प्रतीक पंड्या 🧢 retweeted
ये सुंदर दृश्य दिल्ली की यमुना का है
"जय श्री राम" लिखी हुई ये नाँव यमुना मैया में कल शाम उतारी गई हैं, रात के समय इसकी छटा और भी अद्भुत
निर्मल होती यमुना मैया व उन पर तैरती ये राम नाम से सजी सज्जित नांव के मनोरम दृश्य के साथ आप सभी को शुभ दीपावली 🪔
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CBI जांच चाहिए ।
#Justice4NishaBhagat
निशा भगत सरना समाज के लिए शहीद हुई है… वह समाज के मुद्दों पर आवाज़ उठाती थी। उसकी आवाज़ दबाने के लिए दी गई मानसिक यातनाएँ किसी से छिपी नहीं हैं।
यह महज़ आत्महत्या नहीं, हत्या है।
निशा भगत धर्मांतरण और आदिवासी ज़मीन लूट पर लगातार आवाज़ उठाती थी ।
समाज की आवाज को यूँ खामोश नहीं होने दिया जाएगा । सरना समाज और निशा को न्याय मिले । जाँच और त्वरित करवाई हो
🙏🏼💐
Replying to @arunbothra
अरे अक्ल के blind, रामानंद सागर ने कोई एंटरटेनमेंट के लिए नहीं बनाई थी धारावाहिक ।
उस युग में लोगो की अपने धर्म से पहचान करने के लिए बनाई थी।
क्या ज़माना है, एक धर्म ग्रंथ के मंचन में हम लोग बोरियत जैसे शब्द प्रयोग कर रहे हैं।
कैसे पापी हैं लोग।
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आपको रामानंद सागर की लकीर छोटी लगती है तो ये आपकी समस्या है, रामानंद सागर की नहीं
अगर लकीर बड़ी नहीं होती तो राम से जुड़ा कोई धारावाहिक आए फिल्म, तुलना रामानंद सागर की रामायण से ही होती है
अगर कैनेडा साधारण भी था, तब भी वो रामायण 4 दशक बाद भी लोगों के दिल में है
वैसे भी रामायण के भव्यता VFX से नहीं आती, बल्कि रामकथा को जीने से और महसूस करने से आती है, जिसमें आदिपुरुष और वर्तमान Ramayana की टीम पूरी तरह असफल रही है
रामानंद सागर ने रामायण की कहानी घर-घर पहुँचाई। इसका श्रेय उन्हें है लेकिन लकीर उनकी इतनी भी लंबी नहीं थी।
कैमरावर्क साधारण था, स्पेशल इफेक्ट्स फीके थे। जब सीरियल चल निकला तो उन्होंने इसे बोरियत की हद तक खींचा। पात्र एक-दूसरे को देखकर देर तक मुस्कुराते रहते थे। न कोई संवाद, न चेहरे पर भाव बदलते थे।
सच्चाई ये है कि उस ज़माने में मनोरंजन के विकल्प गिने-चुने थे। ना इंटरनेट था, ना मोबाइल फ़ोन। रंगीन टीवी नया-नया आया था। कुछ गिने-चुने सीरियल आते थे। ऐसे माहौल में रामानंद सागर को बोरियत के शिकार लोगों वाला खाली कागज़ मिला। पर उनकी लकीर इतनी लंबी भी ना थी जितना आज 40 साल बाद लगती है।
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फिल्म का ट्रीटमेंट बहुत कुछ तय करता है। यदि रावण के क्रूर, अहंकारी और स्त्रियों के प्रति दुष्कर्मी चरित्र को छिपाकर उसका महिमामंडन किया गया है, तो यह रामायण के मूल भाव से खिलवाड़ है। रावण का सीता हरण केवल प्रतिशोध नहीं था, उसके पीछे उसकी वासना और सीता को पत्नी बनाने की इच्छा भी थी। यही पक्ष फिल्म में दिखाया गया या नहीं, यह महत्वपूर्ण है। समीक्षा जल्द ही...
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एक सेना के जवान को |
मजहबी रेल कर्मी ने मौत के घाट उतार दिया है |
हिंदुओं क्या कुछ ना हो तो मुद्दा हर हिंदू तक पहुंचा देना | 😡😡
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ईद-इफ्तारी में सेंवई पीने का मुकाबला करने वाले हिंदू नेताओं सुनो।
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आदिवासी एक ब्रांड है ब्रांड. हमसे टकराने की हिम्मत मत करना... #NishaBhagat
बुलंद आवाज़, हिम्मत और हौसले की मिशाल थी निशा भगत।
अकेले पूरे सिस्टम से भिड़ने वाली निशा हमारे साथ नहीं। दिल मानने को तैयार नहीं। 💔
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रावण अर्थात्….
“एको अहं द्वितीयो नास्ति न भूतो न भविष्यति"
ऐसा किरदार दोबारा निभाना नामुमकिन हैं…!!
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अर्जुन कपूर ने आज तक जितनी फिल्मों में काम किया सारी डूब गई...
एक मात्र सुपरहिट फिल्म थी 2 States, जिसमें वो 'Yes Bank' में काम करता दिखाया गया था।
तो Yes Bank डूब गई!
🤣🤣🤣
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साहिल वाकोड़े की आत्महत्या पर हंगामा मचाने वाले लोग, निशा भगत की आत्महत्या पर मुंह में दही जमाए बैठे हैं!
बस यही इनकी असलियत है!
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इतना धन लगाने के पश्चात् भी यदि नमित मल्होत्रा की रामायण की PR Team को अपनी फ़िल्म का प्रचार करने के लिए 40 वर्ष पुरानी रामानंद सागर की रामायण की त्रुटियाँ निकालनी पड़ें, तो नई रामायण की PR Team नपुंसक है।
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कई वर्षों बाद मैंने सिनेमाहॉल में कोई हिन्दी फ़िल्म देखी तो वह थी - हनुमान अंश। इस फिल्म ने भावुक कर दिया। सभी पात्र इतने सरल और सहज कि विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई फिल्म देख रहे हों। सब कुछ अपने आसपास घटित होता हुआ। संगीत ऐसा कर्णप्रिय और मनमोहक कि हर जगह गूँज रहा है। मन से बनाओ तो फिल्म ऐसी ही सच्ची और अच्छी बनती हैं।
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भाव दिखाना आपको बोरियत लगती है तो इंसान नहीं मशीन हो तुम।
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सर, वो लकीर इतनी लंबी है कि कोरोना काल में जब प्रसारण हुआ तो सपरिवार देखा गया, उसी भाव से,जिस भाव से पहले देखा गया था.. वही इंतजार जो पहले होता था..
रामायण बनाने के लिए स्पेशल इफेक्ट से ज्यादा जरूरी है हृदय में उस स्तर का भाव.. जिसका शायद आज के निर्माताओं में अभाव है..
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पहली बार आओ इतना गलत एनालिसिस कर बैठे सर, कभी गाओ में जाइए आज इतने बिजी समय में भी पूरी रात दशहरे में वही रामायण चलता है और लोग उसी चाव से बैठ कर देखते जैसा 40 साल पहले देखा करते थे
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रामानंद सागर इतनी लंबी लकीर खींच गए कि लोग न तो उनकी लकीर छोटी कर पा रहे, न अपनी लकीर उनसे बड़ी कर पा रहे।























