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दुश्मन को न पहचानने वाली, नेतृत्वहीन विराट सेना भी अंततः युद्ध हार जाती है !
हिंदु कौम एक ऐसी ही सेना है जिसका कोई लक्ष्य नहीं, कोई मंजिल नहीं, शत्रु की पहचान नहीं, अपना कोई सेनापति नहीं !
हिंदुओं से ज्यादा राजनैतिक लक्ष्यहीन और दिशाहीन कौम कोई नहीं, क्योंकि हिंदुओं के नेता तो बहुत हैं पर उनके मन में हिंदुओं के साम्राज्य जैसा कोई लक्ष्य नहीं, कोई महत्वाकांक्षा नहीं; इसलिए हिंदु नेताओं को सेकुलरिज्म की चादर ओढ़कर हिंदुओं के रक्त की प्यासी कौम से भाईचारा निभाने में भी कोई लज्जा नहीं आती!
सत्ता का जो तंत्र अंग्रेज स्थापित कर गए, मात्र वे उसे ढोना चाहते हैं, उसपर बैठकर उसे भोगना चाहते हैं, यही हिंदु नेताओं की महत्वाकांक्षा है!
जबकि कम्युनिस्टों, मुसलमानों और ईसाईयों का स्पष्ट राजनैतिक लक्ष्य है। कम्युनिस्ट साम्यवादी शासन वाला भारत चाहते हैं, मुसलमान शरीयत कानून वाला इस्लामिक भारत चाहते हैं और ईसाई बाइबिल वाला रोमानियाई भारत चाहते हैं, पर हिंदुओं के मन में ऐसा कोई लक्ष्य नहीं है।
उनके पास चीन, अरब और रोम का मॉडल है पर हिंदुओं के पास ऐसा कोई मॉडल नहीं ।
हिंदुओं से राजनैतिक लक्ष्य की बात करो, महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी से मुक्ति से आगे उनकी कोई सोच नहीं होती!
जबकि महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी जैसी बीमारियां इसी राजनैतिक लक्ष्यहीनता के कारण हैं! जिस दिन हिंदुमन स्वराज, हिंदु साम्राज्य और अखण्ड भारत बनाने की महत्वाकांक्षा से भर जाएगा उस दिन भारत महगांई, बेरोजगारी और गरीबी जैसी बीमारियों से भी स्वतः मुक्त होने लगेगा!
हिंदुओं की राजनीतिक दिशाहीनता का इतिहास सदियों पुराना हो चला है। जिन्ना डायरेक्ट एक्शन डे की घोषणा करता है परंतु हिन्दू उसके प्रति भी मूकदर्शक रहता है जबकि वो जानता है कि दूसरा पक्ष कभी भी कार्यवाही करके हमारा कत्लेआम कर सकता है!
वर्मा, अफगानिस्तान, बलूचिस्तान श्रीलंका आदि को भारत से तोड़कर अलग किया जाता रहा परंतु हिंदू फिर भी मूकदर्शक बना रहा। 1947 में भारत का 31 प्रतिशत हिस्सा काटकर मुसलमानों को दे दिया जाता है, परंतु हिंदू फिर भी मूकदर्शक रहता है! ....और पाकिस्तान देने के बाद भी मुसलमानों को भारत में बसा लेता है!
1947 में रोके गए मुसलमान आज फिर भारत विभाजन की मांग कर रहे हैं पर हिंदू मौन है!
शेष भारत में लाखों एकड़ भूमि वक्फ बोर्डों के नाम कर दी जाती है परंतु हिंदू फिर भी मूकदर्शक रहता है!
हिंदू अपने अयोध्या, काशी, मथुरा जैसे तीर्थ स्थलों के उत्थान का कार्य नहीं कर पाता, फिर भी हिन्दू मूकदर्शक रहता है!
पूरा भारत हिंदुओं के हाथों से जा रहा है परंतु हिन्दू आज तक ये निर्धारित न सके कि हमारा लक्ष्य क्या होना चाहिए!
हिंदुओं का घर उजड़ रहा है पर हिन्दू चैन से सो रहे हैं।
मिश्रित आबादी वाले क्षेत्र में जाइये और बात कीजिये, आप पायेगें कि हर साल हिंदू ही अपने मकान-दुकान बेचकर निकल रहे हैं!
और ये भारत के हर राज्य, हर शहर - कस्बे में हो रहा है।
भारत की डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है, भारत के अंदर सैकड़ों पाकिस्तान जन्म ले चुके हैं।
भारत हिंदुराष्ट्र घोषित होगा तो सनातन संस्कृति के पोषण के लिए कानून बन सकेंगे।
हिंदुराष्ट्र भारत में हिंदुओं की संपत्ति अन्य कोई मजहब का व्यक्ति न खरीद सके, ऐसा कानून बना सकते हैं।
हिंदुराष्ट्र भारत में हिंदुओं का धर्मांतरण नहीं किया जा सके ऐसा कानून बनाया जा सकता है।
हिंदुराष्ट्र भारत में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर धर्म, संस्कृति और अपने पूर्वजों को कोई गाली नहीं दे सकेगा, ऐसा कानून बना सकते हैं।
हिंदू राष्ट्र भारत में समस्त नौकरियों में प्रथम वरीयता हिंदुओं को दी जाएगी, बिना जाति के भेदभाव के हिंदुओं को आर्थिक आधार पर आरक्षण होगा (मात्र हिंदुओं को)!
सेकुलर भारत अपंग और असहाय है, वह अपनी संस्कृति और मूल प्रजा की रक्षा के लिए कोई कदम नहीं उठा सकता, चाहे सत्ता पर कोई भी क्यों ना बैठा हो ।
अंग्रेजों द्वारा थोपे गए संविधान और शासन तंत्र को इसी प्रकार हम ढोते रहेंगे, तो एक दिन वह आएगा कि भारत के हर संसाधन पर और सत्ता पर मुसलमानों का शासन होगा और जिस दिन वहां सत्ता के शीर्ष पर कोई मुसलमान पहुंचेगा, उस दिन संविधान का पालन नहीं होगा बल्कि शरिया लागू कर भारत इस्लामिक राष्ट्र घोषित हो जाएगा!
तब तुम्हें वही मिलेगा जो मुसलमानों के 800 साल के शासन में काफिरों को मिलता रहा है.., वही मिलेगा जो ईरान में पारसियों को मिला, सीरिया में यजीदियों को मिला...!
क्रमशः 2/2
अगर बेटा परीक्षा में फेल हो जाए, तो उसे ट्यूशन मत लगवाओ और न ही पढ़ने बिठाओ। फिर से प्रयास करने के लिए मत कहो।
आस पास के फेल हुए सारे लड़कों को इकट्ठा करवाओ, स्कूल गेट पर प्रिंसिपल द्वारा "मार्क-चोरी" धरना दिलवाओ, हाथ में "प्रिंसू, इट्स डन ब्रो" का बोर्ड थमाकर प्रिंसिपल ऑफिस तक मार्च करवाओ और 2 दिन के अंदर इस्तीफे की डिमांड करवाओ।
प्रिंसिपल फिर भी ना माने तो सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति के पास प्रदर्शन करो और जरूरत पड़े तो एलोन मस्क के माध्यम से डोनाल्ड ट्रम्प तक रिक्वेस्ट करो।
लेकिन....
अपने बच्चे को पढ़ने के लिए, मेहनत करने के लिए "मत" कहो!
और अगर ऐसा लगता है कि उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता है तो उसे कोई चाय की दुकान "मत" खुलवाओ!
अपने नालायक, निक्कमे बेटे की कमजोरी का ठिकरा सब पर फोड़ों लेकिन बेटे को कुछ मत कहना।
इस मेसेज का देश में चल रहे अराजक प्रदर्शनों से सीधा सीधा संबंध है।
Rahul Gandhi की रैली से घबराए Modi ji ने रामलीला मैदान में ऐसी भीषण बारिश करवा दी, कि बादलों के साथ तूफानों को भी बाकायदा न्योता भेज दिया। 🙄
RamLeela मैदान में पानी ही पानी भर गया है...अब 1 नवम्बर को रैली होगी या रेला...ये तो राहुल बताएंगे!
सच तो यह है, कि मोदी जी की सीधी पहुँच तो इंद्रदेव तक है। हम भी न जाने कब तक #EVM के मत्थे दोष मढ़ते रहेंगे।
बाकी तो...आल इज वेल!
#RamleelaMaidan #RahulGandhi #Congress #Bjp #NarenderModi
जरा सोचिए! राजीव गांधी के समय ₹1 में से केवल 15 पैसे गरीबों तक पहुँचने की बात कही जाती थी, और आज मोदी सरकार DBT के जरिए सीधे बैंक खातों में पैसा भेज रही है!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 30 अक्टूबर 2026 को गुजरात से जारी करेंगे पीएम-किसान की 24वीं किस्त — देश के 9.34 करोड़ से अधिक किसान परिवारों को मिलेगा लाभ!
• तारीख और समय: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 30 अक्टूबर 2026 को सुबह लगभग 10 बजे प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना की 24वीं किस्त जारी करेंगे।
• स्थान: यह कार्यक्रम गुजरात के बनासकांठा जिले के भिलड़ी कस्बे में आयोजित होने वाला है।
• लाभार्थी: देशभर के 9.34 करोड़ से अधिक पात्र किसान परिवारों को लाभ मिलने की उम्मीद है।
• प्रति किस्त राशि: प्रत्येक पात्र किसान परिवार को ₹2,000 मिलेंगे।
• सालाना आर्थिक सहायता: पीएम-किसान योजना के तहत प्रत्येक पात्र किसान परिवार को हर साल ₹6,000 की आर्थिक सहायता 3 किस्तों में दी जाती है। प्रत्येक किस्त ₹2,000 की होती है।
• 24वीं किस्त का कुल वितरण: इस किस्त के तहत ₹18,680 करोड़ से अधिक की राशि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से किसानों के बैंक खातों में भेजे जाने की उम्मीद है।
• कुल किस्तें: 30 अक्टूबर 2026 को जारी होने वाली किस्त योजना की 24वीं किस्त होगी।
• पीएम-किसान के तहत कुल सहायता: 24वीं किस्त से पहले योजना के तहत कुल ₹4.46 लाख करोड़ से अधिक वितरित किए जाने की सूचना है। नई किस्त जारी होने के बाद यह राशि ₹4.64 लाख करोड़ से अधिक हो सकती है। अंतिम राशि वास्तविक भुगतान पर निर्भर करेगी।
• देशभर में कुल DBT भुगतान: विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से कुल भुगतान लगभग ₹54.15 लाख करोड़ बताया गया है। यह राशि केवल पीएम-किसान योजना की नहीं, बल्कि कई सरकारी योजनाओं की संयुक्त राशि है।
• सीधे बैंक खाते में पैसा: DBT के माध्यम से सहायता राशि सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में भेजी जाती है, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम होती है और पारदर्शिता बढ़ती है।
• e-KYC अनिवार्य: किस्त प्राप्त करने के लिए पात्र किसानों को अपनी e-KYC प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
• आधार लिंकिंग: जहाँ आवश्यक हो, किसान का आधार बैंक खाते से जुड़ा होना चाहिए।
• भूमि रिकॉर्ड का सत्यापन: योजना का लाभ लेने के लिए निर्धारित भूमि सत्यापन संबंधी शर्तें पूरी करना भी आवश्यक है।
पीएम-किसान योजना के तहत पात्र किसान परिवारों को हर साल ₹6,000 की सहायता 3 किस्तों में दी जाती है। प्रस्तावित 24वीं किस्त के बाद योजना के तहत कुल सहायता ₹4.64 लाख करोड़ से अधिक हो सकती है, जबकि सभी सरकारी योजनाओं के अंतर्गत कुल DBT भुगतान लगभग ₹54.15 लाख करोड़ बताया गया है।
जय जवान, जय किसान!
जरा सोचिए! राजीव गांधी के समय ₹1 में से केवल 15 पैसे गरीबों तक पहुँचने की बात कही जाती थी, और आज मोदी सरकार DBT के जरिए सीधे बैंक खातों में पैसा भेज रही है!
• राजीव गांधी का बयान: 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि सरकार द्वारा खर्च किए गए ₹1 में से केवल 15 पैसे ही गरीबों तक पहुँचते हैं।
• मोदी सरकार का DBT मॉडल: आज विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत सहायता राशि सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में भेजी जाती है।
• पीएम-किसान योजना: पात्र किसान परिवारों को हर साल ₹6,000 की सहायता 3 किस्तों में दी जाती है—प्रत्येक किस्त ₹2,000।
• 24वीं किस्त: 30 अक्टूबर 2026 को जारी होने वाली प्रस्तावित किस्त के तहत 9.34 करोड़ से अधिक किसान परिवारों को लाभ मिलने की उम्मीद है।
• पारदर्शिता: प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) का उद्देश्य बिचौलियों को कम करना, भुगतान का रिकॉर्ड रखना और लाभार्थियों तक सहायता पहुँचाना है।
• बड़ा बदलाव: सरकारी योजनाओं में तकनीक, आधार और बैंक खातों के इस्तेमाल से लाभ सीधे पात्र लोगों तक पहुँचाने की व्यवस्था मजबूत हुई है।
राजीव गांधी ने सरकारी योजनाओं में लीकेज की समस्या स्वीकार की थी। आज DBT व्यवस्था का उद्देश्य उसी समस्या को कम करना है—ताकि सरकारी सहायता बिचौलियों के बजाय सीधे पात्र लाभार्थियों तक पहुँचे।
15 पैसे से सीधे बैंक खाते तक—यही है सरकारी भुगतान व्यवस्था में बदलाव की कहानी!
कुछ लोग हिंदू देवी देवताओं को बुरा भला कहते हैं, जबकि मंदिरों की वजह से उनकी भी रोजी रोटी चलती है । साथ ही सरकार को भी लाभ पहुंचता है (GDP में 3% का योगदान होता है)।
संभल में अब्दुल पर सरकारी और निजी संपत्तियों में आग लगाने के लिए 25 लाख रुपए का भारी जुर्माना लगाया गया। वह पीड़ित बनकर रोने लगा और कहने लगा, "अगर मैं अपना घर बेचकर पूरी जिंदगी काम भी कर लूं, तो भी यह जुर्माना नहीं भर पाऊंगा।" बात योगी जी तक पहुंची। योगी जी ने उसे ऑफर दिया: "अरे, मूर्ख... हम जानते हैं कि तुम अकेले नहीं थे, लेकिन तुम किस्मतवाले थे- तुम्हारी फोटो सबसे साफ आई। एक काम करो, बाकी लोगों के नाम बता दो, हम तुम सब में जुर्माना बांट देंगे। तुम्हारा बोझ कम हो जाएगा।"
अब्दुल की आंखें चमक उठीं। वह चिल्लाया, "मैं सबको जानता हूं!" उसने एक-एक करके नाम लेना शुरू किया- मौलाना सादिक, रिजवान, आफताब, सुहैल, नसीम, करीम, मौलाना फजलू और 500 और लोग। योगी जी मुस्कुराए: "शाबाश! अब तुम्हारा जुर्माना 1,395 रुपए रह गया है। अगर तुम्हें और नाम याद हो जाएं, तो यह और भी कम हो जाएगा।" योगी जी ने उसे एक और ऑफर दिया। अब्दुल की आँखें फिर चमक उठीं। वह चिल्लाया, "मेरे साले और मेरे दस और रिश्तेदार!" उसने सब कुछ बता दिया। योगी जी ने मुस्कुराते हुए कहा: "अब तुम्हारा जुर्माना सिर्फ़ ₹500 है। चुकाओ और घर जाओ,,,
😂😂😂
असम पुलिस ने Child Marriage के आरोप में 63 लोगों को पकड़ा है और उन्हें जेल भेज दिया है।
इससे पहले Polygamy यानी बहुविवाह पर भी वहाँ कार्यवाही चलती रही है।
मतलब साफ़ है - देश सरिया से नहीं संविधान से चलेगा।
और यह इस मेसेज से एकदम स्पष्ट हो रहा है।
M.V.S.Rao(Dinesh) retweeted
आदरणीय सुप्रिया बहन, अंग्रेज़ी में एक कहावत है।
यदि इच्छाएँ अश्व होतीं, तो भिखारी घुड़सवारी करते और यदि इच्छाएँ मछलियाँ होतीं तो हम सभी धन में तैरते।
ख़ैर, कहने दीजिए दिल को, वैसे आपके इस जन्म में यह सम्भव नहीं, आदरणीय युवराज जी की क़िस्मत में ही बड़े वाले केजरी लगे हैं🙄😐😑
आपके एक वोट की शक्ति।
पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के डंकुनी बेडे बस्ती से दृश्य: अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों द्वारा कब्जा किया गया एक विशाल क्षेत्र एसआईआर अभियान के बाद पूरी तरह से खाली हो गया है।
चार देश एक कमरे में आए, तुर्की, कतर, पाकिस्तान और इंडोनेशिया। इन चारों ने मिलकर एक रक्षा समझौता किया और इसका नाम रखा बद्र। यह नाम इस्लाम के शुरुआती इतिहास की एक बड़ी सैन्य जीत, बद्र की लड़ाई, से लिया गया है।
जनाब, OIC यानी इस्लामिक सहयोग संगठन में तो आप पहले ही कूटनीतिक लड़ाई हार चुके हैं। 57 मुस्लिम देश मिलकर भारत के खिलाफ एक ऐसा प्रस्ताव तक नहीं ला पाए, जिसे मानना सभी के लिए जरूरी होता। और अब आप अपने अगले कदम का नाम 1400 साल पुरानी उस लड़ाई के नाम पर रख रहे हैं, जिसमें जीत मिली थी? यह कोई रणनीति नहीं है। यह तो पुराने इतिहास के सहारे अपनी ताकत दिखाने की कोशिश है, जैसे कोई आज कुछ बड़ा करने के बजाय पुरानी जीतों का नाम लेकर खुद को ताकतवर साबित करना चाहता हो।
चलिए, अब इस गठबंधन में शामिल चारों देशों की हालत भी देख लेते हैं।
पाकिस्तान की बात करें तो वह इस समय IMF से मिलने वाली आर्थिक मदद के सहारे चल रहा है। यह IMF से मदद लेने का उसका 24वाँ कार्यक्रम है। देश की सरकार चलाने में सेना का बड़ा दखल है और आरोप है कि उसी की नीतियों ने अर्थव्यवस्था को बुरी हालत में पहुँचा दिया है। पिछले महीने चीन के सामने आर्थिक मदद के लिए हाथ फैला रहा था और अब इस महीने रक्षा समझौता कर रहा है। क्या गजब की प्राथमिकताएँ हैं!
अब तुर्की को देखिए। उसने यूक्रेन और रूस के विरोधियों को हथियारबंद ड्रोन बेचे हैं। सऊदी अरब के साथ उसके रिश्ते बिगड़े। लीबिया के मुद्दे पर कतर से उसका झगड़ा हुआ, फिर सुलह हुई और फिर रिश्ते खराब हो गए। मतलब तुर्की की विदेश नीति इतनी जल्दी बदलती रहती है कि उसकी तुलना वहाँ की महंगाई से की जा सकती है। और तुर्की में महंगाई की समस्या कितनी बड़ी है, यह बताने की जरूरत नहीं है।
अब आते हैं कतर पर। कतर में मध्य पूर्व का अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा है, जहाँ करीब 10,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। एक तरफ कतर अमेरिका को अपने यहाँ सेना रखने की जगह देता है और उसके साथ करीबी संबंध बनाए रखता है, दूसरी तरफ ऐसे रक्षा समझौते में शामिल हो रहा है, जो पश्चिमी देशों के हितों से टकरा सकता है। यानी जिस अमेरिका को वह अपने यहाँ सैन्य अड्डा चलाने की सुविधा दे रहा है, उसी के सहयोगियों के हितों के खिलाफ जाने वाले गठबंधन का हिस्सा भी बन रहा है। यह बात अपने आप में काफी हैरान करने वाली है।
अब इंडोनेशिया को देखिए। यह एक लोकतांत्रिक देश है, जिसने अपने आधुनिक इतिहास में अपनी सीमाओं के बाहर कोई युद्ध नहीं लड़ा है। इंडोनेशिया एक खूबसूरत देश है, लेकिन सवाल यह है कि वह पाकिस्तान के लिए किसी युद्ध में क्यों उतरेगा? उसके पास ऐसा करने की कोई खास वजह दिखाई नहीं देती।
अब बात करते हैं OIC की।
मई 2026 में OIC की आपात बैठक हुई। पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की निंदा करने वाला प्रस्ताव पास कराने के लिए पूरा जोर लगाया। संगठन में 57 देश हैं, लेकिन नतीजा क्या निकला?
भारत ने उस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। UAE चुप रहा, सऊदी अरब भी चुप रहा। खाड़ी के वे देश, जिनके पास पैसा भी है और ताकत भी, उन्होंने पाकिस्तान का साथ देने के लिए कोई खास कदम नहीं उठाया।
क्यों? क्योंकि इन देशों के लिए सिर्फ पाकिस्तान की भावनाएँ मायने नहीं रखतीं। उनके अपने आर्थिक हित भी हैं। भारत के साथ उनका करीब 200 अरब डॉलर का व्यापार है। वे पाकिस्तान को खुश करने के लिए भारत के साथ अपने बड़े व्यापारिक रिश्तों को दाँव पर क्यों लगाएंगे?
अब जब 57 देशों से पाकिस्तान को वह समर्थन नहीं मिला, जिसकी उसे उम्मीद थी, तो उसने क्या किया?
चार देशों को इकट्ठा किया, एक ऐतिहासिक नाम रखा, प्रेस कॉन्फ्रेंस की और दुनिया को दिखाने की कोशिश की कि देखिए, हमने भी अपना एक बड़ा गठबंधन बना लिया है।
लेकिन इतिहास में पहले भी ऐसे कई गठबंधन बने हैं, जिनका अंजाम अच्छा नहीं रहा।
1954 में SEATO यानी साउथ ईस्ट एशिया ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन बनाया गया था। इसका मकसद साम्यवाद को फैलने से रोकना था। लेकिन 1977 में यह संगठन खत्म हो गया। इसने अपनी रक्षा के लिए एक भी गोली नहीं चलाई।
1945 में अरब लीग बनी थी। इसे बने हुए 80 साल से ज्यादा हो चुके हैं। इस दौरान हजारों प्रस्ताव पारित किए गए, लेकिन यह अपने ही सदस्य देशों के बीच होने वाले संघर्षों को रोकने में नाकाम रही। मिस्र और लीबिया के बीच तनाव और संघर्ष हुए। सीरिया, यमन, इराक और कुवैत जैसे देशों से जुड़े बड़े क्षेत्रीय संघर्ष भी हुए। यानी एक ही संगठन के सदस्य देश कई बार आपस में ही लड़ते रहे।
क्रमशः 2/2.......
फिर आया वारसा पैक्ट। यह सोवियत संघ के नेतृत्व वाला सैन्य गठबंधन था। इसके सदस्य देश आपसी भरोसे के कारण उतने एकजुट नहीं थे, जितने सोवियत संघ की सैन्य ताकत और दबाव के कारण थे। जैसे ही मॉस्को की पकड़ कमजोर हुई, यह गठबंधन भी बिखरने लगा। आखिरकार 1991 में यह पूरी तरह खत्म हो गया। इसकी हालत ऐसी हुई, जैसे गर्म पानी में चीनी घुलकर गायब हो जाती है।
इन उदाहरणों से एक बात समझ आती है। सिर्फ कागज पर रक्षा समझौता कर लेने से कोई गठबंधन ताकतवर नहीं बन जाता और न ही उससे युद्ध जीता जा सकता है।
युद्ध में असली ताकत कई चीजों से आती है। देशों की मजबूत अर्थव्यवस्था, आपस में जुड़े हित, एक-दूसरे की मदद करने की क्षमता और सबसे बढ़कर, किसी खतरे का सामना करने के लिए एक जैसी सोच होना जरूरी है।
अगर देशों के अपने-अपने हित अलग हैं, उनकी प्राथमिकताएँ अलग हैं और वे किसी साझा खतरे को लेकर एकमत नहीं हैं, तो सिर्फ समझौते पर हस्ताक्षर करने से कुछ नहीं होगा।
मेरे हिसाब से बद्र गठबंधन में यही सबसे बड़ी कमी है।
यह समझौता असल में रक्षा से ज्यादा अपने-अपने देश की जनता को दिखाने के लिए किया गया लगता है। इस्लामाबाद, अंकारा और जकार्ता में नेताओं को यह दिखाना है कि वे कुछ बड़ा कर रहे हैं। खासकर ऐसे समय में, जब हाल के घटनाक्रमों के बाद उन्हें राजनीतिक और कूटनीतिक मोर्चे पर आलोचना और शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है।
यानी यह एक प्रेस कॉन्फ्रेंस, झंडे दिखाने का कार्यक्रम और उसके साथ एक पुराना ऐतिहासिक नाम जोड़ने जैसा है, ताकि समझौता बहुत बड़ा और ऐतिहासिक दिखाई दे।
लेकिन सिर्फ नाम बड़ा रखने से गठबंधन बड़ा नहीं हो जाता।
बद्र की लड़ाई में जीत हासिल करने वालों के पास अपने मकसद के प्रति दृढ़ विश्वास और लड़ने का संकल्प था। दूसरी तरफ, इस नए गठबंधन में चार ऐसे देश शामिल हैं, जिनके अपने-अपने हित और प्राथमिकताएँ अलग-अलग हैं। इनके बीच किसी साझा सैन्य रणनीति पर कितनी सहमति बनेगी, यह अपने आप में बड़ा सवाल है।
इतिहास हमेशा खुद को नहीं दोहराता, लेकिन कभी-कभी वह ऐसी कोशिशों को देखकर हँस जरूर सकता है।
सभी सनातनी हिंदू भाईयों आपकी राय सर्वोपरि है 🚩🚩
असली गोदी मीडिया ये है!
उस समय मीडिया पर बहुत दबाव था और ज्यादातर न्यूज़ अकबर रोड और 10 जनपथ से तय होती थी।
सरकार यानी कैबिनेट से ऊपर भी एक सुपर कैबिनेट यानी सोनिया गांधी की NAC बना दी गई थी जो सरकार को निर्देश देती थी कि तुम्हें क्या करना है।
NAC के सदस्यों को भी कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया गया था जो की पूरी तरह से संविधान के खिलाफ था।
बड़े-बड़े पत्रकार अक्सर सिर्फ सोनिया जी के दरबार में “हाज़री” लगाने वहां जाते थे!
लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन साहब खुद लॉन में मैडम का इंतजार करते थे, क्योंकि वह हमेशा सें असली “सुपर पीएम” थीं, और अपने को देश की......
महारानी मानती थी !
इस वीडियो में आप खुद देखिए सोनिया गांधी के बंगले के लॉन में खड़े होकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सोनिया गांधी का इंतजार कर रहे हैं।
फिर जैसे ही सोनिया गांधी बाहर आती हैं प्रभु चावला से लेकर शेखर गुप्ता से लेकर सारे पत्रकार सोनिया गांधी को घेर लेते हैं और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चुपचाप एक किनारे खड़े रहते हैं।
और सोनिया गांधी भारत के महारानी की तरह सबसे परिचय करती है सबसे मिलती है।
10 साल का वो काला दौर जब प्रधानमंत्री पद को कलंकित किया गया था और मीडिया को एक गोदी मीडिया बना दिया गया था उसे भारत कभी नहीं भूल सकता।

















