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जब निर्णय सामूहिक रूप से लिया गया है, तो ज़िम्मेदारी व्यक्तिगत क्यों?
₹46,000 करोड़ के निवेश प्रोत्साहन कस्टमाइज़्ड पैकेज में से केवल ₹115 करोड़ के पैकेज पर ही कार्रवाई क्यों? संपूर्ण प्रस्तावों की निष्पक्ष और व्यापक जाँच क्यों नहीं होनी चाहिए?
IAS-IPS अधिकारियों के अचल संपत्ति विवरणों में विसंगतियाँ पाए जाने पर जाँच का आधार केवल व्यक्तिगत संवीक्षा (स्क्रूटनी) तक सीमित क्यों? सभी अधिकारियों के अचल संपत्ति विवरणों की व्यापक एवं समग्र जाँच क्यों नहीं ?
मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा की अध्यक्षता में, मुख्यमंत्री निवास पर बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट की 6वीं बैठक आयोजित हुई। इसमें मुख्यमंत्री ने राजस्थान में 46 हजार करोड़ रुपये के निवेश को प्रोत्साहन देने हेतु, विभिन्न सेक्टर की 10 अल्ट्रा मेगा परियोजनाओं को कस्टमाइज्ड पैकेज देने की मंजूरी दी। बैठक में स्वीकृत प्रस्तावों से प्रदेश में 12 हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा। मुख्यमंत्री ने सोलर मॉड्यूल एवं सैल मैन्युफैक्चरिंग तथा नवीकरणीय ऊर्जा, सीमेंट, माइंस और मिनरल्स, ऑटोमोबाइल, केमिकल, टेक्सटाइल एवं पर्यटन सेक्टर से संबंधित, अल्ट्रा मेगा परियोजनाओं को रिप्स के तहत कस्टमाइज्ड पैकेज की स्वीकृति प्रदान की।
#आपणो_अग्रणी_राजस्थान
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प्रदेश के मुख्यमंत्री के गृह जिले भरतपुर में आरएसएस के नजदीकी माने जाने वाले, पंजाब के राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया के करीबी तथा बयाना के पूर्व विधायक एवं भाजपा नेता श्री अंतर सिंह भड़ाना जी की निर्मम हत्या राजस्थान में जंगलराज होने का प्रमाण है | स्थानीय लोगों के अनुसार, राजस्थान सरकार के गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढ़म के कथित उकसावे के बाद पूर्व विधायक के साथ गंभीर मारपीट हुई, जिसमें उनकी जान चली गई। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और गंभीर मामला है। इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाना सरकार की जिम्मेदारी है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब विवाद की जानकारी पुलिस को पहले से थी और भरतपुर के पुलिस अधीक्षक ने भी मीडिया के समक्ष इसकी जानकारी होने की बात कही, तो समय रहते विवाद का समाधान क्यों नहीं करवाया गया ? यदि पुलिस ने समय रहते प्रभावी कार्रवाई की होती, तो शायद अंतर सिंह भड़ाना जी आज हमारे बीच होते। यह खुफिया तंत्र की विफलता के साथ-साथ पुलिस - प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
राजस्थान में कानून व्यवस्था लगातार सवालों के घेरे में है। सत्ता की नाकामी के चलते अफसरशाही हावी है और आमजन में असुरक्षा का माहौल है। हाल ही में जयपुर ग्रामीण क्षेत्र के एक पुलिस थाने में कथित तौर पर सत्ता की कमान संभालने वाले RSS के एक जिला प्रचारक के कपड़े उतरवाकर पुलिसकर्मियों द्वारा उसे पेशाब पिलाने व बेरहमी से मारपीट किए जाने का मामला भी सामने आया। ये घटनाएं प्रदेश की पुलिस व्यवस्था और शासन की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
मैं देश के गृह मंत्री श्री @AmitShah का ध्यान राजस्थान में उनके ही दल के एक नेता एवं पूर्व विधायक की निर्मम हत्या से जुड़े इस गंभीर प्रकरण की ओर आकर्षित करते हुए यह बताना चाहता हूँ कि पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल में आपके साथ जिन भाजपा नेताओं के फोन टेप किए जाने के आरोपों से जुड़े जिन पुलिस अधिकारियों पर सवाल उठे थे, उन्हें मुख्यमंत्री भजनलाल जी शर्मा की सरकार ने फिर से महत्वपूर्ण पदों पर तैनात कर रखा है |
मेरी मांग है कि अनुभवहीन भरतपुर रेंज आईजी एवं भरतपुर जिला पुलिस अधीक्षक को तत्काल पद से हटाया जाए, गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढ़म को पद से हटाकर उनके विरुद्ध लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच करवाई जाए,चूंकि स्थानीय लोगों द्वारा हत्या के आरोपियों और गृह राज्य मंत्री के बीच करीबी संबंध होने के संदर्भ में किए जा रहे दावों की भी स्वतंत्र रूप से जांच आवश्यक है इसलिए पुरे मामले की जांच सीबीआई को दी जाये |
दिवंगत पूर्व विधायक श्री अंतर सिंह भड़ाना जी मेरे भी अच्छे मित्र थे। उनके असामयिक निधन से मुझे व्यक्तिगत रूप से गहरा दु:ख पहुंचा है। मैं उन्हें पुनः श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं और शोकाकुल परिजनों के प्रति अपनी संवेदनाएं व्यक्त करता हूं।
@PMOIndia @BhajanlalBjp @RajCMO @PoliceRajasthan
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यार, यह तो प्रॉब्लम हो गई। मैंने तो कांग्रेस के बने हुए माहौल में कांग्रेस को हरवाने के लिए लोकसभा में भी रामचंद्र चौधरी, संगीता बेनीवाल, ताराचंद मीणा, दामोदर गुर्जर, वैभव गहलोत जैसे प्रत्याशी दिए थे, अपने मंत्रियों को बीजेपी में भेजा, मंत्रियों को बीजेपी से चुनाव लड़वाया, गुटबाजी फैलाई, खुलेआम कांग्रेस को हरवाने में लगाया फिर भी गोविंद सिंह डोटासरा ने रणनीति बनाकर एवं चुनावी माहौल बनाते हुए कांग्रेस कैडर को कांग्रेसी गमछे के नीचे एकजुट कर के 11 सीट जीत ली और अब शहरी चुनाव में भी बीजेपी की नाक में नकेल डाल कर बीजेपी के बड़े बड़े चाणक्यों की रणनीति फेल कर दी।
अब इस डोटासरा का करें तो क्या करें! कुछ तो करना पड़ेगा। चलो, ऐसा रायता फैलाएं कि प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा सहित जयपुर शहर कांग्रेस जिलाध्यक्ष शर्मा जी को कटघरे में खड़ा करके कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़े ताकि पंचायत चुनाव में बीजेपी की बुरी हार न हों और कांग्रेस प्रचंड जीत से दूर रहे! अगर प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा के नेतृत्व में कांग्रेस ने पंचायत चुनाव में क्लीन स्वीप कर लिया तो फिर दिल्ली वाले भी मेरी नहीं सुनेंगे।।
नोट: जहां जहां सचिन पायलट और गहलोत जी ने रैली की है, वहां कांग्रेस बुरी तरह हारी है, बाकी गहलोत जी अपने वार्ड सहित जोधपुर, जालोर में तो हारे ही हैं। यानि डोटासरा की कांग्रेस नेताओं को प्रचार से दूर रखने एवं चुनाव को स्थानीय स्तर पर लड़ने की रणनीति से कांग्रेस ने शानदार जीत दर्ज की है, अगर गहलोत - पायलट गुट अपने अपने वार्ड और जिलों में कांग्रेस को जीता देते तो कांग्रेस बीजेपी से शहरों में भी बराबरी की जगह पहली बार आगे रहती।
((मजबूत संगठन ✅✅
मजबूत क्षत्रप ❌❌))
BL संतोष RSS– 0
गोविंद डोटासरा कांग्रेस– 1
ये कौन BL संतोष जी हैं जो बीजेपी के बड़े चुनावी रणनीतिकार माने जाते हैं लेकिन राजस्थान में आते ही कांग्रेस अध्यक्ष डोटासरा की रणनीति के सामने धूल फांक रहे हैं।🤡🤡
10 में से 10 निगम जीतेंगे बोलकर मुख्यमंत्री और बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेलीकॉप्टर में टंगकर के पूरे 10 निगमों में वार्ड - वार्ड घूमे हैं, खुद छाणक्य अमित शाह जी प्रचार करने उतरे थे, उसके बाद भी 10 छोड़ो, 5 निगमों में भी बहुमत नहीं ला पाए हैं, वो भी तब जब वार्डो का परिसीमन इतने अलोकतांत्रिक तरीके से किया और फिर चुनाव जीतने के लिए प्रशासन को ही लगा दिया था।
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संगठन सृजन इसी को कहते हैं, एक तरफ राहुल गांधी जी की कांग्रेस पार्टी से गोविंद डोटासरा - टीकाराम जूली के नेतृत्व में बीजेपी को चुनाव करवाने और विधानसभा सत्र चलाने के लिए चैलेंज करते हैं
दूसरी तरफ मोदी के भजनलाल चुनाव और सत्र दोनों से भागते रहे हैं।
निकाय चुनाव में मिली हार के बाद पंचायती राज चुनाव प्रक्रिया को रोक दिया गया है, जो चुनाव 2 साल पहले होने चाहिए थे वो अब तक शुरू भी नहीं हुए हैं।
@TikaRamJullyINC @GovindDotasra
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अलवर की सीट निकल सकती थी!
ऐसे ही राजस्थान की 5 अन्य सीटों पर कांग्रेस को जीत मिल सकती थी लेकिन विश्वास सामंजस्य और गुटबाजी के चलते 25 में से 16-17 की जगह 11 सीट पर ही संतुष्ट होना पड़ा।
जब भंवर जितेन्द्र सिंह ने “शाह”से पंजा लड़ाया !
लोक सभा चुनाव की पूर्व संध्या पर कांग्रेस के बड़े बड़े दिग्गजों को पिछले दो चुनावों के आंकड़े डरा रहे थे जहाँ कांग्रेस खाता नहीं खोल पा रही थी और बड़े दिग्गज राजस्थान में इस चुनाव में उतरने से कतरा रहे थे।
फूल बाग़ पैलेस में बैठा एक अधेड़ उम्र का दूरदर्शी शांत स्वभाव का राजनेता जो अपने आला कमान का सच्चा सिपाही है वह एक पिंजरा बुन रहा था और शिकार करने की फ़िराक़ में था BJP के सबसे बड़े चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह के ख़ास सिपहसालार का।
खुद के विश्वास और आँकडों के बलबूते बुने गए जाल के दावों की टेस्टिंग कराने अपने प्यादे ललित यादव को लेकर इस बडी मछली के फंसाने के दावे की रूपरेखा प्रस्तुत करने दिल्ली दिल्ली पहुंचा था अलवर में राजा साहब माने जाने वाला यह शख्स।
अपने आंकडों पर राहुल गांधी की मोहर लगवा लौटा यह राजा बडा दाँव चलने निकला था लेकिन उसके पास कमी थी तो लड़ने वाले उन सिपाहियों की जो पिछले दो युद्धों में खप गये थे लेकिन लड़ना तो था आखिर किले पर कब्जा बारंबार यदुवंशियों द्वारा किये जा रहे थे और राजा असहाय देखने के सिवा कुछ कर नहीं पा रहा था।
राजा का यह सिपाही पूरी तरह फूलबाग पैलेस में बुना गया था और यदुवंशियों के सामने राजा साहब ने अपने छोटे लेकिन उसी तुणीर के मारक हथियार का इस्तेमाल करने का फैसला किया जिसके बाण खुद भूपेन्द्र यादव थे।
यह बात मगर राजा साहब के अतिरिक्त कोई नहीं समझ पा रहा था कि यह प्रतिद्वन्द्वी राजस्थान का सबसे बडा और घातक चोट करने जा रहा था गुजराती किले पर लेकिन अफसोस कि राजा यह बात ना दिल्ली दरबार को समझा पाया ना जयपुर से अमीशन की उतनी तादाद इकट्ठा कर पाया जो अन्य सीटों पर मदद स्वरूप मुहैया करायी जा रही थी।
राजा की आंखों में नींद नहीं थी नामुमकिन ही सही लेकिन राजा को एक हल्की जीत की खुशबू आने लगी थी लेकिन वह जानता था उसका पंजा शाह के पंजे से टकरा रहा था और वह उसकी ताकत से वाकिफ था।
राजा का यह प्यादा अपनी सीमित शक्ति से अकेला जूझ रहा था जहां उसे सबसे ज्यादा जिस शाहपुरा के सामंत से उम्मीद थी वह भी अंत समय में इस आहट को भांप गया कि यह जीत प्यादे को समाज का सबसे बडा प्रादेशिक क्षत्रप बना देगी इसलिए रणनीतिक बुद्धिमता का परिचय दे अपने पैर युद्ध से खींच लिये।
राजा साहब का यह प्यादा युद्ध के अंतिम क्षणों में खेत आया और राजा साहब गुजराती पंजे से निर्णायक युद्ध में परास्त हुए लेकिन उसने शाह की सेना में जो खलबली मचाई है उसने अंदर तक शाह के सिपहसलार को हिला दिया है और अलग रण की तैयारी में सीमाओं को अपने हिसाब से खिंचवा रहा है।
@JitendraSAlwar @lalityadavinc @INCRajasthan @INCIndia @TikaRamJullyINC @GovindDotasra
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Fraands, नई वाली संसद देख लो 👇
इसे नरेंद्र मोदी की सरकार ने करोड़ों रुपए फूंककर बनाया है।
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देश में सरकारी कंपनियों के हालात देखिए 👇
आज सरकारी कंपनियों में 49% कर्मचारी ठेके पर हैं।
चौंकाने वाली बात है कि पिछले 10 साल में इन आंकड़ों में 30% से ज्यादा की वृद्धि हुई है।
यानी- मोदी सरकार सरकारी कंपनियों को ठेके पर चलवा रही है और जानबूझकर खाली पदों को नहीं भर रही है।
इतना ही नहीं, वक्त-वक्त पर सरकारी कंपनियों को बेचा जा रहा है और लोगों को नौकरी देने के बजाए, सरकार उन्हें बेरोजगार बना रही है।
साफ है कि नरेंद्र मोदी बने-बनाए सिस्टम को तबाह करने पर तुले हैं।
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पेपर माफियाओं के सरगना, शिक्षा - स्वास्थ्य विभाग को बर्बाद करने वाले धनकुबेरों की कठपुतली अशोक गहलोत जी ये बातें सुन रहे होंगे?
पिछले 30 साल से अशोक गहलोत कितने छात्रों की बद्दुआ लेते रहे हैं और फिर भी आज तक पेपर लीक माफियाओं को सह देने, RPSC को भ्रष्टाचार का अड्डा बनाने, संविदा कर्मचारी सिस्टम से राजनेताओं की सिफारिश से भर्ती कर युवाओं का गला घोंटने, टीचर ट्रांसफर में सिफारिश नियम से भ्रष्टाचार का अड्डा बनाने जैसे कामों के लिए शर्मिंदा महसूस करने और माफी मांगने से घबरा रहे हैं और मीडिया के सहारे दूसरे नेताओं को आरोपी दिखाने से ही बाज नहीं आ रहे हैं।
2023 चुनाव से ठीक पहले सब जानते हुए केसरी सिंह को RPSC सदस्य बनाना हो या कुमार विश्वास की पत्नी मंजू सैनी को RPSC सदस्य बनाना हो... ये तो जनता के सामने आ चुके छोटे मोटे निर्णय है...!!
असल में तो अशोक गहलोत जी ने जब जब कांग्रेस की सरकार आई है, कांग्रेस को गर्त में भेजने के लिए 5 साल जमकर कांग्रेस विरोधी निर्णय लिए थे!!
खुद को गरीबों का गणेश बताने वाले अशोक गहलोत द्वारा 1998-2003 कार्यकाल में धनकुबेरों की कठपुतली बनकर पूरे देश में सरकारी स्वास्थ्य विभाग को बर्बाद कर प्राइवेट हॉस्पिटल के लिए जगह बनाने की साजिश वाली डील जब सामने आएगी तो गरीब इन्हें दुआओं की जगह क्या देंगे वो वही जानें!!
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कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का अजमेर दौरा।
पंचायत और निकाय चुनाव की तैयारी में जुटी राजस्थान कांग्रेस।
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मदद 🙏🏻
एम्स जोधपुर में छोटी बच्ची के लिए लाइव ब्लड की आवश्यकता है ब्लड ग्रुप कोई सा भी हो 🙏🏻
अटेंडर नंबर
7425004976
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आदरणीय बड़े भाई साहब @DrVikasAjmer जी
ये नाम आपने लिखे हैं कि
PWD के अतिरिक्त मुख्य सचिव श्री प्रवीण गुप्ता IAS, मुख्य अभियंता (सड़क) श्री मुकेश भाटी, श्री अशोक कुमार सिंघल, श्री सुनील कुमार शर्मा सहित विभाग के आला अधिकारी उपस्थित रहे।
इन सभी नामों में ओबीसी एससी एसटी का एक भी नाम क्यों नहीं है ! ये आपने कभी ध्यान दिया ?
इस PWD विभाग में ओबीसी का रोस्टर रजिस्टर आज तक नही बना है जिस कारण से ओबीसी को 21% आरक्षण की जगह 10% से ज़्यादा आरक्षण नहीं मिला है !
ये प्रदेश की 55% जनसंख्या के हक का सवाल आप नही पूछेंगे तो कौन पूछेगा जी ?
बात कड़वी है पर आप भी राजनीतिक रूप से ओबीसी कोटे में ही आते हो चाहिए सरकारी नौकरी वाले कोटे में मत आओ !
हम आपसे उम्मीद करते है इसलिए लिख रहे हैं कि आप ओबीसी के युवाओं की आवाज बुलंद करो !
धन्यवाद जी उम्मीद है आगे आप ओबीसी आरक्षण व योजनाओं की लड़ाई मज़बूती से उठाएँगे !
@INCRajasthan @1K_Nazar @RahulGandhi @DrJaihind @INCOBCDept @INCIndia @GovindDotasra @TikaRamJullyINC @Khalbaali @POOJA_VOF @8PMnoCM
आज राजस्थान विधानसभा में अन्य पिछड़ा वर्ग कल्याण समिति द्वारा परीक्षणात्मक बैठक का आयोजन किया गया
सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) के उच्चस्तरीय अधिकारियों से विभाग से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत कर इसके शीघ्र समाधान हेतु सार्थक निर्णय लेने के समिति द्वारा निर्देश दिए गए। इस दौरान किशनगढ़ में क्षतिग्रस्त सड़कों एवं व्याप्त अनियमित्ताओं के बारे में विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को अवगत कराया।
इस बैठक की अध्यक्षता कमेटी के सभापति तारानगर विधायक श्री नरेंद्र बुड़ानिया जी ने की। इस अवसर पर साथी विधायक हरलाल सारण जी, भैराराम सियोल जी, दीपचंद खेरिया जी, ललित यादव जी, सुरेश गुर्जर जी, उदयलाल जी उपस्थित रहे।
PWD के अतिरिक्त मुख्य सचिव श्री प्रवीण गुप्ता IAS, मुख्य अभियंता (सड़क) श्री मुकेश भाटी, श्री अशोक कुमार सिंघल, श्री सुनील कुमार शर्मा सहित विभाग के आला अधिकारी उपस्थित रहे।
#OBC #RajasthanVidhanSabha #ajmer
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पहचान आपकी, गिनती उनकी, और मलाई ब्राह्मणों की— OBC का यह भ्रम कब टूटेगा?
जातिगत जनगणना से ठीक पहले एक गहरी रणनीति चल रही है और इसकी पृष्ठभूमि काफी सालों से चल रही है। ओबीसी वर्ग की कई जातियों जैसे—स्वामी/वैष्णव, जांगिड़ (विश्वकर्मा ब्राह्मण), कुम्हार (प्रजापति ब्राह्मण) आदि को 'ब्राह्मण' होने का भ्रम दिया जा रहा है, ताकि जातिगत जनगणना में ब्राह्मण आबादी का आंकड़ा कागजों पर बड़ा दिखे और राजनीतिक-प्रशासनिक हिस्सेदारी में उनका वर्चस्व बढ़ाया जा सके।
लेकिन इस खेल का कड़वा सच जानिए:
🔹 राजनीतिक धोखा: आपकी संख्या जोड़कर ब्राह्मण अपनी दावेदारी से पार्टी टिकट तो तय करा लेंगे, लेकिन क्या किसी भी सीट पर इस ओबीसी वर्ग को 'ब्राह्मण कोटे' से टिकट मिलेगा? कभी नहीं क्योंकि सामाजिक स्तर पर आपको ब्राह्मण नहीं, अपनी जाति से ही पहचान दी जाएगी।
🔹 प्रशासनिक और आरक्षण का नुकसान: अगर जनगणना में आपने खुद को 'ब्राह्मण' लिखवा दिया, तो न आपको EWS का लाभ मिलेगा और न ही ओबीसी कोटे में सही गिनती हो पाएगी। इससे ओबीसी आरक्षण बढ़ाकर उसमें अति-पिछड़ी जातियों को अलग से कोटा (Sub-categorization) देने का रास्ता भी बंद हो जाएगा क्योंकि आपके कागज तो ओबीसी के रहेंगे लेकिन आरक्षण और हिस्सेदारी तय करने का आधार "जातिगत जनगणना" ही रहेगा जिसमें आप ने खुद को ब्राह्मण लिखवा दिया है।
🔹 इस्तेमाल की राजनीति: जिस तरह शहरी वर्ग के आस पास रहने वाले वाल्मीकि समाज को सालों तक अन्य दलित समाज से अलग होने की भावना देकर आरक्षण विरोधी बनाया, दलित हकों के खिलाफ खड़ा कर दलितों को बांटा, धार्मिक दंगों में शहरों के वाल्मीकि समाज को आगे कर दिया जाता रहा, ठीक उसी तरह राजनीति में इस ओबीसी वर्ग को इस्तेमाल करने की तैयारी है। आपको अपने ही ओबीसी से ही लड़वाया जाएगा, आरक्षण विरोधी बनाया जाएगा लेकिन राजनीतिक मलाई सिर्फ ब्राह्मण खाएंगे जिसमें सब से बड़ा हिस्सा आपका ही होगा।
🔹 सामाजिक बराबरी का भ्रम: इस ओबीसी वर्ग को सामाजिक स्तर पर भी ब्राह्मणों में कोई बराबरी या सामाजिक संबंध नहीं मिलने वाले, बस जनगणना में संख्या बढ़ाने का माध्यम बनाया जा रहा है।
अपनी वास्तविक संवैधानिक और सामाजिक पहचान (OBC) से समझौता मत कीजिए। जनगणना में अपनी सही जाति और वर्ग दर्ज कराएं और अपने हक-अधिकारों की रक्षा करें!
– @Khalbaali
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मदद 🙏
जेएलएन हॉस्पिटल,अजमेर
ब्लड ग्रुप O-ve अटेंडर सुनील 7665248262
@GodaraSatya @AnjuJhang @ShubhamRewar4U @AnilchoudharyR1 @OmprakashRLP @JATbera1 @rb_jaat @seemabadiyasar @Decentladki1 @Sunil93Gora @shekharcanada @DevrajHooda_ @deepakjat5 @Ramududi07 @Dadarwal7 @ErSunilGugarwal @TheSubhashFouji @Divi05_ @Siya7232 @SanjuGoyel @manphoolsaran7 @SanjuGoyel @sanjubabarj21 @FageriaRanveer @GOGARAMSAHARAN @LaduGodara3 @HansrajGurjarR @HANUMANKISAN @hirenchoudharys @Parihar_India @LBS_IND21 @IshwarSingRawat @sumer_singh_iyc @OmBaytu @Bhagirathmahia @Kushalburdak @Lrsaran8 @Mukeshbaitu @NFUofficial1 @Omrlp07 @madhu_quen @tr_subhash_seju @VikashPachar_ @POOJA_VOF @janak_jakhar
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क्या इसलिए ही ऐसे नेताओं को जनता द्वारा RSS - शहरी वर्ग की कठपुतली राजनेता कहकर के ठुकराया जाता रहा है?
राजस्थान में निकाय और पंचायत चुनाव से पहले ओबीसी आयोग की रिपोर्ट आई है, जिसके बाद इन दोनों नेताओं की खामोशी ऐसे छाई हुई दिख रही है जैसे ये किसी सवर्ण जाति से आते हों जो जाति एकदम पूरी तरह से शहरी हो।
आज चुप्पी साधे हुए ये दोनों नेता पिछले साल ही कांग्रेस में ओबीसी का राष्ट्रीय चेहरा बनने के लिए जी जान से दौड़ भाग कर रहे थे, यानि ओबीसी के नाम से पद चाहिए लेकिन ओबीसी के हक की बात तक नहीं करनी है।
– इन दोनों नेताओं को कभी भी राजस्थान में ओबीसी वर्ग के साथ हो रहे कुठाराघात के लिए बोलते हुए नहीं सुना है, ओबीसी को उसके हिस्से का पूरा 21% आरक्षण भी नहीं मिल रहा है, कभी 5% तो कभी 14% मिल रहा है।
– पिछले 27 साल में अशोक गहलोत 15 साल मुख्यमंत्री रहे हैं, सचिन पायलट केंद्रीय मंत्री, उपमुख्यमंत्री रहे हैं उसके बावजूद ओबीसी वर्ग के लिए ऐसे हालात है, सबसे बड़ी विडंबना ये है कि ये दोनों नेता अब भी मुंह नहीं खोल रहे हैं जब आयोग की आ चुकी है।
– पिछले कार्यकाल में जब राहुल गांधी जातिगत जनगणना की मांग कर रहे थे तब अशोक गहलोत ने राजस्थान में जातिगत जनगणना तक नहीं करवाई थी और अपनी नई पार्टी बनाने के लिए सड़कों पर भटकने वाले सचिन पायलट ने एकबार भी जातिगत जनगणना, ओबीसी वर्ग युवाओं के साथ हो रहे अन्याय के लिए आवाज नहीं उठाई थी।
क्या इसलिए ही ऐसे नेताओं को RSS - शहरी वर्ग की कठपुतली राजनेता कहा जाता रहा है?
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मंत्री जी जनता से मिलने से ही कतरा रहे हैं लेकिन मंत्री जी के पास पार्टी अटेंड करने के लिए पूरा वक्त है🔥😃
मंत्री जी की विधानसभा के लोग मंत्री जी को ढूंढ रहे हैं मिलने के लिए,,,, मंत्री जी की विधानसभा में सड़कों पर नाव चल रही है ,,,, हर 100 मीटर पर एक झील बन गयी है!
जनता ना पैदल निकल पा रही है ना वाहनों से,,🔔✌️
भाजपा महिला मोर्चा, राजस्थान की प्रदेशाध्यक्ष डॉ. @RakheeRathore_ जी एवं उनके परिवार से भेंट कर उन्हें जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।
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आज @DainikBhaskar अखबार में पत्रकार श्री @MinhazMerchant का श्री @RahulGandhi के ऊपर आलेख पढ़ा। इस पर मेरी तरफ से जवाबी आलेख:
सकारात्मकता की नसीहत सिर्फ विपक्ष के लिए क्यों?
मिन्हाज मर्चेंट जी ने अपने आलेख में श्री राहुल गांधी को यह सीख दी है कि स्वस्थ राजनीति वही है जिसमें सकारात्मकता पर फोकस हो, और विपक्ष को उपलब्धियों का भी जिक्र करना चाहिए। यह सलाह सुनने में भली लगती है, लेकिन इसे तराजू पर तौलने से पहले कुछ सवाल जरूरी हैं जिनका जवाब लेख में कहीं नहीं मिलता।
इसरो की उपलब्धि किसकी विरासत है?
लेख में इसरो, चंद्रयान मिशन और स्काईरूट के वाणिज्यिक रॉकेट प्रक्षेपण की तारीफ की गई है, और कहा गया है कि विपक्ष इसका जिक्र नहीं करता। लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी ने खुद कभी अपने भाषणों में यह स्वीकार किया कि इसरो की नींव पंडित नेहरू के दौर में डॉ. विक्रम साराभाई के साथ मिलकर रखी गई थी, और इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भारत का पहला उपग्रह आर्यभट्ट प्रक्षेपित हुआ था। दशकों की निरंतर वैज्ञानिक नीति और निवेश का परिणाम आज दिखता है, यह किसी एक सरकार के पांच-दस साल की देन नहीं। जो सिद्धांत विपक्ष पर लागू होता है, वही सत्तापक्ष पर भी लागू होना चाहिए, अगर सकारात्मकता की बात है तो पूर्ववर्तियों का श्रेय स्वीकारना भी उसी सकारात्मकता का हिस्सा है।
क्या सरकार वाकई प्रदर्शनों की बात सुनती है?
लेख में यह दावा किया गया है कि सरकार आंदोलनों के दबाव में पीछे हट जाती है और आंदोलनकारियों को संतुष्ट करने का रास्ता अपनाती है। शाहीन बाग आंदोलन का हवाला दिया गया है। लेकिन इतिहास इससे थोड़ा अलग कहानी बताता है। शाहीन बाग प्रदर्शन के दौरान ही केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने जनवरी 2020 में एक चुनावी रैली में मंच से भीड़ से "देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को" का नारा लगवाया था, जिसकी व्यापक निंदा हुई। इसके अगले दिन तत्कालीन सांसद परवेश वर्मा ने यह चेतावनी दी थी कि अगर प्रदर्शनकारियों को नहीं रोका गया तो वे घरों में घुसकर लोगों के साथ अपराध करेंगे। यह प्रदर्शन बातचीत या समाधान से नहीं, बल्कि कोविड-19 महामारी के कारण लागू हुए लॉकडाउन से समाप्त हुआ। यह सरकार का "पीछे हटना" नहीं, परिस्थितिजन्य अंत था।
किसान आंदोलन के दौरान भी भाषा का स्तर देखने लायक था। प्रदर्शनकारी किसानों को खालिस्तानी और आंदोलनजीवी जैसे शब्दों से संबोधित किया गया। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने फरवरी 2021 में संसद में किसान आंदोलन के संदर्भ में "आंदोलनजीवी" शब्द का प्रयोग किया था, जिस पर संयुक्त किसान मोर्चा ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। तीन कृषि कानून आखिरकार वापस लिए गए, लेकिन इससे पहले किसानों को महीनों दिल्ली की सीमाओं पर सर्दी, बारिश में बैठना पड़ा और सैकड़ों किसानों की मृत्यु हुई। यह "आंदोलनकारियों को संतुष्ट करने की सरकारी नीति" कम, और जनदबाव के आगे झुकने की मजबूरी ज्यादा लगती है।
सवाल पूछना आसान किससे है?
राहुल गांधी से सवाल करना आसान है क्योंकि वे नियमित रूप से प्रेस के सामने आते हैं, पत्रकारों के सवालों का सामना करते हैं, और अपनी बात रखते हैं। यही सुविधा वे स्वयं सत्तापक्ष के नेताओं को भी उपलब्ध कराते हैं। दूसरी तरफ, प्रधानमंत्री मोदी ने अपने अब तक के कार्यकाल में एक भी खुली, बिना स्क्रिप्ट वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है जिसमें पत्रकार सीधे सवाल पूछ सकें और जवाब मिले। जब जवाबदेही और पारदर्शिता की बात आती है, तो यह असंतुलन नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जो नेता सार्वजनिक रूप से सुलभ है, प्रश्नों का सामना करता है, उसकी आलोचना करना स्वाभाविक रूप से आसान होगा, जबकि जो नेता प्रश्नों से दूरी बनाए रखता है, उस पर टिप्पणी करने से बचना पत्रकारिता के तटस्थ मापदंड पर सवाल खड़े करता है।
सुझाव कब सुने जाते हैं?
विपक्ष से यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्या सरकार ने कभी उसके सुझावों को समय रहते तवज्जो दी। जीएसटी इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। राहुल गांधी ने 18 अक्टूबर 2016 को ही यह सुझाव दिया था कि जीएसटी की दर 18 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह एक अप्रत्यक्ष कर है जो अमीर और गरीब दोनों को समान रूप से प्रभावित करता है। 2017 में जब चार स्लैब वाला जीएसटी लागू हुआ, तो उन्होंने इसे "गब्बर सिंह टैक्स" कहकर आलोचना की और एक सरल, कम दर वाले जीएसटी की मांग दोहराई। करीब आठ-नौ साल बाद, सितंबर 2025 में सरकार ने जीएसटी स्लैब घटाकर आम लोगों को राहत देने वाला सुधार किया, जिसे "जीएसटी 2.0" के नाम से बड़े प्रचार के साथ उपलब्धि के रूप में पेश किया गया। सवाल यह है कि अगर यही सुझाव 2016-17 में ही स्वीकार कर लिया गया होता, तो आम आदमी, छोटे व्यापारी और मध्यम वर्ग को कितने वर्षों की महंगाई और जटिल कर व्यवस्था से राहत मिल जाती। जो सुझाव विपक्ष से आया तब उसे नकारा गया, वही सुझाव जब आठ साल बाद सरकार ने अपनाया तो उसे अपनी उपलब्धि बताया गया। यह पैटर्न नोटबंदी और कोविड प्रबंधन जैसे अन्य विषयों पर भी दोहराया गया है, जहां समय रहते दिए गए सुझावों और चेतावनियों को नजरअंदाज करने का खामियाजा आम जनता ने भुगता। सकारात्मकता की दुहाई देने से पहले यह भी देखा जाना चाहिए कि सुझावों को उनकी उपयोगिता पर परखा जाता है या उनके स्रोत पर।
विपक्ष का संवैधानिक कर्तव्य सरकार से सवाल पूछना है, यह लोकतंत्र की बुनियाद है, न कि कोई विसंगति। सकारात्मकता की नसीहत तभी संतुलित मानी जाएगी जब वह सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों पर समान रूप से लागू हो, जब उपलब्धियों का श्रेय उन सभी सरकारों को दिया जाए जिन्होंने उस नींव में योगदान किया, और जब जवाबदेही केवल विपक्ष से नहीं बल्कि सत्ता में बैठे लोगों से भी मांगी जाए। स्वस्थ राजनीति सिर्फ प्रशंसा की भाषा नहीं होती, वह तथ्यों और समान मापदंडों की भाषा होती है।
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क्या ओबीसी वर्ग इन बच्चों से प्रेरणा लेकर अपने हक अधिकार और सम्मान की लड़ाई लड़ेगा, मांग रखेगा या अशोक गहलोत जी की तरह सवर्ण लॉबी का कठपुतली बना रहेगा?
ये बच्चे अपने हक, सम्मान और अधिकारों के लिए इतने सजग हैं, इसी सजगता के चलते कल राजस्थान की जनता की आवाज एवं नेता विपक्ष टीकाराम जूली इनसे मिलने पहुंचे, इनकी समस्या सुनी और विधानसभा सत्र में इनकी मांगो एवं समस्या को सरकार के समक्ष रखना का भरोसा दिया।
उधर जूली के बाद अशोक गहलोत भी इन बच्चों से मिलने पहुंचे, मांगी सुनी ( चाहे इनपर अपना PR करने पहुंचे वाले आरोप लगें लेकिन पहुंच कर इनकी आवाज को सहारा देना बड़ी बात है )
वहीं एक OBC जैसा बहुत बड़ा वर्ग है जो अपना हक, सम्मान, संस्थानों में हिस्सेदारी सब कुछ भूलकर या यूं कहें कि धर्म की राजनीति या धर्म के ठेकेदारों के यहां गिरवी रखकर शांत चुप बैठा है या अपने ही ओबीसी वर्ग से कुंठा बना रहा है जो उन्हें ऊपर से परोसी जा रही है।
इसी राजस्थान में ओबीसी वर्ग को 21% की जगह सिर्फ 14% तो कभी 16% आरक्षण मिल रहा है, बेरोजगार बच्चे हर भर्ती में अपनी ओबीसी की सीटें कम देखकर आवाज उठाते हैं लेकिन उनकी ये आवाज हर बार दबकर रह जाती है।
ये वही अशोक गहलोत है जो खुद ओबीसी वर्ग से आते हैं, ओबीसी वर्ग के नाम पर मुख्यमंत्री बनते रहे हैं और इन्हीं की सरकार में कांग्रेस के ओबीसी मंत्री, विधायक, छात्र, ओबीसी संगठन सड़कों पर महीनों तक रहे थे लेकिन ओबीसी से आने वाले मुख्यमंत्री गहलोत के कान में जूं नहीं रेंगी, और ओबीसी आरक्षण में ऐसे ही कुठाराघात होता रहा।
और उसी कार्यकाल में ही मुख्यमंत्री रहते हुए गहलोत ने EWS सरलीकरण के लिए बिना किसी सवर्ण आंदोलन के ही सारी शर्तें हटाकर दी जैसे सवर्ण बहुत पिछड़े हो, उनकी भागीदारी संस्थानों में उनकी संख्या से बहुत कम हो, या सवर्ण एकतरफा कांग्रेस को वोट देकर जीताते हों जिनके वोट बैंक के दबाव में अशोक गहलोत जी ने अपने ही ओबीसी वर्ग को नकार कर सवर्ण लॉबी को इतनी ज्यादा तरजीह दी।
जब ओबीसी से आने वाले 3-3 बार के मुख्यमंत्री ही इस तरह से सवर्ण लॉबी के कठपुतली बनकर राजनीति करते हुए अपने कार्यकाल में ही ओबीसी के हकों पर कुठाराघात करें तो ओबीसी जनता को फिर क्या ही कहना कि आप अपने हक, सम्मान की लड़ाई क्यों नहीं लड़ते।
वैसे बता दूं इसी महीने राजस्थान सरकार बिजली विभाग द्वारा जारी LDC भर्ती के 765 पदों में से OBC के 2 पद है।
@ashokgehlot51 @Barmer_Harish @GovindDotasra @SachinPilot @INCRajasthan















































