
Associate Editor @aajtakradio, Podcast: Padhaku Nitin & Sandarbh, Ex @CNBC_awaaz, @TV9Bharatvarsh, @News24tvchannel •Lawyer • Writer of #इतिइतिहास, #नफरतीचिंटू
Noida, India
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भगत सिंह पत्रकार भी रहे. जब घर वाले ब्याह कराने के पीछे पड़े तो लाहौर से निकल गए. फिर कहीं रहना टिकना था. उस वक्त पढ़ने-लिखने वाले पत्रकारिता करते थे. उन्होंने भी की. इस सिलसिले में कई जगह बेगार की और एकाध जगह कुछ रुपया भी कमाया. कानपुर के प्रताप अख़बार में भी काम करने लगे. वहां गणेश शंकर विद्यार्थी संपादक थे. भगत ज़्यादा नहीं टिके. अपनी राह चले गए. विद्यार्थी अपना काम करते रहे. कभी लिखकर, कभी कांग्रेस के ज़रिए और कभी प्रताप के दफ्तर में क्रांतिकारियों को छिपाकर. संयोग देखिए कि जिस दिन लाहौर में भगत सिंह साथियों समेत फांसी का फंदा चूम रहे थे उसके दो दिन बाद विद्यार्थी कानपुर में सांप्रदायिक दंगा रोकते हुए शहीद हो गए. महज़ चालीस में चले गए लेकिन विद्यार्थी उपनाम लगाकर पत्रकारों के चिर गुरू रहे.
#इतिइतिहास
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प्राचीन भारत ने सत्य, जीवन और ब्रह्मांड को कैसे देखा?
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मैं पेंटिंग्स के बारे में इतना कम जानता हूं कि कुछ नहीं जानता लिखना चाहता हूं. पढ़े लिखे की कथित छवि को तोड़ने की हिम्मत न होने के कारण “कम जानता हूं” का सहारा लेता हूं. फिर भी मैं एडवर्ड हॉपर को चाहने का दावा करता हूं. उनकी कला का प्रशंसक होने पर खुश हूं. उनकी सोच समझ की लाइन पर कुछ कदम चल पाने का भरोसा खुद में पाता हूं. जब इस लायक खुद को पाऊंगा कि उन पर लिख सकूं मैं लिखूंगा. उन्होंने फरमाया था- “Great art is the outward expression of an inner life of the artist, and this inner life will result in his personal vision of the world.” ये उनकी ही एक पेंटिंग है. एकांत में बैठे एक शख्स को सूरज छू रहा है.
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Advocate Amit Chaudhary कैसे फर्ज़ी Murder Case में 12 साल हुए Torture? फिर सिस्टम से कैसे लिया बदला? जानिए खुद अमित चौधरी से Padhaku Nitin में
Full Ep - youtu.be/ssFhsRCCTWo
@thenitinnotes
#ThirdDegreeTorture #FalseMurderCase #WrongfulImprisonment #IndianJudiciary #PoliceTorture #LegalJustice #HumanRights #AmitChaudhary
[Third Degree Torture, False Murder Case, Wrongful Imprisonment, Police Torture, Indian Justice System, Advocate Amit Chaudhary ]
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Aryan Migration Theory में कितना दम है? जानिए ASI के ADG Dr. Sanjay Kumar Manjul से
Full Ep - youtu.be/3AhE6yJcWQk
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#AryanMigrationTheory #AryanTheory #AncientIndia #IndianHistory #IndusValleyCivilization #HarappanCivilization #Mesopotamia
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Mahabharat की Real Locations के नीचे Archaeologists को क्या दबा मिला? जानिए Archaeological Survey of India के ADG Dr. Sanjay Kumar Manjul Unfiltered से
Full Ep - youtu.be/3AhE6yJcWQk
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#PashupatiSeal #IndusValleyCivilization #SindhuGhatiSabhyata #HarappanCivilization #Mahabharata #AryanMigrationTheory #Aryans #AncientIndia
जंतर मंतर सिर्फ एक प्रोटेस्ट साइट नहीं है।
जब अंग्रेज़ों के प्रभुत्व तले दुनिया अपनी घड़ी उनके मुताबिक सेट नहीं कर रही थी, रोमन कैलेंडर हमारी चर्या तय नहीं करते थे, पंचांगों का बहुत महत्व था और हिंदू मुसलमान मिल जुलकर इस देश की गति तय कर रहे थे उस वक्त जंतर मंतर का अपना महत्व था। जंतर मंतर भी अलग अलग पांच थे, दिल्ली, जयपुर, वाराणसी, उज्जैन, मथुरा में।
दिल्ली में जिन पांच छह इमारतों को मिलाकर हम जंतर मंतर मानते हैं वो दरअसल इमारत नहीं “यंत्र” हैं। ऐसे यंत्र जो आकाश में विचरते ग्रह नक्षत्रों के मुताबिक समय बताते थे। जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 18वीं सदी की शुरुआत यानि 1724 से 1735 के बीच में ये सारे जंतर मंतर बनवाए। उन्हें गणित और खगोल में बड़ी दिलचस्पी थी। इसी के चलते उन्होंने ध्यान दिया कि उनके दौर में इस्तेमाल हो रही सारणियों और ब्रास/तांबे के छोटे यंत्रों से हो रही गणना गड़बड़ा रही हैं। ये यंत्र छोटे तो थे ही, मौसम बदलने पर फैलते- सिकुड़ते भी थे। नतीजतन गणनाओं में चूक हो रही थी। तब उन्होंने फैसला लिया कि चूने और लाल बलुआ पत्थर के विशाल, स्थायी यंत्र बनवाए जाएंगे ताकि सेकेंड के सूक्ष्म हिस्से तक सटीक समय और ग्रहों की सही स्थिति मापी जा सके।
सबसे पहले उन्होंने इस क्रम में दिल्ली वाला जंतर मंतर बनवाया जो उस वक्त के शहर से बाहर था। ये जगह जयसिंहपुरा कहलाती थी। महाराजा के अधीन थी। आसमान साफ तौर पर देखा जा सके इसलिए इस जगह को चुना गया। यहां जो इमारतें यानि यंत्र आप अगली छुट्टी में दोस्तों या परिवार के साथ देखने जा सकते हैं उनके नाम सम्राट यंत्र, मिश्र यंत्र, राम यंत्र, जयप्रकाश यंत्र हैं। सबसे मशहूर मिश्र यंत्र है जिसे आप देखकर बता देते हैं कि ये तो जंतर मंतर है।
लिखते लिखते बता दूं कि जैसे आज दुनिया के लिए ग्रीनविच (0°) प्राइम मेरिडियन है, वैसे ही प्राचीन भारत में उज्जैन को दुनिया की मुख्य मध्याह्न रेखा माना जाता था। वराहमिहिर और आर्यभट्ट के समय से ही उज्जैन को हिंदू खगोलशास्त्र का केंद्र माना गया क्योंकि ये कर्क रेखा पर स्थित था। इसके चलते सवाई जय सिंह ने उज्जैन में भी जंतर मंतर बनवाया ताकि उज्जैन के स्थानीय समय के आधार पर भारत के पंचांग और समय की सटीक गणना जारी रह सके।
जय सिंह इस ज्ञान को लेकर इतने उत्सुक और उत्साही थे कि जंतर मंतर की रीडिंग्स लेकर ऑब्ज़र्व करते थे। उन्होंने पश्चिम के खगोलविदों से ये आंकड़े शेयर किए। 1727 में एक टीम इस सिलसिले में पुर्तगाल के लिस्बन भेजी गई। इसमें जेसुइट पादरी फादर मैनुअल डी फिग्युरेइदो और जय सिंह के प्रतिनिधि पेड्रो डि सिल्वा थे। ये दल वापसी में उनके लिए यूरोप के सबसे शानदार खगोलीय उपकरण, किताबें और डेटा लेकर आया। राजा जय सिंह ने यूरोप की टेबल्स पढ़ीं और उसकी तुलना अपने जंतर मंतर वाली रीडिंग्स से की।
उन्होंने पाया कि यूरोपीय सारणियों में दिए गए चंद्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण और चंद्रमा की गति से जुड़े कुछ पूर्वानुमानों में कई मिनट की चूक थी। उन्होंने फ्रांस, पुर्तगाल और जर्मनी से खगोलविदों को जयपुर आमंत्रित किया और उन्होंने जयपुर के जंतर मंतर पर बैठकर रीडिंग्स लीं। ये आंकड़े यूरोप की अकादमियों जैसे पेरिस की रॉयल एकेडमी ऑफ साइंसेज को भिजवाए गए।
राजा साहब ने इस आधार पर एक मशहूर किताब लिखी जो शायद बाद में अपडेट होती रही। इसका नाम था- ज़ीज-ए-मोहम्मद शाही। इसमें उन्होंने विदेशी डेटा और भारतीय- इस्लामी खगोल विज्ञान की रीडिंग लेकर काफी हद तक सटीक पंचांग बनाया। इसे मुगल दरबार मानता था। लोगों ने भी माना। इस कमाल के प्रयोग पर विदेशी यात्री नज़र रखते थे इसलिए जब भारत आए तो जंतर मंतर जाते थे। रहस्य, विज्ञान और इतिहास से ओतप्रोत जंतर मंतर पर अनीशा शेखर मुखर्जी ने एक किताब लिखी थी। दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर और यूके की डीमॉन्ट फ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में उनकी पढ़ाई लिखाई हुई है। लाल किले पर पहले एक खूबसूरत किताब लिख चुकी हैं। कभी हाथ लगे तो उनकी किताब पढ़िएगा। हमने पढ़ाकू नितिन में एक पॉडकास्ट किया है। वो पब्लिश हो चुका। वही देखिएगा। फिलहाल तो जंतर मंतर की उपेक्षा का भारी दुख है। हम अपनी बेशकीमती इमारतों का ब्यूटीफिकेशन करते हैं मगर रीस्टोरेशन नहीं।
#इतिइतिहास
"मैं, जो बहुत बेसब्र हूँ, उनसे पहले ही जा रहा हूँ।"
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22 फरवरी 1942 की रात ब्राज़ील के एक शांत पहाड़ी कस्बे में जब स्टीफन ज़्विग और उनकी पत्नी लोटे ने नींद की गोलियों का ओवरडोज़ लिया तब वो अपने ज़हन में बहुत हद तक सारे सवालों से मुक्त थे। उस रात बीसवीं सदी के उस पूरे विचार की मौत हो गई थी जिसने यूरोप को कला, दर्शन और उदारता का केंद्र माना था।
ज़्विग को शायद आप में से कुछ ने पढ़ा हो, कुछ ने मेरी तरह देर से खोजा हो। मुझे उनका नाम पहली बार पता चला था जब एक शानदार फिल्म खत्म हुई और अंत में डायरेक्टर ने उन्हें याद करते हुए कुछ लाइनें लिखीं।
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ज़्विग विश्वयुद्धों के दौर में दुनिया के सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले लेखक थे। वियना के एक संपन्न यहूदी परिवार में पले-बढ़े ज़्विग की आँखों ने उस यूरोप को देखा था जो बिना पासपोर्ट की खुली सीमाओं, वियना के मशहूर कैफ़े-हाउसों में चलने वाले दार्शनिक विमर्शों और एक साझा महाद्वीपीय सभ्यता का सपना जी रहा था। ज़्विग ने अपनी आत्मकथा 'द वर्ल्ड ऑफ यस्टरडे' में इसे 'सुरक्षा का स्वर्णिम युग' कहा था। विडंबना देखिए इसी आत्मकथा की कॉपी प्रकाशक को डाक से भेजने के ठीक 24 घंटे बाद ज़्विग ने अपनी पत्नी का हाथ थामे यह दुनिया छोड़ दी।
फ्रायड, गुस्ताव महलर और रिल्के जैसे दिग्गजों के समकालीन ज़्विग 1920-30 के दशक में जर्मन भाषियों और पूरे यूरोप में एक सेलिब्रिटी की तरह पढ़े जा रहे थे। 'Beware of Pity' और 'Letter from an Unknown Woman' जैसी उनकी किताबों के अनुवाद दुनिया भर में हिट थे। मगर समय बदला। 1914 के पहले विश्व युद्ध और फिर 1930 के दशक में उभरे नाज़ीवाद ने उस परिष्कृत दुनिया को चंद बरसों में रौंद डाला।
जिस वियना को ज़्विग अपनी आत्मा मानते थे वहाँ उनकी किताबें जलाई जाने लगीं। 10 मई 1933 को हिटलर के प्रोपेगैंडा मंत्री गोयबल्स के आदेश पर उन्मादी नाज़ी छात्रों ने चौराहों पर उन किताबों को जलाया जिन्हें वे 'अन-जर्मन' मानते थे। इसमें फ्रायड, मार्क्स, आइंस्टीन और थॉमस मान के साथ ज़्विग की किताबों भी थीं। उनकी किताबों की छपाई पर पाबंदी लग गई। प्रकाशकों पर दबाव बनाकर अनुबंध रद्द कराए गए।
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अराजनैतिक स्वभाव के ज़्विग पहले विश्व युद्ध के बाद से वियना छोड़कर साल्ज़बर्ग में एक पहाड़ी पर बने अपने सुंदर घर में रहने चले गए थे। 1934 के फरवरी में ऑस्ट्रियाई गृहयुद्ध के दौरान एक दिन पुलिस ज़्विग के घर में घुस आई। झूठा शक जताया गया कि उन्होंने घर में वामपंथी मिलिशिया के हथियार छुपा रखे हैं। तलाशी में कुछ नहीं मिला, लेकिन एक विश्वप्रसिद्ध, शांतिप्रिय लेखक के घर में पुलिस का इस तरह अपमानजनक ढंग से घुसना यह बता गया कि अब मुल्क में न कानून का राज बचा है, न नागरिक गरिमा। आहत होकर ज़्विग लंदन चले गए। 1938 में जब हिटलर ने ऑस्ट्रिया का विलय किया तो ज़्विग का पासपोर्ट रद्द हो गया। वो स्टेटलेस हो गए। ब्रिटेन में रिफ्यूजी कार्ड लेना पड़ा। युद्ध छिड़ते ही जर्मनों पर शक़ गहराने लगा तो वे पहले अमेरिका और फिर 1941 में ब्राज़ील में शरण पाए।
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फरवरी 1942 में नाज़ी अजेय लग रहे थे। 60 साल के ज़्विग की हिम्मत अब टूटने लगी थी।
22 फरवरी 1942 को रविवार था। पेट्रोपोलिस के अपने छोटे से किराए के बंगले में ज़्विग ने आत्मीयजनों को खत लिखने के बा पुर्तगाली में “घोषणा” शब्द लिखकर जर्मन में अपना अंतिम सुसाइड नोट टेबल के बीचों-बीच रखा।
रात करीब 9 से 10 बजे के बीच ज़्विग और लोटे ने अपने बेडरूम का दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया। लंबे वक्त से जमा की गई नींद की गोलियों का घोल पहले 60 साल के ज़्विग ने पिया और अचेत हो गए। फिर 33 साल की लोटे ने भी उतनी ही खुराक ले ली। रिपोर्ट कहती हैं कि ज़्विग ने लोटे से जीने का आग्रह किया था, मगर वे ज़्विग के बिना इस उजड़ी दुनिया में रहने को तैयार नहीं थीं।
अगली सुबह नाश्ते के लिए जब नौकरानी ने दरवाज़ा खटखटाया तो अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई। सुबह दस बजे तक कोई हलचल न होने पर पुलिस बुलाई गई और दरवाज़ा तोड़ा गया।
अंदर संघर्ष या तड़प का कोई निशान नहीं था। हर चीज़ अपनी जगह पर करीने से रखी थी। ज़्विग जा चुके थे। उनके लिखे नोट की कुछ लाइनें साफ चमक रही थीं- मैं अपने मित्रों को सलाम करता हूँ! काश वो आनेवाली भोर देख सकें! मैं, जो बेसब्र हूँ, पहले जा रहा हूँ।"
ज़्विग का जाना यह सबक छोड़ गया कि सभ्यताएँ और लोकतंत्र कोई अमर शिलालेख नहीं हैं जिन्हें कभी खरोंच न आए। जिस शिष्टाचार और आज़ादी को हम बहुत सहज मान बैठते हैं, अगर उनकी हिफ़ाज़त न की जाए तो वे नफ़रत के एक ही झोंके में तिनकों की तरह बिखर सकते हैं।अफसोस कि जिस भोर से पहले वो बेसब्र होकर चले गए, वो कुछ ही साल बाद आ गई थी।
#इतिइतिहास
(फोटो- ज़्विग का अंतिम नोट)
ना इस्तेमाल करने से इंसान की पूंछ मिट गई, मुझे डर है एनसीआर वालों की कार से इंडिकेटर ना गायब हो जाएं।
फाहियान ने जो देखा वो 1627 साल पुराना भारत था। पता नहीं कब कागज़ पत्तर की अंग्रेज़ी गुलामी हमें सभ्य लगने लगी। अब नागरिक स्वतंत्रता भी सिर्फ़ कागज़ में है। उसे हरने के दुनिया भर की हुकूमतों के पास पचास बहाने हैं।
ये जितेंद्रनाथ सान्याल ने लिखा था. वही जिन्होंने भगत सिंह के साथ संघर्ष किया. किसी वक्त क्रांतिकारियों की बाइबिल रही “बंदी जीवन” लिखनेवाले शचींद्रनाथ सान्याल और काकोरी में सज़ा काटनेवाले भूपेंद्रनाथ सान्याल के भाई. सान्याल बंधुओं के बारे में थोड़ा पढ़िए.
#इतिइतिहास
देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में खींची गई अंतिम फोटो।
सादेपन, दृढ़ता, ईमानदारी और कर्मठता के प्रतीक शास्त्री जी को जयंती पर कोटि कोटि प्रणाम!! 🙏🙏🙏
गांधी के राष्ट्रपिता होने पर बड़े सवाल किए जा रहे हैं। कोई राष्ट्र का पिता कैसे हो सकता है भला???
शब्दज्ञान के जुगनुओं, हो तो राष्ट्र का पति भी नहीं सकता लेकिन है। राष्ट्र कभी देश नहीं होता। ये नेशन स्टेट है। नेशन स्टेट में सबकुछ हो सकता है। पति भी पिता भी। जिस दुनिया से ये अवधारणाएं फैली हैं ये पद और पदवी भी वहीं से आए हैं। काश कि तुमने पॉलिटिकल साइंस पढ़ा होता, काश कि तुम्हारा लेनादेना इतिहास से होता, काश कि तुम नफरत हटाकर वाकई प्रश्न का उत्तर खोजने निकलते।
चीन पर पॉडकास्ट की तैयारी में फाहियान को पढ़ रहा था तो कल रात कुछ लिखकर पोस्ट किया। थोड़ा मन हुआ कि सबको बताऊं फाहियान ने पाटलिपुत्र में क्या देखा। पाटलिपुत्र आज के पटना से दूर नहीं है। यहां फाहियान ने बहुत चीज़ों के अलावा एक ऐसे अस्पताल का ज़िक्र किया जो रोगियों की मुफ्त सेवा में लगा था। हाल फिलहाल इसके खंडहर कुम्हरार में पाए जा सकते हैं। गूगल पर बेशुमार फोटो पड़ी हैं। पटना वालों के लिए ये कोई हैरत वाली बात नहीं लेकिन बहुत लोग हैं जिन्हें ये नहीं मालूम।
1912-15 में कुम्हरार में खुदाई हुई थी तो वो सब मिला जिसके बारे में फाहियान ने लिखा था। मेरी पिछली पोस्ट के नीचे कमेंट में एक सज्जन ने पूछा था कि मठ मिले, अस्पताल मिले, स्तूप मिले लेकिन महल नहीं मिले क्या, वो ईंट के नहीं बनते थे? तो उसका जवाब है कि मिले और ऐसे मिले कि दुनिया का माथा हिल गया।
यहां 80 खंभों वाला अशोक का बनवाया भव्य सभागार मिला। हर खंभे की ऊंचाई 32 फीट थी। दस पंक्तियों में आठ आठ खंभे खड़े किए गए थे। इन पर शीशे जैसी चिकनी पॉलिश थी जिसे 650 साल बाद भी फाहियान महसूस कर सकता था। इन खंभों को धंसने से बचाने के लिए साल की लकड़ी के बड़े-बड़े चौखटे नीचे बिछाए गए। सभागार की छत और फर्श लकड़ी के थे। जब करीब सौ साल पहले खुदाई चली तो इन सब चीज़ों के साथ राख और कोयले की मोटी परत मिली। पुरातत्वविदों ने माना कि ये भव्य इमारत किसी अग्निकांड में खाक हुई थी। आग के ताप से बलुआ पत्थर के खंभे टुकड़ों में बिखर कर फैल गए।
ऐसा नहीं कि इस महल और सभागार का पता बस चीनी यात्री फाहियान देता हो। उसके 700 साल पहले मेगस्थनीज़ जब अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य के समय आया था तब उसने यहां लकड़ी का प्रासाद देखा था। उसने लिखा कि भारतीय राजप्रासाद ईरान के हखामनी साम्राज्य के विख्यात महलों से ज़्यादा सुंदर और प्रभावित करनेवाले थे। मेगस्थनीज़ ने चंद्रगुप्त मौर्य के महल का वर्णन किया है वो लकड़ी का बना था। पटना के ही बुलंदीबाग जो कुम्रहार से थोड़ी दूरी पर है वहां की खुदाई में लकड़ी की विशाल चारदीवारी, लकड़ी के नाले और सुरक्षा प्राचीर के अवशेष मिले हैं।
चंद्रगुप्त वाले लकड़ी के महल को बाद में अशोक ने बड़ा और खूबसूरत बनवा दिया जहां श्रीलंकाई परंपरा और इतिहास के मुताबिक तृतीय बौद्ध संगीति आयोजित हुई, जिसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की थी। ये बहुत बड़ी घटना थी जिसे आज सिलेबस में पढ़ाते हैं। इसके बाद मैंने आपको बताया कि इस इमारत को फाहियान ने देखा जब इसका असर खत्म होने की तरफ था।
उसके भी करीब सवा दो सौ साल बाद ह्वेनसांग आया तब तक पाटलिपुत्र का पतन हो चुका था और सत्ता कन्नौज जा चुकी थी। ह्वेनसांग की किताब कहती है कि पाटलिपुत्र का पुराना नगर वीरान हो गया। अशोक का ऐतिहासिक प्रासाद और सभागार खंडहरों के ढेर में तब्दील हो गए। बड़े पैमाने पर यहां कमरे या रहने की जगह का ना मिलना सवाल खड़े करता है मगर पुरातत्वविदों का कहना है कि मौर्य काल में रिहायशी महल बहुमंजिला और अधिकतर साल और शीशम की नक्काशीदार लकड़ी से बनते थे। पत्थर का इस्तेमाल मुख्य रूप से विशाल खंभों और सार्वजनिक स्मारकों में हुआ। आगजनी और गंगा- सोन की बाढ़ के कारण लकड़ी का पूरा रिहायशी ढांचा सदियों पहले नष्ट हो गया था।
उसी कुम्हरार परिसर में ऊपर की परतों से गुप्त काल का आरोग्य विहार और धन्वन्तरि नाम खुदा हुआ पात्र मिला जिसकी बात मैंने पिछली पोस्ट में की। इससे ये साबित हुआ कि भले अशोक का सभागार खत्म हो गया पर उस जगह के आसपास गतिविधियाँ होती रहीं।
एक दिलचस्प बात और। दिव्यावदान और अशोकावदान नाम के बौद्ध संस्कृत ग्रंथों में उल्लेख है कि अशोक ने अपने शासनकाल में यक्षों की मदद से पाटलिपुत्र में एक अद्भुत प्रासाद और 84,000 स्तूपों का निर्माण कराया था। यही लोक मान्यता फाहियान के कानों तक पहुंची और इसीलिए उसने अपनी किताब में कहा कि अशोक का ये सभागार देवदूतों ने बनाया, इंसानों के बस का नहीं था।
तस्वीर में खुदाई के दौरान निकला सभागार का खंडहर।
#इतिइतिहास















