ऐन कार्सन की कविताएँ और संवाद ::
अँग्रेज़ी से अनुवाद : विनोद चंदोला
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यह सुदीर्घ साक्षात्कार गए बीस दिनों के बीच मुमकिन हुआ है। इसकी नींव में दो दिन और एक आवागमन [काशी से प्रयाग—प्रयाग से काशी] है। यह संवाद इसलिए बेहद दुर्लभ है कि यह हिंदी की सबसे वरिष्ठ और समादृत पीढ़ी के एक कवि से हिंदी की सबसे नई और प्रतिभामय पीढ़ी के एक कवि का संवाद है। एक सीमित अवधि के लिए सुलभ हुई इस गतिशीलता में कवि के व्यक्तित्व और कवित्व के समग्र आयाम आ सके हैं; यह कहना कुछ ज़्यादा होगा, लेकिन यह ज़रूर कह सकते हैं कि इसमें ज्ञानेंद्रपति की कविता की पार्श्वभूमि कुछ प्रकट-स्पष्ट हुई है। इससे इतर इस संवाद को इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि यह हिंदी में पॉडकास्ट के नॉन-सीरियस विन्यास और टेक्स्ट में रूढ़ व्यवहार से इतर संवाद की एक नवीन शैली और भाषा का मानकीकरण करने का एक विनययुक्त यत्न है। कुछ वाक्य, शब्द, संज्ञाएँ, पद और विशेषण कैसे बरतने हैं; इस संवाद से गुज़रकर समझा-सीखा जा सकता है।
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सीज़र पावेसी की कविताएँ :
अनुवाद : शायक आलोक
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हाथ में पोस्टर लेकर खड़े रहना और फ़ोटो खिंचवाने की विरोध-शैली को नई पीढ़ी ने संभवतः पिछले एक दशक से पूरी दुनिया में होने वाले विरोध-प्रदर्शनों के विजुअल्स से सीखा होगा। इसमें मुँह से कुछ नहीं बोलना है, लेकिन फ़ोटोज़ और रील्स में तब्दील होकर उन चुटीले वाक्यों के साथ इंटरनेट पर फैल जाना है। यह आंदोलन ज़मीन पर हुआ और ज़मीन पर खड़े युवाओं के हाथ में फ़ोन है, इसीलिए यह उससे ज़्यादा इंटरनेट पर भी हुआ। सब जगह विट, हाज़िरजवाबी और आक्रोश दिखा। सोशल मीडिया का आलम तो यह रहा कि लोगों ने इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी और शिक्षा मंत्री की बेटी के मेसाचुसेट्स आधृत ‘द फ़्लेचर स्कूल’ तक को आंदोलन में शामिल कर लिया। पुलिस के बग़ल से गुज़र रहे लोग पूछ बैठते रहे कि ‘लाठी तो नहीं मारोगे सर!’
• अखिलेश सिंह
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