Atul Kumar Rai retweeted
एक बार फिर साहित्यिक उपलब्धियों के पटल पर जुलाई सितंबर 2026 की कथा श्रेणी की सूची में महामना के बगिया के लाल अनुज @AuthorAtul एवं आदरणीय गुरुजी @manojrajant जी की कृतियों ने विशेष स्थान बनाया है।
यह केवल पुस्तकों की सूची में स्थान पाने की उपलब्धि नहीं, बल्कि सृजनशीलता, साहित्यिक साधना और पाठकों से बने आत्मीय जुड़ाव का परिचायक है।
शब्द जब अनुभवों से समृद्ध होते हैं और लेखनी जब संवेदना को स्वर देती है, तब साहित्य अपनी अलग पहचान स्वयं गढ़ता है।
अनुज अतुल राय एवं आदरणीय गुरुजी मनोज राजन त्रिपाठी जी को इस उल्लेखनीय साहित्यिक उपलब्धि के लिए हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ।
साहित्य की यह यात्रा निरंतर नए शिखर छुए और आपकी लेखनी पाठकों के हृदय में अपनी जगह बनाती रहे। हर हर महादेव, जय हो महामना।
@ramakroy
देश की पहली मेट्रो ट्रेन 1984 में ही कोलकाता आ गई थी. लेकिन बाद में कोई खासा विकास नहीं हो सका. फिर 2002 में ई श्रीधरन साहब दिल्ली मेट्रो के साथ आए उसके बाद इतिहास रच दिया. आज भारत के पास चीन और अमेरिका के बाद तीसरा सबसे बड़ा मेट्रो नेटवर्क है..ऊपर से हज़ार किलोमीटर अभी भी निर्माणाधीन है.
आने वाले दस-पंद्रह सालों में यही स्पीड बुलेट ट्रेन के साथ भी होने वाली है.. इसलिए अभी हमारे शहर में बुलेट क्यों नहीं आई का रोना न रोएँ..हमारे देश का महान सिस्टम चीन और जापान की तरह काम नहीं करता.. यहाँ कोई भी नई चीज आने और देश की कार्यसंस्कृति में शामिल हो जाने में थोड़ा वक़्त लगता है. इसलिए अभी irctc का कैप्चा भरें और ये सोचें की बुलेट ट्रेन से तीन घंटा पहले पहुँचकर आप क्या करेंगे. 😌 #indianrailway
भारत से गरीबी चली गई उसके लिए वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट पढ़ने की जरूरत नहीं है. बीस-पच्चीस साल पहले के किसी गांव का दृश्य उठाइये और आज उसी गाँव को देखिए. आपको सड़क से ही समृद्धि नज़र आने लगेगी. आज हरिजन बस्ती में भी SUV खड़ी मिल जाएगी और वहाँ भी चार मंजिला चमचमाता घर दिख जाएगा. हर जाति के टोले में दो-चार बड़े मकान बनते दिखाई देने लगेंगे. हर जाति का एक नवधनाढ्य आइकान मिल जाएगा.आज ग़रीब वही है जो या तो एकदम आलसी और निकम्मा है, नहीं तो फिर बुद्धि को आलमारी में रखके भाग्य और सरकार के भरोसे बैठा है.
हनुमान अंश कोई बहुत अद्भुत फ़िल्म नहीं थी. फ़िल्म मेकिंग के स्तर पर उसमें पचास कमियाँ थी. बावजूद इसके उस फ़िल्म में फ़िल्म बनाने वालों की ईमानदारी और मेहनत साफ़-साफ़ दिखाई दे रही थी. संगीत इतना सुंदर था कि उसने सारी कमियों को ढँक दिया. आम जनता ही उस फ़िल्म का प्रचार करने लगी, और लोग देखने के लिए टूट पड़े.
वही आम जनता अगर आज #Ramayan के संगीत और फ़िल्म की आलोचना कर रही है या उम्मीद से कमतर बता रही है तो मेकर्स को बुरा नही मानना चाहिए. कोई भी निगेटिविटी अपने आप नहीं फैलती..कुछ तो कारण गहरे होते हैं.. आपको ये भी समझना चाहिए कि आज जो अच्छा है, उसे अच्छा कहलवाने के लिए पेड पीआर कैंपेन की कोई जरूरत नहीं है. बस अच्छा काम करने की जरूरत है. जनता स्वयं उसका प्रचार कर देती है..
अब देखिए, इन दिनों पाकिस्तान के दो युवा इंस्टाग्राम पर गिटार लेकर कुछ पंजाबी फोक गाना गाते हैं… “राता लंबियाँ कालियाँ दी सम्मिये.. “और हिंदुस्तान की पागल जनता एक शब्द का अर्थ न समझने के बावजूद उनको इतना प्रेम भेज देती है कि उनको भी आश्चर्य होता है.
कभी जाकर उनकी रील्स पर कमेंट पढ़िए तो पता चलेगा कि अच्छे संगीत की ताकत क्या है. अच्छा संगीत कान में जाते ही सारी निगेटिविटी खत्म कर देता है.
लेकिन आज एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के साथ दिक्कत है कि वो आलोचना को पीआर के सहारे ढँकना चाहती है, काम अच्छा हो या न हो पीआर एकदम टॉप क्लॉस का होना चाहिए. और सारा बेड़ा गर्क इसी से हुआ है. 😌
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Unfortunately, as you get older, you gradually become less interested in new music and keep going back to the old favorite songs you once loved.
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Replying to @AuthorAtul
रचनात्मकता एक बहाव है। कविता, कहानी, संवाद, गीत, संगीत आदि से यदि बहाव हटा कर, कीवर्ड स्टफिंग करा दिया जाए, ट्रेंड्स को ठूँसा जाए, तो वह एक असेम्बल्ड प्रोडक्ट हो जाता है। ध्वनि होगी, आत्मा नहीं। ‘मंगल रंग’ ऐसा सुनाई पड़ता है मानो वह श्रद्धा का गीत न हो कर, कवि की विद्वता और तत्सम शब्दावली के ज्ञान का गीत हो।
बहाव को डेडलाइन से बाँधने पर आधार में गाद ही जमेगी।
समाज वरिष्ठ प्रेमियों को लेकर बहुत असहिष्णु है. मैं श्रद्धा जी के वरिष्ठ प्रेमी किसान पुत्र जी की बातों का सम्मान करते हुए ऐसी खोजी पत्रकारिता को नमन करता हूँ. पत्रकार महोदय से निवेदन है कि कुछ ब्रो और ड्यूड टाइप के नवीनतम प्रेमी का भी इंटरव्यू लें ताकि समाज प्रेमियों के समस्त संस्करण से परिचित हो सके. 😌🙏
कई बार अच्छे गाने पेशाब करते और नहाते हुए भी बन जाते हैं. कई बार महीनों जूझने के बाद भी एक अच्छी धुन या लाइन बाहर नहीं निकलती है. ऊपर से समूचा सिनेमा और संगीत जगत डेडलाइन की मार से जूझ रहा है. मर या जीकर आपको टाइम से काम करना पड़ता है.
एक बड़े प्रोजेक्ट में कुछ क्रिएटिव फैसले ऐसे लोग भी लेते हैं। जिनके पास साहित्य-संगीत-सिनेमा की पूरी समझ राम भरोसे आई है.. उनके पास बुद्धि की जगह बस डेटा और रेफरेंस है और तर्कों की जगह फैंसी अंग्रेजी.
बड़ी विडम्बना ये है कि अंत में वही डिसाइड करते हैं कि कौन सा गाना फ़िल्म में जाएगा.
तो आज अगर आपके हिसाब से जो कलाकार अच्छा लिख सकता था, या बना सकता था वो नहीं बना पाया, उसके एक नहीं अनेक कारण भी हो सकते हैं.
ये सच है कि आज की क्रियेटिव दुनिया पहले वाली नहीं रही. और इसलिए गीत-संगीत भी धीरे-धीरे पहले जैसा नहीं रहा… वही कलाकार जो बीस साल पहले जादू रच चुके हैं, वो आज औसत काम क्यों कर रहे हैं ? उसके पीछे सिर्फ़ उनका दोष नहीं, कुछ तो दोष बदलते क्रिएटिव कल्चर का भी है.
#RamayanaMovie
कल इस बच्चे की फोटो खींचते समय ये महसूस हुआ कि बचपन मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा त्यौहार है. आदमी बड़ा होता जाता है, त्यौहार फीके पड़ते जातें हैं.
सही बात संजय भाई. जिस व्यक्ति के साथ बैठकर, मिलकर और बात करके आपका मन शांत नहीं होता, आप जीवन में बेहतर करने की नहीं सोचते, आपके अंदर का बेहतरीन व्यक्ति बाहर नहीं आता. वो आदमी कितना भी बड़ा धनवान, रूपवान और सेक्सवान हो उससे तुरंत दूर हो जाना चाहिए. अफ़सोस ये बात लड़के बिल्कुल नहीं समझते.और जब समझते हैं तब तक बहुत देर हो जाती है. 😔
Replying to @AuthorAtul
लड़को को लगता है कि उनके पास खोने के लिये कुछ नही है. सेक्स होगा, मजा आयेगा.
खोने के लिये पैसा है, नौकरी-धंधा है, चैन है, समय है, प्रतिष्ठा है, घर-परिवार है.
समय इतना मासुम नही है. पेशेवर गिद्ध भी हर मुहल्ले में निशाना बनाये हुयें है.
ज्यादातर लड़के रूप के जाल में अपना नियंत्रण खो देते हैं और किसी लखनऊ वाली श्रद्धा का शिकार होकर अपने फोटो के ऊपर श्रद्धा-सुमन अर्पित करवा लेते हैं. अच्छा-खासा बिजनेस खड़ा कर लेने वाले शिवा को फ़ोन पर गिड़गिड़ाता देख दया आती है. ईश्वर सारी सजा दे बस आपके जीवन में किसी टाक्सिक और नार्सिसिस्ट आदमी को न भेजे,वरना आदमी बार-बार यही साबित करता रह जाता है कि वो बुरा नहीं है. और उसे ग़लत समझा जा रहा है.
सात्र और कामू दोनों अस्तित्ववाद के बड़े लेखक हैं. बीसवीं सदी में दुनिया की वैचारिकी पर दोनों का जबरदस्त प्रभाव है. दोनों एक जमाने में अच्छे दोस्त हुआ करते थे..और पेरिस के एक कैफ़े में बैठकर जीवन क्या है और आदमी के अस्तित्व का उद्देश्य क्या है, इस पर चर्चा किया करते थे.
लेकिन कामू के “द रिबेल” के बाद परिस्थितियाँ ऐसी बदलीं कि दोनों वैचारिक रूप से एक दूसरे के परस्पर विरोधी बन गए. जहाँ सात्र ने सशस्त्र क्रांति और राजनीतिक आंदोलन के समर्थन में तगड़े विचार पेश किए , वहीं कामू ने ऐसी क्रांति और आंदोलन से निकली सत्ता की निरर्थकता पर ध्यान दिलाया. और कहा कि जो सत्ता क्रांति से निकलके आती हैं, वो एक नई तानाशाही में तब्दील हो जाती है और जनता फिर ठग ली जाती है.
लेकिन इस वैचारिक टकराव से दोनों के विचार कमतर नहीं हो गए. दोनों के अपने तर्क हैं और अपने रास्ते हैं. बाद में दुनिया ने दोनों को पढ़ा और समझा. आगे चलकर दोनों को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला. अलग बात है कि सात्र ने ठुकरा दिया…
इसलिए कहना यही है कि जो आपकी तरह नहीं सोचता, वो जरूरी नहीं है कि हमेशा ग़लत ही सोचता है. और उसके विचार अप्रासंगिक हैं.
हाँ, मर्यादा में रहकर तर्क-वितर्क चलते रहना चाहिए. व्यक्तिगत हमले वो करते हैं जो असहिष्णु होने के साथ-साथ आईडेंटिटी क्राइसिस से जूझ रहे हैं और तर्क न मिलने पर तुरंत बौखला जाते हैं.
ऐसे लोग अब मेरे लिए दया के पात्र हैं, और उनके लिए मैं सदबुद्धि की कामना ही करता हूँ.🙏
सादर
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अन्ना आंदोलन का नेतृत्व करने वाले भी कहते थे कि देश बदल देंगे, भ्रष्टाचार खत्म कर देंगे etc etc..वो सत्ता में भी आए पर देश नहीं बदला.. वो बदल गए.. भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ ,वो भ्रष्ट हो गए...जो अच्छी नीयत से आंदोलन से जुड़े थे वो अपने नेताओं के बदले रूप को देखकर चुपचाप अलग हो गए.. एक आंदोलन ने एक नई पार्टी को जन्म दे दिया..अब वही लोग वही सब कुछ कर रहे हैं जिससे लड़ने के लिए उन्होंने देश की जनता को बहकाया था.. सड़कों पर उतारा था। जनता पिटती है और कुछ महत्वाकांक्षी लोगों के राजनीतिक सफर की शुरुआत हो जाती है..वो लोग कब किससे हाथ मिला लेंगे ये जनता को पता ही नहीं होता 🙏 @AuthorAtul
प्रिय युवाओं
ज्ञानेश चोर हो सकते हैं. पेपर लीक हो सकता है. बेरोजगारी और महंगाई बढ़ सकती है. देश अंबानी-अदानी चला सकते हैं. लेकिन अगर तुमको लगता है कि इन आंदोलन से कल कोई दूसरा नेता आकर देश में सब कुछ ठीक कर देगा, तो ये तुम्हारी बुद्धि की बलिहारी है.
दरअसल तुम अभी नहीं जान सके हो कि इस देश में आंदोलन एक बौद्धिक व्यापार है. हर आंदोलन से राजनीति के बाजार में कुछ नई दुकाने खुल जाती हैं. कुछ चल पड़ती हैं और कुछ बंद हो जाती हैं.
फिर इस लोकतंत्र के क्षितिज पर कुछ देर के लिए एक धुआँ उठता है और इस देश के राजनीतिक कवि-लेखक-पत्रकार नारे लगाते हैं, “देखो-देखो हम ज़िंदा हैं.” और तब तक चिल्लाते हैं जब तक कि उनकी पसंद का नेता कुर्सी पर बैठ नहीं जाता.
इसलिए कहना चाहूँगा, अगर तुम किसी पार्टी के कार्यकर्ता हो तो आंदोलन जरूर करो. कार्यकर्ता का तो फ़र्ज़ है. लेकिन अगर नहीं हो तो फिलहाल पढ़ाई-लिखाई और कैरियर पर ध्यान दो.
अगर एसआईआर में ज्ञानेश ने तुम्हारा नाम काट दिया है तो फ़ार्म 6 भरने का आप्शन अभी भी तुम्हारे पास है. अपना नाम ऑनलाइन जोड़ लो और जब चुनाव आए तब वोट देकर अपना गुस्सा दर्ज कर लेना.
लेकिन ये वक़्त पढ़ने-लिखने और ख़ुद की दुनिया गढ़ने का है. ये बीत जाएगा तो फिर न आएगा. इस देश में तमाम अवसर और नए आसमान आज भी मौजूद हैं. तुम्हारी मेहनत और योग्यता को राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी मिलकर भी नहीं रोक सकते..
मेहनत करके ऐसा सामर्थ्यवान बनो कि कुछ लोगों का जीवन बदल सको. यही सच्ची देश सेवा होगी.
बाक़ी इस आंदोलित भेड़ियाधसान में कुछ नहीं रखा. जिस भैया-दीदी का भाषण सुनकर आज मज़ा आ रहा, वो दस साल बाद पार्टी बदलकर राजनीतिक भ्रष्टाचार में संलिप्त पाए जाएँगे. और तुम हाथ मलते रह जावोगे.
कम से कम इतिहास तो यही कहता है.
बिश्वास नहीं तो जेपी के सम्पूर्ण क्रांति से लेकर आज तक हुए आंदोलन का इतिहास उठाकर देख लो, आंदोलन, क्रांति और परिवर्तन के नाम पर भारत की जनता आज तक बेवक़ूफ़ ही बनती आई है. और आगे भी बनती रहेगी. कम से कम तुम तो न बनो.
जेपी के पास तो नैतिक जमीन भी थी, चरित्र भी था. उनके पीछे चलना भी गर्व का विषय था. तुम जिनके पीछे हो उनके पास कुछ नहीं है..बस सत्ता मिलने की देर है..ये भी उतने ही भ्रष्ट, अलोकतांत्रिक और ग़ैरजिम्मेदार हैं…
बुरा लगे तो माफ़ करना… आजकल ऐसी बातें कहने का जमाना नहीं रहा 😌
Atul
तुम्हारा गुस्सा नया नहीं है प्यारे, जिन दिनों हम अन्ना आंदोलन में डफली बजाकर चंदा माँगते थे, उन दिनों हमें भी कोई समझाता था, तो हमें भी ऐसे ही बुरा लगता था..
आज क्या आंदोलन हो रहा. ये तो कुछ नहीं, असली आंदोलन तो वो था.. और तुम क्या नारे लगा रहे हो, हमने भी क्या नारे लगाए थे..ओहो हो हो…”अन्ना नहीं आंधी है, देश का दूसरा गांधी है…” आज क्या जंतर-मंतर देख रहे हो. तब गांव-गाँव गली-गली ही जंतर-मंतर बन गया था.
लेकिन प्यारे, दस साल बाद समझ आया कि इस देश में अब व्यवस्था परिवर्तन के नारे दरअसल भीड़ की भावना का दोहन करके सत्ता तक पहुँचने का एक मात्र टूल है. जनता की नाराज़गी और असंतोष एक कंधा मात्र है. इसमें फ़ायदा हमेशा राजनीति करने वालों को होता है. जनता को नहीं.
तुम कहते हो भगत सिंह का जमाना और आजादी का वक़्त…अरे वो वक़्त दूसरा था, ये वक़्त दूसरा है. तब आदर्श, नैतिकता और स्वाभिमान का मोल था, आज नहीं है. आज का भगत सिंह भाषण देकर राजनीतिक फायदा उठाता है और फिर ऐसे चुप होता है जैसे कुछ हुआ ही न हो.
अन्ना आंदोलन में लोकपाल, सिटीजन चार्टर, राइट टू रिकाल जैसे सपने का लालीपॉप दिखाकर एक दिन केजरीवाल शीशमहल में विराजते पाए गए. ये कौन नहीं जानता.
2016 में जेएनयू की क्रांति हुई तो लगा कि आरएसएस की लंका लग जाएगी और देश में क्रांति होकर रहेगी
लेकिन प्यारे, तब कन्हैया कुमार, उमर खालिद के साथ काश्मीर की आजादी का नारे लगाने वाली हमारे जमाने की नेहा वोरा, शहला राशिद बाद में मोदी की कश्मीर अच्छी नीतियों पर किताब लिखती पाई गईं.
बहुत क्रांतिकारी कन्हैया कुमार बाद में जाकर राहुल गांधी से ज्यादा गांधी परिवार के जानकार बन गए. उस वक्त मोदी विरोध की सबसे बड़ी ओबीसी युवा आवाज हार्दिक पटेल बाद में कट्टर भाजपाई बने..
क्रांतिकारी जिग्नेश मेवानीं क्रांति छोड़ कांग्रेस विधायक बन गए..और सोशल मीडिया पर दलितों और पिछड़ों की सबसे बड़े हिमायती और ब्राह्मणवाद के कट्टर विरोधी दिलीप मंडल साहब बाद में मोदी के सरकारी सलाहकार बनते पाए गए…
और इनके पीछे भागने वाले तुम्हारे जैसे लाखों युवा ठगे रह गए.
बस, पिछली पोस्ट में मेरे कहने का आशय इतना ही था कि आज तुमको जिसका भाषण, जिसकी पोस्ट, जिसके नारे बहुत क्रांतिकारी और आग लगाने वाला लग रहे हैं, वो कल क्या हो जाएँगे, भगवान भी नहीं जानते.
मैंने बस इसी से आगाह किया था कि चिल्ला-चिल्लाके व्यवस्था बदलने वाले लोग एक दिन जाकर उसी व्यवस्था में सेट हो जाते हैं और उनके पीछे भगाने वाली तुम्हारे जैसी भीड़ हमेशा ठगी रह जाती है.
ये नारे क्रांतिकारी लगते तो हैं, इसमें दो राय नहीं है. किसी जमाने में ग़रीबी हटाओ, अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारे भी वही काम करते थे, जो आज कुछ नारे कर रहे हैं. लेकिन जनता से पूछो कि कितनी ग़रीबी हटी, कितने अच्छे दिन आए ?
आज अच्छे दिन का नाम लो तो कांग्रेसी से ज़्यादा भाजपाई ही मोदी जी को गाली देते हैं.
लेकिन दुखद सत्य ये है कि आज देश में जो हालात हैं, वहाँ संतुलित और सत्य कहने वालों का जमाना लद चुका है. अब या तो आप पक्ष में हैं या विपक्ष में. नहीं तो आपका सर नोच लिया जाएगा.
फिर भी मैनें इतनी जमीर बचाकर रखी है कि जरूरत पड़ने पर मोदी और राहुल गांधी किसी के विरोध में कभी भी लिख सकता हूँ. क्योंकि अंधभक्ति और अंध समर्थन नहीं हो पाता. ये सब राजनीतिक कार्यकर्ता का काम है, मेरा नहीं.
और तुम कहते हो कि आपको युवाओं की दुर्दशा नहीं दिखती.. भाई सबर करो.. मैंने अपना डेढ़ साल खर्च करके तीन सौ पेज की किताब ही लिख दी है.
मेरी दूसरी किताब की कहानी एजुकेशन सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार और पेपरलीक जैसे गंभीर मुद्दे पर हैं. और मैनें ये नहीं सोचा कि उसमें राइट विंग-लेफ्ट विंग, नेता-पत्रकार- कोचिंग-नकल, माफिया थाना-पुलिस सब मुझे कितनी गाली देने वाले हैं..और कौन सा पुरस्कार मुझे मिलेगा… एक लेखक के नाते मैंने इस बार भी अपना काम ईमानदारी से किया है.
बहुत लोग पुरस्कार लेकर घूम रहे हैं. पुरस्कार मिलने से और सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखने से किताबे नहीं बिकती. एक किताब पाँच साल बाद लगातार इसलिए पहले से ज़्यादा बिकती है कि उसको ईमानदारी से लिखा गया है. और उसकी कहानी में दम है.
बाक़ी मैं जो देख रहा हूँ, वो कहना नहीं छोड़ दूँगा. ये कहने में गुरेज नहीं कि पेपरलीक वाला आंदोलन जरूरी था…लेकिन अभी जो हो रहा वो विशुद्ध राजनीतिक ड्रामा है…जिसका व्यवस्था में बदलाव से दूर-दूर तक कोई मतलब नहीं है. जिन्होंने सत्ता में रहते हुए इस सिस्टम के ख़िलाफ़ कुछ न किया उनके साथ नारे लगाने से अच्छा चुप हो जाना है.
Atul
प्रिय युवाओं
ज्ञानेश चोर हो सकते हैं. पेपर लीक हो सकता है. बेरोजगारी और महंगाई बढ़ सकती है. देश अंबानी-अदानी चला सकते हैं. लेकिन अगर तुमको लगता है कि इन आंदोलन से कल कोई दूसरा नेता आकर देश में सब कुछ ठीक कर देगा, तो ये तुम्हारी बुद्धि की बलिहारी है.
दरअसल तुम अभी नहीं जान सके हो कि इस देश में आंदोलन एक बौद्धिक व्यापार है. हर आंदोलन से राजनीति के बाजार में कुछ नई दुकाने खुल जाती हैं. कुछ चल पड़ती हैं और कुछ बंद हो जाती हैं.
फिर इस लोकतंत्र के क्षितिज पर कुछ देर के लिए एक धुआँ उठता है और इस देश के राजनीतिक कवि-लेखक-पत्रकार नारे लगाते हैं, “देखो-देखो हम ज़िंदा हैं.” और तब तक चिल्लाते हैं जब तक कि उनकी पसंद का नेता कुर्सी पर बैठ नहीं जाता.
इसलिए कहना चाहूँगा, अगर तुम किसी पार्टी के कार्यकर्ता हो तो आंदोलन जरूर करो. कार्यकर्ता का तो फ़र्ज़ है. लेकिन अगर नहीं हो तो फिलहाल पढ़ाई-लिखाई और कैरियर पर ध्यान दो.
अगर एसआईआर में ज्ञानेश ने तुम्हारा नाम काट दिया है तो फ़ार्म 6 भरने का आप्शन अभी भी तुम्हारे पास है. अपना नाम ऑनलाइन जोड़ लो और जब चुनाव आए तब वोट देकर अपना गुस्सा दर्ज कर लेना.
लेकिन ये वक़्त पढ़ने-लिखने और ख़ुद की दुनिया गढ़ने का है. ये बीत जाएगा तो फिर न आएगा. इस देश में तमाम अवसर और नए आसमान आज भी मौजूद हैं. तुम्हारी मेहनत और योग्यता को राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी मिलकर भी नहीं रोक सकते..
मेहनत करके ऐसा सामर्थ्यवान बनो कि कुछ लोगों का जीवन बदल सको. यही सच्ची देश सेवा होगी.
बाक़ी इस आंदोलित भेड़ियाधसान में कुछ नहीं रखा. जिस भैया-दीदी का भाषण सुनकर आज मज़ा आ रहा, वो दस साल बाद पार्टी बदलकर राजनीतिक भ्रष्टाचार में संलिप्त पाए जाएँगे. और तुम हाथ मलते रह जावोगे.
कम से कम इतिहास तो यही कहता है.
बिश्वास नहीं तो जेपी के सम्पूर्ण क्रांति से लेकर आज तक हुए आंदोलन का इतिहास उठाकर देख लो, आंदोलन, क्रांति और परिवर्तन के नाम पर भारत की जनता आज तक बेवक़ूफ़ ही बनती आई है. और आगे भी बनती रहेगी. कम से कम तुम तो न बनो.
जेपी के पास तो नैतिक जमीन भी थी, चरित्र भी था. उनके पीछे चलना भी गर्व का विषय था. तुम जिनके पीछे हो उनके पास कुछ नहीं है..बस सत्ता मिलने की देर है..ये भी उतने ही भ्रष्ट, अलोकतांत्रिक और ग़ैरजिम्मेदार हैं…
बुरा लगे तो माफ़ करना… आजकल ऐसी बातें कहने का जमाना नहीं रहा 😌
Atul
सामर्थ्य और शक्ति का आशय सिर्फ़ धन से नहीं है. सिर्फ़ धन से ब्रिटेन ने दुनिया पर राज नहीं किया. लेकिन फ़ैक्ट ये भी है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद परिस्थियाँ तेज़ी से बदल रही थी और ब्रिटेन को सत्ता बनाए रखना भारी पड़ रहा था. हर देश में क्रांतिकारी धीरे-धीरे अंग्रेज़ों पर भारी पड़ रहे थे.. हमारे देश में भी विद्रोह चरम पर था. लेकिन ये बिद्रोह इतने भारी भी नहीं थे कि अंग्रेज़ उनसे निपट नहीं लेते. भारत पर राज करना उन्हें आ चुका था. और चर्चिल अगर जीत जाता तो आजादी 47 में शायद ही मिलती. क्योंकि वो विस्तारवादी भारत विरोधी और क्रूर शासक था.
अरुण भोले की एक किताब है “राजनीति मेरी प्रेयसी” उसे पढ़ना चाहिए सबको, उसमें उन्होंने एक जगह लिखा है कि आजादी के कुछ साल पहले ही नेहरू जी ने ब्रिटेन में किसी अपने दोस्त से कहा था कि मुझे नहीं लगता कि अंग्रेज़ इतना जल्दी भारतीयों को सत्ता देने वाले हैं.” आप इसी से समझ सकते हैं की आजादी को लेकर हमारे नेता ख़ुद कितने भरोसे में थे.
लेकिन एटली की जीत ने समीकरण बदल दिया. तब ब्रिटेन की आम जनता चर्चिल के पागलपन से ऊब चुकी थी और इसका फ़ायदा एटली की लेबर पार्टी ने उठाया. हालाँकि एटली ने भी पीएम बनते ही तुरंत हर जगह से ब्रिटिश शासन ख़त्म नहीं किया लेकिन भारत उसकी प्राथमिकता में था. और वो भारत को लेकर चर्चिल से ज़्यादा उदार था. उसने अपना चुनावी वायदा निभाया.
अब ये सब बाते नहीं की जाती हैं क्योंकि ये हमारे देश के हजारों क्रांतिकारियों के बलिदान का थोड़ा अपमान सा लगता है लेकिन फ़ैक्ट तो फ़ैक्ट है कि चर्चिल का हारना भारत के पक्ष में गया. आप इसे झुठला नहीं सकते.
Replying to @AuthorAtul
फिर इस हिसाब से दादाभाई नौरोजी की 'ड्रेन ऑफ वेल्थ थ्योरी' और जॉन सुलीवन का कथन कि 'ब्रिटिश प्रणाली गंगा के तटों से सभी अच्छी चीजों को सोख लेती है और उन्हें टेम्स के तटों पर ले जाकर निचोड़ देती है।' गलत हो जाता है क्योंकि आपके अनुसार भारत के लिए धन वे अपने पास से खर्च कर रहे थे।
आजादी का यशगान मद्धिम न पड़ जाए इसलिए बहुत होशियारी से हमारे देश इतिहासकार ये बात छिपा ले जाते हैं कि सेकेंड वर्ल्ड वार के बाद विंस्टन चर्चिल चुनाव हार चुका था और उसके विपक्षी लेबर पार्टी ने अपने चुनावी मैनोफ़ेस्टो में कहा था कि हम सरकार बनते ही हर जगह उपनिवेशवाद ख़त्म कर देंगे. क्योंकि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन आर्थिक रूप से पूरी तरह तबाह हो चुका था और उसके पास भारत जैस देश को चलाने का सामर्थ्य और शक्ति नहीं बचा था. वरना दस-बीस साल और रहकर गए होते.
जब हमारा देश अधिकांश चीज़ों में सामर्थ्यवान है, तब ये अमेरिकी इतना दबाब बना रहे हैं. जिन दिनों हमें ये खाने के लिए सड़ा गेंहू बेचते थे, उन दिनों ये क्या करते होंगे पता नहीं..लेकिन मस्क के पोस्ट के बाद अपने देश में उछलते लोगों को देखकर समझ में आ जाता है कि मुट्ठी भर अंग्रेजों ने इस देश पर सैकड़ों साल तक राज कैसे कर लिया होगा.
इस साल भी बेचारे रह गए. मजेदार और दुखद ये है कि हर साल जितनी चर्चा नोबेल पाने वाले लेखक की होती है उससे कहीं अधिक चर्चा मुराकामी के नोबेल न मिलने की हो जाती है. ये उस आदमी का जादू है.
जिस फ़िल्म के सीन में नाना रहते थे उस सीन में दुनिया का कोई भी बड़ा एक्टर क्यों न हो सिर्फ नाना ही दिखाई और सुनाई देते थे. वो खाँटी मराठी मानुष जिसने बिना किसी पीआर के जमीन पर किसानों के लिए काम किया, मौक़ा मिला तो कारगिल में सैनिकों का हौसला बढ़ाने बॉर्डर पर चले गए. जीवन भर अपनी ठसक के साथ रहे और फिर इतनी शांति से चले गए जैसे कुछ हुआ ही न हो.. श्रद्धांजलि 🙏
💔 #nanapatekar












