानाशाही कृतियों के विरुद्ध संघर्ष किया, लेकिन पहली गैरकांग्रेसी केन्द्रीय सरकार की बागडोर मोरारजी देसाई के हाथों में दे दी । इससे अगर आपको लगे कि मैं सोनिया गांधी की तुलना गांधी और जेपी से कर रहा हूं और किसी छुटभैये कांग्रेसी चम्मच जैसी बात कह गया हूं तो क्षमा कर दीजिए। लेकिन बताइए कि त्याग और बलिदान को सबसे बड़े मूल्य मानने वाले देश में कितने तपस्वी विदेह राजनेता हुए हैं जिनने प्रधानमंत्री पद छोड़ा हो?" गांधी और जेपी दोनों ही सत्ता के आदमी नहीं थे, हालांकि उन्होंने इस देश में दो सबसे बड़े राजनैतिक परिवर्तनों की अगुवाई की। वे दोनों चुनाव नहीं लड़े थे। वे दोनों ही राजसत्ता से क्रांतिकारी समाज परिवर्तन में विश्वास नहीं करते थे । लेकिन एक अद्भुत चुनाव में सोनिया गांधी न सिर्फ अपनी पार्टी और गठबंधन को भाजपा गठबंधन से आगे निकाल ले गई, कोई सवा तीन सौ सांसदों ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय लिया। उन्हें राष्ट्रपति ने अपना दावा बताने के लिए बुलाया भी और वे उनसे मिलकर भी आई। सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से कोई रोक नहीं सकता था। वे छह साल से चाहे अनचाहे सत्ता राजनीति में थीं जिसमें प्रधानमंत्री होने से बड़ा कुछ नहीं होता। लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री का पद अस्वीकार कर दिया।" यह लिखने वाले जोशी जी कांग्रेस @INCIndia के घोर विरोधी थे।
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यह देखिए, लूट मची है। आदरणीय वित्त मंत्री जी @nsitharaman , आपके एक गुरुजी का मैने पिछले दिनों इंटरव्यू किया था वो आपको औसत छात्र बता रहे थे। लेकिन मेरा अनुभव कह रहा है आप लिख लोढ़ा पत्थर हैं। स्टैट बैंक ऑफ इंडिया ने तय किया है कि अगर आप 30 हजार रुपयों से ज्यादा महीने में यात्रा पर खर्च करेंगे तो वो आपसे 1 फीसदी टैक्स अतिरिक्त लेंगे। अगर आपने ईंधन पर खर्चा 50 हजार से ज्यादा किया तो भी आपको 1 फीसदी एक्स्ट्रा चार्ज देना होगा। जो चार्ज पहले से लग रहे थे वो तो लगेंगे ही। @SBICard_Connect मुझे क्योंकर आपका कार्ड बंद कर देना चाहिए? लूट मची है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक हो कि लुटेरे हो? अडानी अंबानी को लोन दोगे वसूल करोगे हमसे। शर्म तो उन्हें आती नहीं
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रामगोपाल यादव दरअसल समाजवादी कम मन मस्तिष्क से भाजपाई ज्यादा हैं। इसकी वजह बहुत साफ है कि शाह और मोदी के उपकारों के बोझ के तले दबे हुए हैं। यह व्यक्ति मन का काला है। इन्हें मल्लिकार्जुन खड़गे की भाषा आपत्तिजनक लग रही है। संसद में या सड़क पर दिल्ली से यूपी तक भाजपा नेताओं की नफरती भाषा पर इन्हें कोई आपत्ति नहीं है। शर्त लगा लीजिए अगर सपा यूपी में थोड़ी बहुत सीट हासिल कर ली तो यह अमित शाह के साथ बैठकर बीजेपी की सरकार बनवा देंगी। जब तक रामगोपाल जैसे लोग हैं सपा भी भाजपा है।
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टीवी डिबेट से लोग दूर होते जा रहे थे आम जनता को लगने लगा कि यह सिर्फ और सिर्फ धूर्त भक्तों और एंकरों की चौपाल है जिसमें विपक्ष का आखेट किया जाएगा। फिर यश @YashRRJ आया। आंधी तूफान की तरह आया, गरजते बरसते आया। अब सत्ता के शुतुरमुर्ग और एंकर अवाक हैं हताश हैं। यश श्रीवास्तव के साथ हमने कई मुद्दों पर बात की। यश की जो बात सबसे सामयिक लगी वो यह थी कि जो भी संघी फालतू की बात करता है नफरत फैलाता है उसका विरोध जरूरी है। पूरी बातचीत का लिंक कमेंट बॉक्स में
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यह 9 मिनट 27 सेकेंड की बहस पिछले कुछ वर्षों में सुनी गई सबसे शानदार बहस है। जिसमें सत्ता के दलाल, कीचड़ में लोट रहे एक बदबूदार चैनल की मनबढ़, अज्ञानी, मूढ़मगज एंकर को उसकी हैसियत और आइना दोनों साथ दिखाया जा रहा है। मित्र प्रो रतनलाल @ratanlal72 को सम्भवतः विचित्रा त्रिपाठी @chitraaum नहीं जानती। वो कांग्रेस के प्रवक्ता बाद में हैं पहले एक बड़े इतिहासकार, शिक्षक और दलित, स्त्री चिंतक भी है। जब रतनलाल जैसा ज्ञान और चरित्र होगा तभी आप उनके सामने खड़े हो पाएंगे। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने जो बोला वो आम हिन्दुस्तानियों की भाषा है जो बोली जाती रही है बोली जाती रहेगी। RSS की नफरती भाषा से हर गाली बेहतर है। चित्रा बार बार मान अपमान की बात कर रही हैं। उस चैनल पर कर रही हैं जो नेहा सिंह राठौर @nehafolksinger के बारे में बेहद भद्दी, शर्मनाक और बेशर्मी भरी फर्जी खबर प्रसारित करके खुद नंगा हो चुका है। मुझे आश्चर्य हो रहा है कि चित्रा त्रिपाठी जो संभवतः भाजपा से यूपी विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही है खड़गे जी के एक खड़गदार जुमले से इतनी आहत हो जायेंगी यह वही पाषाण हृदय कठोर, संवेदनहीन, नारी विरोधी एंकर हैं जो नेहा के मामले में खामोश रहीं। खैर रतनलाल जी जो कर रहे हैं उसे हमारे बनारस में मईल छोड़ाना कहते हैं। फक्र है गुरु, दिन बना दिए।
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चुनाव आयोग की बदमाशी देखिए अब सुप्रीम कोर्ट में कह रहा है कि फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया गया जो बदलाव किया गया वो अलग डॉक्यूमेंट है।माने झूठ पर झूठ। यह कमीशन खुद कहता रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर परिवर्तन किया गया अब गंगा घोल कर पी रहा है ।अबे कौन अधिकार दिया अलग डॉक्यूमेंट लाने का? सुप्रीम कोर्ट में आयोग कह रहा है कि ज्ञानेश को हटाने की याचिका सुनवाई के योग्य नहीं है। क्योंकि उन्हें जजों जैसी इम्युनिटी मिली हुई है। आसमान से फैसला उतरा है कि ज्ञानेश को जाना होगा। जाना होगा तो जाना होगा।
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बड़ी खबर आ रही है अडानी और अंबानी के मीडिया हाउसेज एनडीटीवी और न्यूज 18 समेत 21 मीडिया हाउस मोदी सरकार के खिलाफ कोर्ट में भारत के प्राइवेसी कानून को चुनौती दे रहे हैं। उनका कहना है कि इससे इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म का काम दब जाएगा और नई दिल्ली को पत्रकारों के सोर्स पहचानने का मौका मिल जाएगा। सरकार वो कानून लाने जा रही हैं जिससे पत्रकारों को खबरों का सोर्स सरकार को बताना होगा। दरअसल सरकार मीडिया के आक्रामक तेवर से भयभीत है और यह सोच राशि है कि कहीं मीडिया रिज़ीम चेंज की मुहिम को और बढ़ा न दे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले साल यूज़र्स के डिजिटल पर्सनल डेटा को सुरक्षित रखने के लिए प्राइवेसी कानून लागू करने की घोषणा की थी , जिससे मेटा और गूगल जैसे प्लेटफॉर्म के लिए कम्प्लायंस की ज़रूरतें बढ़ गई थीं। पब्लिशर्स ने कहा है कि चूंकि मीडिया आउटलेट्स को छूट नहीं दी गई थी, इसलिए यह कानून प्रेस की आज़ादी पर हमला था।
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ये जो लोग गोदी मीडिया गोदी मीडिया कह कर दिन रात बड़ी पूंजी वाली समाचार घरानों को कोसते रहते हैं इनका दूसरा सच भी जाने रहियेगा। दूसरा सच यह है कि इनमें उनका बॉयकॉट करने का हौसला भी नहीं है। इन्हें दरअसल वही चाहिए!इन्हें चाहिए सारे बड़े चैनल,बड़े अखबार। बड़े से आशय एकदम साफ है। बड़ी पूंजी,बड़े नेटवर्क,बड़ी चमक,सितारे एंकर,सितारे रिपोर्टर,कुछ मामलों में बड़े चेक देने वाले संस्थान! तर्क यह है कि हमें तो इनका इस्तेमाल करना है। जरूर करिए।करना चाहिए। पर इनसे पूछिए कि इनमें से किस–किस ने दिल्ली से लेकर रायपुर,लखनऊ,भोपाल,पटना जैसे शहरों से लेकर देश के छोटे–छोटे कस्बों में हर रोज़ लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए संघर्ष कर रहे छोटे–छोटे अखबार,छोटे–छोटे यू ट्यूबर्स को खुद फोन कर के कहा हो कि हम आपके अखबार या आपके चैनल को इंटरव्यू देना चाहते हैं...आप हमारी,लोकतांत्रिक,धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की, ताकत हैं,आप सत्ता का मुकाबला कर रहे हैं अल्प संसाधनों के साथ या बिल्कुल ही संसाधानहीनता के साथ,तो हमारी भी जिम्मेदारी बनती है कि हम भी आपके साथ खड़े हों? एक उदाहरण मिल जाए तो बताइएगा। ये काम भी अगर कोई कर रहा है तो दिल्ली से लेकर इंदौर और रायपुर,पटना,भोपाल,लखनऊ जैसे शहरों से कुछ जाने माने पत्रकार ही। दुर्भाग्य है कि जनता के सवालों के लिए,लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए,धर्मनिरपेक्षता और संविधान को बचाने के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता नेता भी बड़ी पूंजी की चमक और स्टारडम का शिकार हैं। हां,एक बात दर्ज करना चाहूंगा। इसे हमारे व्यक्तिगत अनुभव की तरह ही देखिएगा। अपने सीमित अनुभवों से कहूं तो वृंदा करात, पराकला प्रभाकर,प्रभात पटनायक, प्रोफेसर अपूर्वानंद जैसे लोग हैं जो इस चिंता को समझते हैं। इस प्रवृत्ति को भी विचलन कहिए कॉमरेडों! सितारों की रौशनी जब साथ छोड़ेगी तब भी वैचारिक मूल्यों की चिंता करने वाला इस देश का कोई छोटा समाचार संस्थान,कोई लघु पत्रिका,कोई छोटा सा...बहुत कम सब्सक्राइबर आधार वाला यू ट्यूब चैनल आपके साथ ही होगा! - रुचिर गर्ग जी
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मोदी जी के रोड शो में बार बार एंबुलेंस आ जाता था इस बार पता नहीं कैसे अब्दुल का जनाजा आ गया।
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