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मौन, मृत्यु और मैं... | Educator | Master's in History & Political Science

प्रयागराज
Joined August 2024
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ज़िंदगी एक रूटीन पर चल रही है — हर सुबह उठना, लाइब्रेरी जाना, दिन भर पढ़ाई में डूबे रहना, फिर थके हुए लौटना, खाना खाकर सो जाना... और अगली सुबह फिर वही सिलसिला। कभी-कभी दिल चाहता है कि सब कुछ छोड़कर कहीं दूर पहाड़ों की वादियों में चला जाऊं, जहां किताबें तो हों, लेकिन न हो कोई प्रतियोगिता — बस पढ़ने को कहानियां हो और सुकून हो। मगर फिर लगता है, अभी नहीं… अभी तो सफर पूरा करना है। यही रोज़ की दोहराई जाने वाली थकान, यही नीरसता — शायद इसी में भविष्य की चमक छुपी है। सबसे बड़ी बात ये है कि इस मेहनत का कोई गवाह नहीं होता। जब तक सफलता नहीं मिलती, तब तक किसी को तुम्हारे संघर्ष से कोई वास्ता नहीं। लोग कहते हैं न — "असफलता की कहानियां भी तभी सुनी जाती हैं, जब सुनाने वाला सफल हो।" बस इसी उम्मीद में जंग जारी है — एक दिन कामयाब होकर अपनी सारी नाकामियां सुनाऊंगा। 😊✨ - भविष्य की चिंताओं में कैद एक वर्तमान ✍️
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"The debut of this magazine marks the culmination of months of hard work, I want to extend my deepest thanks to @himanshusudha22 and @imaahi12 who stepped up as contributors, advisors, and sounding boards. Thank you for making this dream a reality."
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जब ज़िंदगी की राहों में अंधेरा उतर आए और दुआएँ भी सुनाई न दें, तब किताबें चुपचाप आपके पास बैठ जाती हैं। वे न तो थकती हैं, न शिकायत करती हैं… बस हर पन्ने पर आसरा देती हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि जब आपका ईश्वर सोने चला जाए , तब भी ये आपके साथ खुशी-खुशी जाग सकती हैं, अच्छी किताबें— ईश्वर से भी बड़ा आसरा है।
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समीक्षा – आषाढ़ का एक दिन आषाढ़ का एक दिन मोहन राकेश का वह नाटक है जिसने हिन्दी रंगमंच और साहित्य दोनों को एक नया मोड़ दिया। यह केवल एक प्रेमकथा नहीं है, बल्कि जीवन और कर्तव्य, व्यक्तिगत आकांक्षा और सामाजिक अपेक्षा के बीच के संघर्ष की गहन अभिव्यक्ति है। नाटक का आधार कालिदास के जीवन से जुड़ी किंवदंतियों पर रखा गया है, परंतु इसमें लेखक ने मानवीय रिश्तों की जटिलता और त्याग की वेदना को इतने मार्मिक ढंग से उकेरा है कि यह पाठक और दर्शक, दोनों को भीतर तक छू जाता है। कहानी का केंद्र है – कालिदास और मल्लिका का प्रेम। मल्लिका, जो कालिदास के साथ अपने सपनों का संसार रचती है, धीरे-धीरे महसूस करती है कि उसका प्रेम उसे नहीं, बल्कि समाज और सत्ता को समर्पित कर दिया गया है। कालिदास जब उज्जयिनी का आमंत्रण स्वीकार करता है और राजकवि बनकर लौटता है, तो वह केवल सत्ता का दास नहीं बनता, बल्कि अपने निजी जीवन की सबसे सच्ची धुरी— मल्लिका— को भी खो देता है। इस नाटक का असली सौंदर्य इसकी प्रतीकात्मकता में है। आषाढ़ का मौसम— बारिश, हरियाली और नमी— जीवन की उमंग और प्रेम की आर्द्रता का प्रतीक है, लेकिन इसी के बीच मल्लिका का अकेलापन, उसके त्याग और पीड़ा को और भी तीव्र बना देता है। मोहन राकेश का यह नाटक केवल कालिदास और मल्लिका की कथा नहीं है, बल्कि यह हर उस रिश्ते का दस्तावेज़ है जहाँ कर्तव्य और महत्वाकांक्षा प्रेम पर हावी हो जाते हैं। यह स्त्री की उस अनकही पीड़ा का बयान है, जो पुरुष की उपलब्धियों के पीछे छिपकर रह जाती है। यदि गुनाहों का देवता और रेत की मछली निजी रिश्तों की त्रासदी का आईना हैं, तो आषाढ़ का एक दिन उस ऐतिहासिक पीड़ा का रूपक है, जिसमें स्त्री के त्याग को चुपचाप महानता का हिस्सा मान लिया जाता है। अंततः यह नाटक हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या किसी भी युग में प्रेम और महत्वाकांक्षा साथ चल पाए हैं? या फिर हर बार प्रेम को बलिदान होना ही पड़ता है? "आषाढ़ का एक दिन" ने मेरे दिल पर गहरी छाप छोड़ी है। यह नाटक आत्मा को स्पर्श करने वाला गहन अनुभव है।
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प्रिय, हिमांशु @himsudha_ दोस्तों की दुआ ही तो सबसे बड़ी ताकत होती है। मुझे पूरा यकीन है — एक दिन तुम्हारे हिस्से की सफलता भी ज़रूर मिलेगी, क्योंकि ईमानदारी से की गई मेहनत कभी बेनतीजा नहीं रहती। यह दोस्ती हमेशा यूँ ही बनी रहे, बिना किसी औपचारिकता के — बस उसी सहजपन, उसी सुकून और उसी हँसी के साथ। दिल से लिखे इस पत्र के लिए शुक्रिया। 💫 तुम्हारे जैसे दोस्त ज़िंदगी को और खूबसूरत बना देते हैं। ✨🧿 – Maahi
पत्र: 7 Dear, @imaahi12 उम्मीद करता हूँ यह पत्र तुम्हें उसी मुस्कान के साथ मिले, जैसी हमेशा रहती है। 12 अक्टूबर को तुम्हारा जन्मदिन था, और सच कहूँ तो उस दिन तुम्हें के पत्र न लिख पाने का मलाल अब भी है। एग्ज़ाम की वजह से भले व्यस्त था, पर दिल में तुम्हारे लिए अपनापन हमेशा की तरह मौजूद था इसलिए आज देर से ही सही, लेकिन दिल से लिख रहा हूँ। स्कूल, कॉलेज के बाद बहुत कम बार ऐसा होता है कि कोई ऐसा दोस्त मिल जाए जिसमें सहजता भी हो, अपनापन भी, और मानसिक स्तर भी इतना मेल खाए कि बिना बोले तक बात समझ में आने लग जाए। असल में तो दोस्ती का मतलब भी यही होता है बिना किसी आधार पर जज किए, दिल खोलकर साथ निभाया जाए। "कम मिलते हैं पर जब भी मिलते हैं सुकून दे जाते हैं, यार ऐसे हों तो ज़िंदगी भी आसान लगने लगती है" कहते हैं कि संघर्ष एक दिन रंग लाता ही है, तुम्हारा संघर्ष भी रंग लाया है, आर्मी पब्लिक स्कूल में प्रवक्ता बनते हुए तुम्हें देखना सिर्फ़ खुशी नहीं, एक दोस्त होने के नाते तुम पर गर्व भी है। जितनी खुशी तुम्हें हुई होगी, उससे कहीं ज़्यादा हमें हुई है। यह सिर्फ़ मंज़िल नहीं, तुम्हारी मेहनत और सच्चे प्रयास का सम्मान भी है। अभी यह सफ़र लंबा है, यह तो एक शुरुआत मात्र है, आशा करता हूँ एक दिन उस पीडीएफ में भी नाम आयेगा जिसकी कल्पना हम सभी साथ बैठकर करते हैं। रिश्ते समय की लंबाई पर नहीं बल्कि गहराई पर निर्भर होते हैं, एक बार सही ट्यूनिंग हो जाए फिर लंगोटिया यार की तरह बातें, परेशानियाँ, हँसी, उम्मीदें सब कुछ बेहिचक बाँट ली जाती हैं। और यही दोस्ती की असली ख़ूबसूरती भी है। देर से सही पर दिल से जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएँ। आने वाला जीवन तुम्हारे लिए और भी उजाला, स्थिरता, सफलता और खुशियाँ लेकर आए। तुम जहाँ भी रहो, हर मंज़िल तुम्हारे कदम चूमे और हर सपना तुम्हारे सामने हक़ीक़त बनकर खड़ा हो। From, Art faculty, Tea Shop, Left Corner
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समीक्षा – आषाढ़ का एक दिन आषाढ़ का एक दिन मोहन राकेश का वह नाटक है जिसने हिन्दी रंगमंच और साहित्य दोनों को एक नया मोड़ दिया। यह केवल एक प्रेमकथा नहीं है, बल्कि जीवन और कर्तव्य, व्यक्तिगत आकांक्षा और सामाजिक अपेक्षा के बीच के संघर्ष की गहन अभिव्यक्ति है। नाटक का आधार कालिदास के जीवन से जुड़ी किंवदंतियों पर रखा गया है, परंतु इसमें लेखक ने मानवीय रिश्तों की जटिलता और त्याग की वेदना को इतने मार्मिक ढंग से उकेरा है कि यह पाठक और दर्शक, दोनों को भीतर तक छू जाता है। कहानी का केंद्र है – कालिदास और मल्लिका का प्रेम। मल्लिका, जो कालिदास के साथ अपने सपनों का संसार रचती है, धीरे-धीरे महसूस करती है कि उसका प्रेम उसे नहीं, बल्कि समाज और सत्ता को समर्पित कर दिया गया है। कालिदास जब उज्जयिनी का आमंत्रण स्वीकार करता है और राजकवि बनकर लौटता है, तो वह केवल सत्ता का दास नहीं बनता, बल्कि अपने निजी जीवन की सबसे सच्ची धुरी— मल्लिका— को भी खो देता है। इस नाटक का असली सौंदर्य इसकी प्रतीकात्मकता में है। आषाढ़ का मौसम— बारिश, हरियाली और नमी— जीवन की उमंग और प्रेम की आर्द्रता का प्रतीक है, लेकिन इसी के बीच मल्लिका का अकेलापन, उसके त्याग और पीड़ा को और भी तीव्र बना देता है। मोहन राकेश का यह नाटक केवल कालिदास और मल्लिका की कथा नहीं है, बल्कि यह हर उस रिश्ते का दस्तावेज़ है जहाँ कर्तव्य और महत्वाकांक्षा प्रेम पर हावी हो जाते हैं। यह स्त्री की उस अनकही पीड़ा का बयान है, जो पुरुष की उपलब्धियों के पीछे छिपकर रह जाती है। यदि गुनाहों का देवता और रेत की मछली निजी रिश्तों की त्रासदी का आईना हैं, तो आषाढ़ का एक दिन उस ऐतिहासिक पीड़ा का रूपक है, जिसमें स्त्री के त्याग को चुपचाप महानता का हिस्सा मान लिया जाता है। अंततः यह नाटक हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या किसी भी युग में प्रेम और महत्वाकांक्षा साथ चल पाए हैं? या फिर हर बार प्रेम को बलिदान होना ही पड़ता है? "आषाढ़ का एक दिन" ने मेरे दिल पर गहरी छाप छोड़ी है। यह नाटक आत्मा को स्पर्श करने वाला गहन अनुभव है।
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जब ज़िंदगी की राहों में अंधेरा उतर आए और दुआएँ भी सुनाई न दें, तब किताबें चुपचाप आपके पास बैठ जाती हैं। वे न तो थकती हैं, न शिकायत करती हैं… बस हर पन्ने पर आसरा देती हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि जब आपका ईश्वर सोने चला जाए , तब भी ये आपके साथ खुशी-खुशी जाग सकती हैं, अच्छी किताबें— ईश्वर से भी बड़ा आसरा है।
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Aur farz karo, Yeh farz na ho, sachchi ek haqeeqat Ho. Tere ishq ke har raaste par, Jaana ek qayamat ho. Aur suna hai, Yeh qayamat khoón jigar ka peeti hai. Tum toh Jaana farz karoge, Mujhpe yeh sab beeti hai. — Unknown ✨🙌🙌
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मैं इक ग़ज़ल हूँ कृष्ण की राधा रदीफ़ है यानी मिरे भी इश्क़ में वा'दा रदीफ़ है — काफ़ ✨🙌 कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं! जय श्री कृष्ण 🙏❤️
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सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा 🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं। 💐 #IndependenceDay
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नुक़्स इतने न निकालें जनाब लोगों में कुछ तो अच्छा भी होगा खराब लोगों में — सारुल बागला 🌱
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तुम हमारे किसी तरह न हुए वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता उस ने क्या जाने क्या किया ले कर दिल किसी काम का नहीं होता — मोमिन ख़ां मोमिन ✨🙌
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पत्र मां, नानी अब और रोने लगी है, उसकी हड्डियों के साथ नसे भी दिखने लगी है, पिछले महीने मिलने गया था तो पता चला अब उसका रक्तचाप भी बढ़ जाता है, हर दिन तुम्हारे पास जाने को बोलती है, हां वहीं जहां बड़े मामा, नाना और तुम चली गई बिना बताए, मैं उसको अब रोकना भी नहीं चाहता, अब जब भी जाता हूं दोनों गालों पर हाथ रखकर बच्चों की तरह रोने लगती है फ़िर जब बुढ़ापे की थकान उसके चेहरे पर छा जाती है तो ख़ुद छुप हो जाती है, मेरे जाने का मन अब कम करने लगा है लोगों को संभालते संभालते मैं पत्थर हो तो गया हूं पर उसको देखकर मेरी आत्मा झकझोर उठती है, पता है मैं अब पांच बजे उठने लगा हूं नहीं तो फ़िर सोया ही रह जाता हूं, देर से उठूं तो मिट्टी के चूल्हे में अब कोई चाय नहीं रखता इसलिए रोज ख़ुद ही बनाने की आदत डाल लिया हूं, घर ख़ुद से न पहुंचूं तो अब कोई फोन नहीं करता, हां! खाना अभी भी वहीं ढका रखा रहता है पर कभी देर हो जाए तो कोई इंतज़ार नहीं करता। नौकरी करने अभी भी नहीं गया हूं, कभी कभी सोचता हूं किसके लिए और क्यों करूं? पर शायद कुछ दिन में करने भी लगूं, मैं तो तुम्हारे पास ही आना चाहता था लेकिन एक पागल वैद्य ने पता नहीं कई महीनों तक न जाने क्या क्या पिलाए रखा, कुछ दिनों से अब मैंने वो कड़वी घूंट पीना बंद कर दिया है। मैंने एक जादुई दुनिया से कुछ दिनों का करार कर लिया है, वो काम जो अधूरे रह गए हैं उसको पूरा कर मैं वहीं आ जाऊंगा, तुम्हें पता है लड्डू अब पांच महीने का हो गया है कई बार तो उसको देखकर ही तुम्हारी याद जाती वो अपनी मां पर ही गया है और उसकी मां तो तुम्हारी ही बेटी है, मैंने सोच रखा है जब भी बोलना शुरू करेगा उससे पहला शब्द नानी ही बुलवाने का प्रयास करूंगा। अरे! याद है वो लड़की जिससे तुम कभी कभी वीडियो कॉल पर बात किया करती थी, इसी साल फरवरी में उसके घर वालों ने शादी कर दी, शादी से पहले कंधे पर सर रखकर खूब रोई थी, जैसे मैं तुम्हारे गोद में सर रख के रोता था कुछ दिनों बाद उसे बहुत फोन करने का प्रयास किया लेकिन अचानक से तुम्हारी तरह बिना बनाए वो भी चली गई। मैं ढूंढने नहीं गया, जब तुम नहीं लौट रही तो उसके लौटने की क्या उम्मीद करूं मैं, लेकिन जैसे मैंने तुम्हारी हर चीज़ को सहेज कर रखा है वैसे उसके भी सामानो को, वैसे तो सामान आंधी-तूफान, जलभराव में गुम भी हो सकते हैं पर यादें आख़िरी साँस तक रहती है तो मैंने इनको तुम्हारे उसी लोहे के बक्से में रखकर वही पुराना ताला लगा दिया हूं, लेकिन मैं अब थोड़ा सा बदल गया हूं मां.......! Too be Continued....!
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मेरी डायरी के पीले पन्ने इस डायरी में चार रंग के पन्ने हैं। पीले पन्ने पर दिल की बातें लिखता हूं— किसी के कहे हुए शेर, किसी ग़ज़ल की 2 लाइन, किसी किताब में पढ़ा एक सुंदर सा वाक्य, या किसी अधूरे ख़्वाब का टुकड़ा। जितना लिखता हूं, उतना ये पन्ना अपनेपन से भरता जाता है। कभी-कभी लगता है, शायद अब यह पन्ना मेरी पसंद नहीं, मेरी ज़रूरत बन गया है। हर बार जब इसमें कुछ नया जोड़ता हूं, यह पन्ना पहले से और भी ज्यादा अपना लगने लगता है। अपनेपन के इस क्रम में सिर्फ कागज़ दिखने वाले इस पन्ने पर कब आत्मा ने अपना घर बना लिया पता ही नहीं चला। कभी-कभी सोचता हूं— क्या ये पसंदीदा लोग भी तो ऐसे ही नहीं होते होंगे? जैसे ये पन्ना, कब पसंद से जरूरत और जरूरत से दिल का सुकून बन गया। पर फिर सोचता हूं— क्या पसंद हमेशा पसंद बनी रहती है? क्या जिस तरह इस डायरी में पीला पन्ना मुझे खास लगता है, ठीक वैसे ही हर डायरी का पीला पन्ना भी खास लगेगा क्या? यही सब सोचते-सोचते भटक जाता हूं, भटककर फिर सोचने लगता हूं...✍️
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लप्रेक- अ कॉल इन अ मेट्रो दिल्ली मेट्रो की सबसे ख़ूबसूरत बात ये है कि अगर आप लेट हो रहे हैं तो ये आपको और लेट करा देगी। सिक्योरिटी वाले ने बैग खोलने को बोल दिया, कार्ड से एंट्री नहीं मिली तो रिचार्ज करना पड़ा, उसके बाद लिफ़्ट में अटक गया और जब तक प्लेटफार्म पर पहुँचा तो मेट्रो निकल चुकी थी। वो IGI हवाई अड्डे पर मेरा इंतज़ार कर रही है और मैं अभी चाँदनी चौक पर हूँ। मुझे याद है वो मुझे हड़बड़ी न करने के लिए अक्सर टोकती थी। मैं आदतन भाग कर मेट्रो पकड़ता था, वो मुझे रोक लेती थी। - इतनी भी क्या जल्दी है, मेट्रो ही है दूसरी आ जाएगी - लेकिन थोड़ा तेज़ चलती तो यही मिल जाती। - हाँ तो क्या हुआ तुम्हारे साथ इंतज़ार कर लुँगी। "अगला स्टेशन राजीव चौक" - मेट्रो की अनाउंसमेंट से मेरी चेतना लौटी। अरे ये क्या उसके दो मिस कॉल हो गए। कहाँ खो गया था मैं? रुको पहले उसको कॉल कर लूँ। - हेलो! फ़ोन क्यों नहीं उठा रहे हो? - कुछ नहीं मेट्रो में हूँ, फ़ोन पॉकेट में था, भीड़ में ध्यान नहीं गया। - अच्छा आई एम सॉरी, मेरी फ्लाइट की लास्ट कॉल हो रही। - क्या मतलब, मुझसे मिले बग़ैर? एक तो तुम मुझे एयरपोर्ट से कॉल कर रही हो कि तुम्हारी कनाडा की फ्लाइट है। मैं भागते हुए आ रहा हूँ... - अच्छा उसके लिए सॉरी बोला न, मान जाओ प्लीज़ - कोई और फ्लाइट ले लो इतनी हड़बड़ी क्यों है? - थोड़ा तेज़ चलूँगी तो आगे रहूँगी, सामने खड़ी फ्लाइट छोड़ देना बेवकूफ़ी नहीं तो क्या है? उसने इसके बाद क्या कहा याद नहीं लेकिन मुझे लौट जाने को कहा और कॉल काट दिया। "अगला स्टेशन धौला कुंआ है, दरवाज़े बाईं ओर खुलेंगे" दरवाज़ा खुलता है और मेरे क़दम ख़ुद बाहर निकल आते हैं। दूसरे प्लेटफार्म पर लौटने वाली मेट्रो खड़ी है, लेकिन मझे घर नहीं जाना। ये मेट्रो छोड़ देने में भलाई है। मैं अब तेज़ नहीं भाग सकता, मैंने भीड़ को गुज़र जाने दिया। स्टेशन के बाहर आसमान में एक जहाज़ दिख रहा है। मैंने उसे भी गुज़र जाने दिया। अब उसका आख़िरी सबक़ याद कर रहा हूँ- मैं मेट्रो हूँ, मुझे छोड़ सकते हैं वो फ्लाइट है, उसे नहीं। मैं मेट्रो हूँ, मुझे छोड़ सकते हैं वो फ्लाइट है, उसे नहीं। मैं मेट्रो हूँ, मुझे छोड़ सकते हैं वो फ्लाइट है, उसे नहीं। - काफ़
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सच कहूँ तो, ज़िंदगी एक लंबा सफ़र है… और इस सफ़र में केवल किसी का चेहरा देखकर जीना संभव नहीं। शुरू में तो हो सकता है उसकी आँखें, मुस्कान, अदाएँ आपको मोह लेंगी… लेकिन एक दिन आएगा जब आपको अपने डर, अपनी उलझन, अपना दर्द बाँटना होगा। अगर वो सुन नहीं पाई, समझ नहीं पाई— तो वो पल सिर्फ़ आपके अकेलेपन का आईना बन जाएगा। सुंदरता आँखों को भा सकती है, पर बातें… बातें दिल को घर देती हैं। जब कोई आपके हर शब्द को समझ ले, अधूरी बात से भी आपका मतलब पकड़ ले— तभी असली अपनापन महसूस होता है।
अगर उस लड़की से आप बैठकर 4 घंटे बात नहीं कर सकते.. आप ज़िन्दगी कैसे बिता लेंगे उसके साथ.. कब तक निहार सकते हैं आप सुंदरता.. एक दिन तो भर ही जाएगा ना मन.. वो समझेगी ही नहीं कि कह क्या रहे हो.. तो कहाँ जाओगे फ़िर.. बातें ज़रूरी हैं.. बातें ही ज़रूरी हैं!! #JustThinking
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मेरी डायरी के पीले पन्ने इस डायरी में चार रंग के पन्ने हैं। पीले पन्ने पर दिल की बातें लिखता हूं— किसी के कहे हुए शेर, किसी ग़ज़ल की 2 लाइन, किसी किताब में पढ़ा एक सुंदर सा वाक्य, या किसी अधूरे ख़्वाब का टुकड़ा। जितना लिखता हूं, उतना ये पन्ना अपनेपन से भरता जाता है। कभी-कभी लगता है, शायद अब यह पन्ना मेरी पसंद नहीं, मेरी ज़रूरत बन गया है। हर बार जब इसमें कुछ नया जोड़ता हूं, यह पन्ना पहले से और भी ज्यादा अपना लगने लगता है। अपनेपन के इस क्रम में सिर्फ कागज़ दिखने वाले इस पन्ने पर कब आत्मा ने अपना घर बना लिया पता ही नहीं चला। कभी-कभी सोचता हूं— क्या ये पसंदीदा लोग भी तो ऐसे ही नहीं होते होंगे? जैसे ये पन्ना, कब पसंद से जरूरत और जरूरत से दिल का सुकून बन गया। पर फिर सोचता हूं— क्या पसंद हमेशा पसंद बनी रहती है? क्या जिस तरह इस डायरी में पीला पन्ना मुझे खास लगता है, ठीक वैसे ही हर डायरी का पीला पन्ना भी खास लगेगा क्या? यही सब सोचते-सोचते भटक जाता हूं, भटककर फिर सोचने लगता हूं...✍️
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Happy Birthday @ankushtweets Bhai 🎉🥳🎂🎈 Wishing you health, happiness and everything you’ve been dreaming of this year.
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रिस रिस के जैसे दरिया रवानी पे आ गया वैसे ही दुख भी आंख के पानी पे आ गया ये नौकरी ये शायरी ये इश्क़ और घर सारे का सारा बोझ जवानी पे आ गया — अभिसार गीता शुक्ला ✨🙌
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जब भी यूट्यूब पर "जावेद अख़्तर साहब" को सुनने बैठता हूँ, तो लगता है जैसे कोई रुकी हुई नदी फिर से बहने लगी हो। कितनी ही बातें हैं जो उन्होंने ऐसे कह दीं जैसे बरसों से मेरे ही भीतर कोई उन्हें कहना चाहता था। हाल ही में उनकी लिखी एक ग़ज़ल की दो लाइनें नजरों के सामने से गुजरी — क्यूँ मेरे साथ कोई और परेशान रहे मेरी दुनिया है जो वीरान... तो वीरान रहे... इनको पढ़ते ही पता नही क्यों अचानक मन "सलीम ख़ान साहब" की ओर चला गया। फिर याद आया एक बार कपिल शर्मा के शो में जब "सलीम साहब" मेहमान बनकर आए थे, उन्होंने बातों-बातों में दो लाइनें कहीं, जो तब से मेरे दिल में जैसे बस गई हैं— आंसू निकल आए तो खुद पोछिएगा, लोग पोछने आएंगे तो सौदा करेंगे। "सलीम साहब" की ये 2 लाइन याद आने के बाद मैंने उन्हें सुनने के लिए यूट्यूब पर खोजा — इंटरव्यू, पॉडकास्ट, बातचीत की कोई लंबी रिकॉर्डिंग... पर अफ़सोस, सलीम साहब की उपस्थिति इस डिजिटल दुनिया में हाल फिलहाल बेहद कम नज़र आती है। दिल चाहता है कि इन दिनों कोई सलीम साहब को बैठाकर लम्बी बातचीत करे — सिनेमा से लेकर ज़िंदगी तक की बातें... तजुर्बे, तन्हाई, रिश्तों की ढ़ेर सारी बातें।
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'मुझे तुम्हारी प्रतीक्षा है' मैं तुमको तलाश करता हुआ एथेंस के पुराने मंदिरों तक गया हूँ कई बार जेरुशलम की प्राचीन दीवारों के पार भी झांक कर देखा है काशी के घाट पर न जाने कितने सोमवार बिताए हैं मुझे लगता है प्रेम अब मिस्र के किसी पिरामिड की तरह हो गया है मुझे भी किसी दीवार पर लिख देना चाहिए 'मुझे तुम्हारी प्रतीक्षा है' जैसा एंकिदू के लिए देवी समहत ने लिखा था - @rudrakshdhaari
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