मेघालय में पीर हजरत शाह कमाल बाबा की दरगाह को पीरस्थान के नाम से जाना जाता है, जो सदियों से सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक रही है
यह स्थल शाह कमाल और उनकी गारो पत्नी के अंतिम अवशेषों का समाधि स्थल है। पीरस्थान में मनकाचर की देवी कामाक्ष्य की मानी जाने वाली एक शिला भी मौजूद है
पोआ मक्का दरगाह: हाजो, कामरूप, असम
पीर ग़ियासुद्दीन औलिया से जुड़ा यह ऐतिहासिक तीर्थस्थल हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध धार्मिक विरासत वाले हाजो क्षेत्र में स्थित है।
यहाँ हिंदू और मुस्लिम श्रद्धालुओं एक साथ मिलकर उत्सव मनाते हैं
अजान पीर दरगाह:शिवसागर, असम
17वीं सदी के सूफ़ी संत अजान फ़क़ीर से जुड़ी यह दरगाह असम की साझा सांस्कृतिक विरासत की एक अहम मिसाल है।
अजान फ़क़ीर ने असमिया भाषा में आध्यात्मिक गीतों की परंपरा ज़िकिर को लोकप्रिय बनाया। वार्षिक उर्स में विभिन्न समुदायों के लोगों की भागीदारी होती है
बाबा बुदनगिरी दरगाह चिकमगलूर
बाबा बुदनगिरी की पहाड़ियों से जुड़ा यह धार्मिक स्थल सूफ़ी और हिंदू परंपराओं के ऐतिहासिक जुड़ाव के लिए जाना जाता है और ये साझा विरासत का ऐतिहासिक उदाहरण है
नागोर दरगाह — तमिलनाडु
हज़रत शाहुल हमीद की इस मशहूर दरगाह पर कंदूरी उत्सव में बड़ी तादाद में हिंदू और मुस्लिम श्रद्धालु शामिल होते हैं। यहाँ की साझा अकीदत और सदियों पुरानी रवायत दक्षिण भारत में मज़हबी हम-आहंगी की अहम मिसाल है।
बाराबंकी ज़िले के मशहूर सूफ़ी संत हाजी वारिस अली की दरगाह पर मनाई जाने वाली होली हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब और सांप्रदायिक सौहार्द की ख़ूबसूरत मिसाल पेश करती है। यहाँ मज़हब की दीवारें पीछे छूट जाती हैं और तमाम लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर मोहब्बत और इंसानियत का पैग़ाम देते हैं
हज़रत शेख़ अहमद सारंग रहमतुल्लाह अलैह (मजगवा बाराबंकी)
हज़रत भारतीय सूफ़ी परंपरा के महान संतों में से थे। आपने पूरी ज़िंदगी इबादत, इल्म और इंसानियत की ख़िदमत में गुज़ारी। उनका पैग़ाम मोहब्बत, अमन और इंसानी बराबरी पर आधारित था, जो आज भी समाज को राह दिखाता है।
बाराबंकी जिले में स्थित हाजी वारिस अली शाह की मजार पर खेला जाने वाला होली का त्योहार सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करता है. इस मजार में होली के दिन हर धर्म के लोग रंगों से सराबोर नजर आते हैं.
tv9hindi.com/state/uttar-pra…
रानी लक्ष्मीबाई की मुस्लिम महिला अंगरक्षक का नाम मुँदार खातून था। वह 1857 के विद्रोह के दौरान लक्ष्मीबाई की भरोसेमंद,वफादार साथी थीं। मुँदार को रानी की सेवा करने और झाँसी की घेराबंदी के दौरान ब्रिटिश सेना के खिलाफ झाँसी की रक्षा करने में उनकी बहादुरी और समर्पण के लिए जाना जाता था
You have to be careful who you take as a friend. Choose anybody you like, but make sure that you will be like him. So, before we choose a Shaykh, before we choose a friend, we should ask ourselves if we would love to be like them.
हजरत सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी या गाज़ी मियाँ (1014 - 1034) सुल्तान महमूद गजनवी के भांजे थे आपका मज़ार यूपी के बहराइच मे है।
एक रिवायत के मुताबिक आपकी मज़ार पर हज़रत खिजर की रेगुलर आमद होती रहती है
Ahmad-e-Noori Qadiri (Marehra Etah)
He was the last Qutub of Marehra dynasty became the Sajjadah Nasheen of Marehra Sharif after the demise of Shah Aal-e-Rasool Ahmadi. Hadrat Noori Miyan Saheb was born on 19th of Shawal 1255 hijri (corresponding to 26th December, 1839)
रसूल अल्लाह ﷺ ने फरमाया: कयामत के दिन मुझ से लोगो में सबसे ज्यादा करीब वो होगा, जो मुझ पर सबसे ज्यादा दरूद भेजेगा।
(जामे तिरमिजी हदीस 484)
A Moderate and Sufi Islam is the Only Way of Living for Muslims in Multicultural and Democratic Societies
usanasfoundation.com/a-moder…
The Dargāh of Bābā Ḥājī Ratan at Bhatinda
jstor.org/stable/20837077
The blessed resting place of Shaykh al-Akbar Muhyi al-Din ibn al-'Arabi رضي الله عنه in Damascus Syria.
रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:- "जो मुसलमान जुमा के दिन या जुमा की रात को मरता है अल्लाह उसे कब्र के फितने से महफूज़ रखता है।
(जामे तिरमिजी 1074)
Hazrat Pir Sadruddin Madari Dargah: A 700-year-old heritage shrine in the Western Ghats
telegraphindia.com/my-kolkat…
Dargah of Sayyad Nasir Hussain acting as a symbol of religious harmony
timesofindia.indiatimes.com/…














