सूरत के एंब्रायोडरी कामगारों के आंदोलन को कवर करने के लिये पिछले दिनों मैं वहां था. वहां मुझे समझ आया कि वहां की दिक्कत दरअसल यह है कि सूरत के कारोबारी कानूनी सिस्टम में आना ही नहीं चाहते. उनके बिजनेस करने का तरीका पुराने गुजराती-मारवाड़ी सेठों वाला है, वे मजदूरों को अपना परिवार बतायेंगे, मौका पड़ने पर एडवांस देंगे, रहने की जगह दे दें, संकट में मदद करते हुए अहसान भी जतायेंगे, मगर उन्हें उनका अधिकार नहीं देंगे.
वहां फैक्ट्री मालिक कहते हैं, हमारा और मजदूरों का रिश्ता परिवार वाला है, लेकिन मजदूर कह रहे, हमें कानून का अधिकार दीजिये, सिस्टम में आने दीजिये, छुट्टी दीजिये, ईएसआई की सुविधा दीजिये, दूसरे अधिकार दीजिये,
मगर तकरीबन 25 लाख कामगारों की वहां की इंडस्ट्री बदलने के लिए तैयार नहीं. ऐसा क्यों है? क्या इसकी वजह वहां की सामाजिक सरंचना में है? वहां के इतिहास में है? क्या प्रवासी मजदूरों का संगठित न हो पाना एक वजह है? लेबर डिपार्टमेंट क्या कहता है? इन तमाम सवालों को लेकर एक लंबी स्टोरी की है.
इसमें फैक्ट्री मालिकों, मजदूरी, यूनियन लीडरों, जानकारों और लेबर विभाग के अधिकारी से बातचीत है. लिंक यह रहा
biharchronicle.com/why-does-…
एक जरूरी सूचना - जो पहले बतानी थी। मेरी सूरत यात्रा के प्रायोजक कुछ ऐसे पाठक हैं, जिन्हें लगा था कि मुझे वहां जाकर रिपोर्ट करना चाहिए। यह एक तरह से पीपल funded journalism है।
दो खबरें हैं। पहली केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान पर आधारित है, जो उन्होंने कल एक रैली में दिया कि SIR में तीन करोड़ घुसपैठियों का नाम काटा गया।
दूसरी खबर हिंदुस्तान टाइम्स ने की, पटना के अखबार में यह 30 अक्टूबर, 2026 को छपी कि छह राज्यों में हुए SIR में अब तक सिर्फ 1600 विदेशी नागरिक मिले, जिनमें ज्यादातर नेपाल वासी हैं।
किसे सच माना जाए? क्या गृह मंत्री के इस बयान को अधिकारिक बयान के तौर पर देखा जाए? अगर उनकी यह सूचना सही है तो यह भी बताया जाना चाहिए कि सरकार ने इनमें से कितने लोगों को डिपोर्ट किया? यह भी कि इतने घुसपैठिए आए कैसे? हमारा सीमा सुरक्षा बल क्या कर रहा था?
या फिर जैसा वे कहते हैं, यह भी एक पॉलिटिकल जुमलेबाजी है?
“कैटरिंग कोई तिजोरी भरने का धंधा नहीं है, बल्कि यह यात्रियों के लिये आवश्यक सेवा है. IRCTC का ध्यान सिर्फ कमाई बढ़ाने पर हो गया है.”
यह बयान ममता बनर्जी का है. उन्होंने 2010 में यह तब कहा था, जब वे रेलमंत्री थीं. यह ममता बनर्जी ही थीं, जिनके रेलमंत्री रहते हुए 1999 में IRCTC(इंडियन रेलवे कैटरिन एंड टूरिज्म कारपोरेशन) की स्थापना हुई थी. मगर मगर 10 सालों में वे इसकी शिकायतों से इतनी परेशान हो गईं कि 2010 के बजट में उन्होंने इससे सारे अधिकार छीनकर जोनल रेलवे को दे दिये. वह व्यवस्था क्यों नहीं चली और क्यों फिर से IRCTC को सारे अधिकार देने पड़े, इसकी कहानी आगे.
रेलवे के खान-पान पर लिखे पिछले पोस्ट में जब बड़ी संख्या में लोगों ने अपने अनुभव बताये तो मुझे लगा कि इस व्यवस्था के बारे में मुझे थोड़ा शोध करके विस्तार से लिखना चाहिए. ऐसे में जब शोध के दौरान मुझे ममता बनर्जी की यह सटीक उक्ति मिली.
IRCTC और रेलवे के खान-पान की पूरी कहानी इस रिपोर्ट पर. तसवीर IRCTC के एक बेस किचेन की. 2017 से रेल का खाना इन्हीं बेस किचेनों में तैयार होता है.
biharchronicle.com/irctc-has…
पिछले कुछ महीनों से अचानक मेरी रेल यात्रा काफी बढ़ गई है। 23 अक्टूबर से आज तक तो मैं लगभग 80 घंटे की रेल यात्रा कर चुका हूं। इन यात्राओं के दौरान एक बार फिर समझ आया कि भारतीय रेल आज भी अपने यात्रियों को स्वच्छ और सुस्वादु भोजन उपलब्ध कराने में विफल है। सरकार के तमाम प्रयोग कर लिए। IRCTC के नाम से सिर्फ इस काम के लिए एक कंपनी भी खड़ी कर ली। अब तो मेन्यू में भी विविधता आ गए। मगर जितनी तरह के बेस्वाद व्यंजन रेलवे कैटरीन वाले बनाते हैं, इसके लिए उन्हें अलग से अवॉर्ड दिया जा सकता है। यह हाल राजधानी, तेजस और वंदे भारत तक है। जिनमें खाने के नाम पर अच्छी खासी रकम वसूली जाती है।
रेल यात्री आज भी भोजन को लेकर निश्चिंत नहीं हैं। ज्यादातर यात्री 40 फीसदी, घर से खाना पैक करके चलते हैं। मगर इसकी भी लिमिट है। आप एक तरफ का खाना और नाश्ता तो पैक करके चल सकते हैं, मगर दूसरी तरफ का क्या करेंगे। फिर मेरे जैसे यात्री रेलवे स्टेशन से कम से कम पांच किमी दूर के किसी होटल से खाना, नाश्ता पैक करवाते हैं। क्योंकि रेलवे स्टेशन के पास वाले होटल भी बेस्वाद और खराब गुणवत्ता वाला भोजन उपलब्ध कराना अपना अधिकार समझते हैं। क्योंकि उन्हें मालूम है कि उनका ग्राहक वन टाइम कंज्यूमर है, शिकायत करने आयेगा नहीं। दुबारा आयेगा इसकी भी गारंटी नहीं। इसलिए ग्राहकों की संतुष्टि उनके एजेंडे में नहीं। सड़े गले समान से कुछ भी रंगीन पका लेना है।
अब एक नया विकल्प खुला है। ऑनलाइन डिलीवरी का। यह भी आजमा कर देख लिया। वे भी रेलवे यात्रियों को इसी तरफ ट्रीट करते हैं। दो दिन पहले सड़े हुए अंडे की करी भेज दी, पूरा फेंकना पड़ा। अब किससे शिकायत करें।
लिहाजा हर लंबी रेल यात्रा से पहले मैं खाने का सामान जुटाने की जद्दोजहद में जुट जाता हूं। फल, ब्रेड बटर, भुजा मिक्सचर जैसी चीजें, गर्मी में सत्तू, कुछ खाना जिसे पैक कराया जा सके। कोशिश रहती है कि ट्रेन में पानी और चाय के सिवा कुछ खरीदना न पड़े।
इसके बावजूद कई बार ट्रेन का खाना लेना ही पड़ता है। क्या किया जाए। मगर मेरा अनुमान है कि रेल यात्रा करने वाले बमुश्किल 20 फीसदी यात्री ही रेलवे का खाना खाते होंगे। 80 फीसदी अपना इंतजाम खुद करते हैं।
क्या IRCTC जैसी संस्था कभी इस मसले में सोचती है। क्या रेलवे इस बारे में विचार करती है कि एक पेंट्री कार और इतने स्टाफ के बावजूद ये लोग अच्छा खाना क्यों दे नहीं पाते?
इनसे लाख गुना बेहतर पिछली सदी में स्टेशन पर पूरी सब्जी, चूड़ा दही या ऐसा ही भोजन उपलब्ध कराने वाले पारंपरिक वेंडर थे। आज भी लोग बरौनी, मुगलसराय, इटारसी या दूसरे स्टेशनों के पुराने वक्त के भोजन को याद करते हैं। उनके स्वाद की तारीफ करते हैं। अब तो पूरी रेल यात्रा में एक ही चीज हुलस कर खाने लायक मिलती है, वह है झालमूडी।
मोदी के खिलाफ तीखी और विवादित क्यों करते हैं खड़गे?
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पटना में श्रीकृष्ण सिंह जयंती समारोह के मौके पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पीएम मोदी के खिलाफ तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, मोदी का बाप भी जाएगा। इस टिप्पणी के बाद ऐसा लगा कि बीजेपी इसे अपने पक्ष में भुनाने की भरपूर कोशिश करेगी जिससे उसे मौजूदा परीक्षा, युवा और चुनाव संबंधी विवादों के झमेले से छुटकारा मिल सके। यह बीजेपी का जांचा परखा दाव रहा है, मोदी के खिलाफ हर विवादास्पद टिप्पणी को वे अपने पक्ष में भावनात्मक माहौल बनाने में इस्तेमाल कर लेते हैं। इस बार भी पटना में बीजेपी नेता सड़कों पर उतरे मगर दिखा कि लगातार सत्ता की आदत ने उन्हें लड़ने भिड़ने के मामले में कमजोर कर दिया है। लोग कम आए, प्रतीकात्मक विरोध हुआ और माहौल बना नहीं।
यह भारत की राजनीति का एक पॉपुलर मुहावरा बन गया है कि अपनी तरफ फेंके गए पत्थरों को अपना हथियार बनाने में मोदी उस्ताद हैं। फिर चाहे गुजरात चुनाव में उन्हें सोनिया गांधी ने मौत का सौदागर कहा हो या 2014 के चुनाव के वक्त मणिशंकर अय्यर ने उन्हें नींच कहा। दोनों बातों का उन्होंने भरपूर फायदा उठाया। मगर अब सत्ता के तीसरे टर्म के आसपास वह मामला घिसने लगा है, इसलिए खड़गे लगातार बेहिचक मोदी पर तीखे हमले करते हैं। यह उनका पहला हमला नहीं है।
उदाहरणों से समझें
इसी साल अप्रैल महीने में खड़गे ने मोदी को तमिलनाडु चुनाव के पहले 'आतंकवादी' कहा। बीजेपी मामले को चुनाव आयोग में तो ले गई, मगर कांग्रेस को इस बयान का कोई नुकसान या बीजेपी को कोई फायदा नहीं हुआ।
मई, 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान खड़गे ने हरियाणा में मोदी को 'झूठो का सरदार' कहा। बीजेपी ने इसे चुनाव में लाभ उठाने का मौका समझा। मगर पार्टी 240 सीटों पर अटक गई।
अप्रैल, 2023 कर्नाटक विधानसभा चुनाव में खड़गे ने मोदी को 'जहरीला सांप' कहा था। मुद्दा खूब उछला। बीजेपी ने परसेप्शन बनाने की कोशिश की। मगर कांग्रेस को अच्छी जीत मिली।
नवंबर, 2022 में खड़गे ने गुजरात चुनाव में मोदी की तुलना रावण से की थी। गुजरात चुनाव बीजेपी जीतती रही है। ऐसा नहीं कह सकते कि खड़गे के इस बयान से बीजेपी को कोई खास लाभ मिला।
इसलिए ऐसा लगता है कि अपने ऊपर फेंके गए पत्थर को हथियार बनाने का मोदी और बीजेपी का कौशल अब चूकने लगा है और खड़गे इस बात को समझ गए हैं।
बाकी यह कौशल बीजेपी को प्रशांत किशोर ने सिखाया था, अब उनसे पूछना चाहिए कि यह दांव अब क्यों काम नहीं कर रहा!
यात्रा करो, मगर किसी को बताओ नहीं
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आपने यह स्लोगन इन दिनों खूब सुना होगा। मोबाइल और सेल्फी के युग में इंसान आज अपने हर अनुभव को तस्वीरों और वीडियो के जरिए सोशल मीडिया पर डाल देता है। हर टूरिस्ट प्लेस पर लोग मोबाइल उठाए वीडियो बनाते नजर आते हैं, देखते कम हैं, दिखाते अधिक। ऐसे में यह सूक्ति वाक्य अब कहा जाता है कि यात्रा कुछ इस तरह कीजिए कि उसका ढिंढोरा पीटने की जरूरत न हो।
आज एक रेल यात्रा में ऐसे ही एक दंपति मिले। महाराष्ट्र के कल्याण के नारायण (75 साल) और उषा (70 साल) जो हिमालय की 15 हजार फुट ऊंची चढ़ाई करके लौट रहे थे। यह दंपति लगभग पिछले पचास साल से यात्रा कर रहा है। जब नौकरी चाकरी और घर परिवार के चक्कर थे तो साल में दो या तीन यात्राएँ करता था, अब हर दो महीने में एक ट्रिप।
इन्होंने लगभग पूरा देश घूम लिया है। इनके किस्सों में एलेप्पी से लेकर हिमालय तक के किस्से हैं। महाराष्ट्र के आदिवासी गांवों की कहानियां हैं। मगर कोई बड़ा टूरिस्ट स्पॉट नहीं। ज्यादातर अल्पज्ञात टूरिस्ट स्टेशन। जिनके बारे में कम लोगों को पता है। जहां भीड़ कम होती है। जहां पहुंचना मुश्किल है। जहां सड़क नहीं जाती। जहां ठहरने के लिए होटल कम हैं।
अपने बैग पैक में पोर्टेबल स्टोव, चावल, दाल और टेंट लेकर चलने वाला यह दम्पति बाहर का खाना पंसद नहीं करता। चाय से लेकर खिचड़ी तक खुद पकाता है। गांवों में किसी के घर ठहर जाता है और उन्हें इसका किराया देता है। ऊषा बताती हैं कि आदिवासी बस्तियों में आज भी लोग 150 रुपए में खाना खिला देते हैं। रहने की जगह मिल जाती है। नारायण बताते हैं कि उन्होंने कई बार स्टेशन पर रात गुजारी है। ज्यादातर यात्राएं ट्रेन से की हैं, पहले स्लीपर क्लास में जाते थे और अब थर्ड एसी या इकॉनमी क्लास। घूमते हैं, मगर पैसे नहीं उड़ाते। कम खर्च में घूमने की कला विकसित की है।
इस उम्र में जहां ज्यादातर बुजुर्गों की रुचि तीर्थाटन की तरफ हो गई है, इसकी प्राथमिकता अभी भी प्रकृति और गुमनाम इलाकों की तलाश है। भारत में ही घूमते हैं, विदेश भ्रमण की ललक नहीं है। आजकल हिमालय उनकी प्राथमिकता में है। बहुत सहज लोग हैं। मुश्किल से खुलते हैं मगर एक बार आदमी जम जाए तो सारे अनुभव बताते हैं।
मैंने पूछा, आप अपने अनुभव लिखते नहीं। तो कहा 2000 से पहले डायरी में लिखता था, अब बंद कर दिया। न यात्रा वृत्तांत लिखते, न सोशल मीडिया पोस्ट करते। बस घूमते हैं और खुश होते हैं। सफ़र का और नज़ारों का अपनी आंखों से आनंद लेते हैं।
मैंने बहुत झिझकते हुए कहा कि आप दोनों की तस्वीर ले लूं। नारायण ने तो मना कर दिया मगर उषा तैयार हो गईं। फिर बात बन गई।
यात्रा करो, मगर किसी को बताओ नहीं
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आपने यह स्लोगन इन दिनों खूब सुना होगा। मोबाइल और सेल्फी के युग में इंसान आज अपने हर अनुभव को तस्वीरों और वीडियो के जरिए सोशल मीडिया पर डाल देता है। हर टूरिस्ट प्लेस पर लोग मोबाइल उठाए वीडियो बनाते नजर आते हैं, देखते कम हैं, दिखाते अधिक। ऐसे में यह सूक्ति वाक्य अब कहा जाता है कि यात्रा कुछ इस तरह कीजिए कि उसका ढिंढोरा पीटने की जरूरत न हो।
आज एक रेल यात्रा में ऐसे ही एक दंपति मिले। महाराष्ट्र के कल्याण के नारायण (75 साल) और उषा (70 साल) जो हिमालय की 15 हजार फुट ऊंची चढ़ाई करके लौट रहे थे। यह दंपति लगभग पिछले पचास साल से यात्रा कर रहा है। जब नौकरी चाकरी और घर परिवार के चक्कर थे तो साल में दो या तीन यात्राएँ करता था, अब हर दो महीने में एक ट्रिप।
इन्होंने लगभग पूरा देश घूम लिया है। इनके किस्सों में एलेप्पी से लेकर हिमालय तक के किस्से हैं। महाराष्ट्र के आदिवासी गांवों की कहानियां हैं। मगर कोई बड़ा टूरिस्ट स्पॉट नहीं। ज्यादातर अल्पज्ञात टूरिस्ट स्टेशन। जिनके बारे में कम लोगों को पता है। जहां भीड़ कम होती है। जहां पहुंचना मुश्किल है। जहां सड़क नहीं जाती। जहां ठहरने के लिए होटल कम हैं।
अपने बैग पैक में पोर्टेबल स्टोव, चावल, दाल और टेंट लेकर चलने वाला यह दम्पति बाहर का खाना पंसद नहीं करता। चाय से लेकर खिचड़ी तक खुद पकाता है। गांवों में किसी के घर ठहर जाता है और उन्हें इसका किराया देता है। ऊषा बताती हैं कि आदिवासी बस्तियों में आज भी लोग 150 रुपए में खाना खिला देते हैं। रहने की जगह मिल जाती है। नारायण बताते हैं कि उन्होंने कई बार स्टेशन पर रात गुजारी है। ज्यादातर यात्राएं ट्रेन से की हैं, पहले स्लीपर क्लास में जाते थे और अब थर्ड एसी या इकॉनमी क्लास। घूमते हैं, मगर पैसे नहीं उड़ाते। कम खर्च में घूमने की कला विकसित की है।
इस उम्र में जहां ज्यादातर बुजुर्गों की रुचि तीर्थाटन की तरफ हो गई है, इसकी प्राथमिकता अभी भी प्रकृति और गुमनाम इलाकों की तलाश है। भारत में ही घूमते हैं, विदेश भ्रमण की ललक नहीं है। आजकल हिमालय उनकी प्राथमिकता में है। बहुत सहज लोग हैं। मुश्किल से खुलते हैं मगर एक बार आदमी जम जाए तो सारे अनुभव बताते हैं।
मैंने पूछा, आप अपने अनुभव लिखते नहीं। तो कहा 2000 से पहले डायरी में लिखता था, अब बंद कर दिया। न यात्रा वृत्तांत लिखते, न सोशल मीडिया पोस्ट करते। बस घूमते हैं और खुश होते हैं। सफ़र का और नज़ारों का अपनी आंखों से आनंद लेते हैं।
मैंने बहुत झिझकते हुए कहा कि आप दोनों की तस्वीर ले लूं। नारायण ने तो मना कर दिया मगर उषा तैयार हो गईं। फिर बात बन गई।
पिछले 21-22 साल से सक्रिय राजनीति में रहे अनंत सिंह को उनके राजनीतिक जीवन में पहली बार किसी पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखाया है।
वह भी इस आरोप में कि उन्होंने जेडीयू के शीर्ष नेताओं के खिलाफ अपमानजक टिप्पणियां की और चुनाव में विरोधी उम्मीदवार की मदद की। यानी पार्टी विरोधी गतिविधि में।
उन्हें कभी उनके आपराधिक मामलों की वजह से किसी पार्टी ने बाहर का रास्ता नहीं दिखाया। जबकि लगभग हर दौर में उनपर दो दर्जन से अधिक आपराधिक मुकदमे रहे, कुछ गंभीर किस्म के आरोप भी रहे। बीते विधानसभा चुनाव में तो उन पर हत्या का गंभीर आरोप था, मगर पार्टी ने उनकी भरपूर मदद की।
नीतीश कुमार तो हमेशा अनंत सिंह के प्रति नरम रहे। अब तमाम सुचिता के दावों के बावजूद।
जदयू ही नहीं राजद भी उन्हें अपने यहां जगह देने में बाहें पसारे दिखता है। इस बार तो जनसुराज को भी अनंत सिंह की मदद लेने से गुरेज नहीं रहा।
यह हमारे देश की राजनीति की विचित्र विडंबना है। यहां हत्या से बड़ा अपराध पार्टी विरोधी गतिविधि है।
भारत में ही नहीं, दुनिया के कई हिस्सों में पिछले चार हजार साल से सिंह के साथ दिखाई देने वाली ऐसी कई शक्ति की देवियों की पूजा होती रही है?
वे हथियारों से लैस हैं. वे युद्ध करती हैं, शत्रुओं का संहार करती हैं. हमारे यहां भारत माता की कल्पना भी कभी अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली देवी के रूप में की गई.
देवी की यह शक्तिशाली छवि समाज की कल्पना में तो मौजूद है, मगर जब कोई वास्तविक स्त्री अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरती है, सत्ता से सवाल पूछती है और अपने संघर्ष का नेतृत्व करती है, तो समाज का एक हिस्सा आज भी सहज नहीं रह पाता.
मिथकों से इतिहास तक और वहां से आज की आंदोलनकारी युवतियों तक, इसी सवाल की पड़ताल करते हुए मैंने यह आलेख लिखा है. इस लिंक पर पढ़ सकते हैं—
biharchronicle.com/from-godd…
बिहार में अवैध वेतन निकासी के नाम पर एक बड़े घोटाले की आहट है। इस घोटाले ने राज्य की वेतन भुगतान समस्या पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पूरे राज्य से वेतन से अधिक भुगतान, दोहरे भुगतान, कई गुना अधिक HRA के भुगतान की शिकायतें मिल रही हैं। भले इसकी चर्चा कम हो रही है, मगर सरकार में इसको लेकर अफरा तफरी का माहौल है।
राज्य में शिक्षा विभाग और गृह विभाग के 10.30 लाख कर्मियों का वेतन रोककर एक एक कर्मी के कागजात मिलाए जा रहे हैं। जगह जगह से मामले सामने आ रहे हैं।
क्या है यह पूरा मामला? डाटा एंट्री ऑपरेटरों ने कर्मियों और अफसरों से मिलकर कैसे दिया इसे अंजाम? सरकार किन बिंदुओं पर जांच करा रही है? क्या जांच पर्याप्त है? क्यों हमारे वेतन भुगतान का डिजिटल सिस्टम भी लीक प्रूफ नहीं है? इन तमाम मसलों पर एक विस्तृत रिपोर्ट Bihar Chronicle के लिए लिखी है। पढ़े और ठीक लगे तो आगे बढ़ाएं।
रिपोर्ट का लिंक biharchronicle.com/signs-of-…
व्यूज की भूख - वह मदद करने आई थी, उसे रशियन दुल्हनिया बना दिया
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पहले इस वीडियो को देखें। यह उसी महिला और उसके साथियों का वीडियो है जिसे कल तक रशियन दुल्हनिया बताया जा रहा था। जबकि वह अपनी संस्था shivia के साथ बिहार की महिलाओं की आजीविका से जुड़ी मदद करने आई थी।
अब उस पूरे मामले की कहानी इस लिंक पर पढ़ें
biharchronicle.com/a-hunger-…
pushyamitra retweeted
Replying to @pushymitr
@pushymitr जी की यह रिपोर्ट बेहद चिंताजनक है !भारत सरकार, गुजरात सरकार और बिहार सरकार को अविलंब श्रमिकों, श्रमिक संगठनों और मिल मालिकों के बीच अविलंब मध्यस्ता कर समाधान निकालना चाहिए!
सूरत में प्रवासी मजदूरों का 'गांव चलो अभियान': आठ घंटे की शिफ्ट और साप्ताहिक छुट्टी की मांग पर अडिग hindi.downtoearth.org.in/eco… – at Saharsa, India
सूरत में आठ घंटे की शिफ्ट और साप्ताहिक अवकाश की लड़ाई लड़ रहे मजदूरों ने आज जिला कलेक्टर कार्यालय पर प्रदर्शन करने का फैसला किया है।
अब तक इस मामले में क्या अपडेट हैं, उसे समझने के लिए इन्हें देख सकते हैं
राघोपुर नाव हादसे में हुई 13 लोगों की मौत लापरवाहियों की मिसाल है. सरकार और समाज दोनों की लापरवाहियां. न लोगों में अपनी सुरक्षा की फिकर है, न सरकार जिसकी जिम्मेदारी नौवहन को सुरक्षित बनाना है, इन मामलों को लेकर गंभीर होती है. हर हादसे के बाद नावों के निबंधन, सुरक्षा इंतजाम, लाइफ जैकेट वगैरह के आदेश जारी होते हैं, मगर कुछ दिन बाद सरकार ही अपने उन आदेशों को भूल जाती है.
बिहार में 1,550 नौका घाट और 7,000 से ज्यादा नावें रोजाना चलती हैं. उन पर सवार लाखों यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
बिहार क्रोनिकल पर इन्हीं मसलों को लेकर लिखा है- लिंक
biharchronicle.com/who-will-…
पिछले दो महीने से बिहारी मजदूर सूरत में काम के घंटों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। इस बीच दो दिन से केंद्रीय कपड़ा मंत्री Giriraj Singh भी सूरत में हैं।
मगर सूरत में उनकी लगभग सभी मुलाकातें करोबारियों और उद्यमियों के साथ हुई, उन्होंने एक बार भी आंदोलनकारियों से मिलना जरूरी नहीं समझा, बस बयान जारी किए।
अगर उन्होंने कोई मुलाकात की होती तो उसकी तस्वीर उनके सोशल मीडिया वाल पर होती। अभी जो तसवीरें हैं, वे यही हैं।
जब पूरा देश दिल्ली के CJP आंदोलन की तरफ देख रहा है, सूरत में बिहारी मजदूर अपने हक के लिए लड़ रहे हैं.
12 घंटे की ड्यूटी से मुक्ति, 8 घंटे की शिफ्ट और हफ्ते में एक दिन सवेतन छुट्टी की मांग. मालिकों की भी हैं अपनी शर्तें. अब आंदोलन पहुंचा है ‘गांव चलो’ तक.
क्या अपने हक के लिए सूरत छोड़कर गांव लौटेंगे मजदूर? क्या उन्हें मिलेगी 8 घंटे की शिफ्ट?
पढ़िए बिहार क्रॉनिकल की खास रिपोर्ट इस लिंक पर
biharchronicle.com/will-the-…
कल के CJP आंदोलन और पुलिस की सख्ती के मसले पर दो AI प्लेटफार्म ChatGPT और Google Gemini की क्या राय है देखें -
CJP आंदोलन और सरकारी सख्ती पर क्या कहता है AI?
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क्या CJP का आंदोलन अन्ना आंदोलन या जेपी आंदोलन जैसा है? सरकार की सख्ती और आज के दमन की तुलना इमरजेंसी से की जा सकती है? और क्या भारत में भी नेपाल-बांग्लादेश जैसे हालात पैदा होने का खतरा है?
इन सवालों पर ChatGPT और Google Gemini की राय क्या है? दोनों AI के जवाबों में कई दिलचस्प समानताएं हैं, तो कुछ अहम फर्क भी।
पढ़िए, एक आंदोलन, चार सवाल और AI का विश्लेषण।
biharchronicle.com/the-cjp-m…
मक्खी मारने का हथौड़ा
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1. देश भर की 200 से अधिक ट्रेनें रद्द या री-शेड्यूल
2. दिल्ली मेट्रो के 45 स्टेशन बंद
3. देश भर में छात्रों की धड़पकड़
5. जंतर मंतर के चार किमी के दायरे में जबरदस्त नाकेबंदी
6. 25 हजार से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती
वजह - कॉकरोच जनता पार्टी की अपील पर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कोई प्रदर्शन न हो पाए।
वैसे सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है - मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं।
मैंने देखा था नमक हलाल फिल्म में अमिताभ बच्चन को तलवार से मक्खी उड़ाते हुए। कई मेहमानों की नाक कट गई थी।
हां, मक्खियों को सत्ता की नाक पर बैठने की आदत लग गई है। सत्ता नाक बचाने में परेशान है।
पुलिस के डर से दर्जनों लोग पुनपुन नदी में कूद गए। दो की मौत हो गई।
अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई के बीच आखिर ऐसा क्या हुआ कि लोगों ने पुलिस से बचने के लिए नदी को रास्ता चुना?
क्या बेहरावां चकिया में पुलिस कार्रवाई ने अपनी हदें तोड़ दी थी?
चार दिन बाद गांव पहुंचकर की गई पूरी पड़ताल पढ़िए इस लिंक पर
biharchronicle.com/two-death…

























